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गीतिका: कद छोटा परछाईं बड़ी है... ---आचार्य संजीव 'सलिल'

गीतिका संजीव 'सलिल' कद छोटा परछाईं बड़ी है. कैसी मुश्किल आई घड़ी है. चोर कर रहे पहरेदारी सच में सच रुसवाई बड़ी है.. बीवी बैठी कोष सम्हाले खाली हाथों माई खड़ी है.. खुद पर खर्च रहे हैं लाखों भिक्षुक हेतु न पाई पडी है.. 'सलिल' सांस-सरहद पर चुप्पी मौत शीश पर आई-अड़ी है.. *************************

तेवरी: नफरत की भट्टी --संजीव 'सलिल'

तेवरी संजीव 'सलिल' नफरत की भट्टी में सुलग रहा देश. कलियाँ नुचवाता दे माली आदेश.. सेना में नेता-सुत एक भी नहीं. पढिये, क्या छिपा हुआ इसमें संदेश?. लोकतंत्र पर हावी लोभतंत्र है. लेन-देन में आती शर्म नहीं लेश.. द्रौपदी-दुशासन ने मिला लिये हाथ. धर्मराज के खींचें दोनों मिल केश. 'मावस अनमोल हुई, पूनम बेदाम.. निशा उषा संध्या को ठगता राकेश.. हूटर मदमस्त, पस्त श्रमिक हैं हताश. खरा त्याज्य, है वरेण्य खोता परिवेश.. पूज रहा सत्य को असत्य आचरण. नर ने नारायण को 'सलिल' दिया क्लेश.. *******************

दोहा गीतिका 'सलिल'

(अभिनव प्रयोग) दोहा गीतिका 'सलिल' * तुमको मालूम ही नहीं शोलों की तासीर। तुम क्या जानो ख्वाब की कैसे हो ताबीर? बहरे मिलकर सुन रहे गूँगों की तक़रीर। बिलख रही जम्हूरियत, सिसक रही है पीर। दहशतगर्दों की हुई है जबसे तक्सीर वतनपरस्ती हो गयी खतरनाक तक्सीर। फेंक द्रौपदी खुद रही फाड़-फाड़ निज चीर। भीष्म द्रोण कूर कृष्ण संग, घूरें पांडव वीर। हिम्मत मत हारें- करें, सब मिलकर तदबीर। प्यार-मुहब्बत ही रहे मजहब की तफसीर। सपनों को साकार कर, धरकर मन में धीर। हर बाधा-संकट बने, पानी की प्राचीर। हिंद और हिंदी करे दुनिया को तन्वीर। बेहतर से बेहतर बने इन्सां की तस्वीर। हाय! सियासत रह गयी, सिर्फ स्वार्थ-तज़्वीर। खिदमत भूली, कर रही बातों की तब्ज़ीर। तरस रहा मन 'सलिल' दे वक़्त एक तब्शीर। शब्दों के आगे झुके, जालिम की शमशीर। ********************************* तासीर = असर/ प्रभाव, ताबीर = कहना, तक़रीर = बात/भाषण, जम्हूरियत = लोकतंत्र, दहशतगर्दों = आतंकवादियों, तकसीर = बहुतायत, वतनपरस्ती = देशभक्ति, तकसीर = दोष/अपराध, तदबीर = उपाय, तफसीर = व्याख्या, तनवीर = प्रकाशि...