अरुण कटियार इससे पहले कहिए, क्या खबर है? लो क सं घ र्ष !: कितने मुनासिब हैं विशेष पुलिसिया दस्ते दूरदर्शन को सोखकर रसूखदार हुए रजत जरूरी नहीं कि केवल कंपनियों, सरकार या स्थानीय प्रशासन को ही संसाधन की बर्बादी की समस्या से दो-चार होना पड़ता हो। दुखद सच्चाई यह है कि संपदा या संसाधन की बर्बादी का नाता आप और मुझ जैसे व्यक्तियों से भी हो सकता है। इससे भी दुखद यह कि मुमकिन है आप और हम भी ऐसे लोगों की श्रेणी में आते हों, जो व्यर्थ गंवा दिए गए संसाधनों की तरह हों। जरा इस बारे में सोचें। गर्मियां बीत चुकी हैं। लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि गर्मियों में अक्सर नजर आने वाला यह दृश्य आपने जरूर देखा होगा: खाली पड़े स्कूली मैदानों को अपनी कदमताल की आवाज से गुंजाते एनसीसी (नेशनल कैडेट कोर) के नौजवान कैडेट्स। यह नजारा बहुत आम है। हर सुबह देशभर के अनेक स्कूलों से विद्यार्थी बसों में सवार होकर एनसीसी के निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने के लिए चल पड़ते हैं। आखिर क्या है वह लक्ष्य, जिसके लिए हमारे युवा मुस्तैदी से जुटे हैं? और उस लक्ष्य को वे किस तरह हासिल करना चाहते हैं? वह लक्ष्य है भारत के युवाओं को ...