धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार., दिल पर लोटा सांप हो गया सूरज तप्त अंगार... * नेह नर्मदा तीर हुलसकर बतला रहा पलाश. आया है ऋतुराज काटने शीत काल के पाश. गौरा बौराकर बौरा की करती है मनुहार. धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार. * निज स्वार्थों के वशीभूत हो छले न मानव काश. रूठे नहीं बसंत, न फागुन छिपता फिरे हताश. ऊसर-बंजर धरा न हो, न दूषित मलय-बयार. धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार.... * अपनों-सपनों का त्रिभुवन हम खुद ना सके तराश. प्रकृति का शोषण कर अपना खुद ही करते नाश. जन्म दिवस को बना रहे क्यों 'सलिल' मरण-त्यौहार? धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार.... *************** दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम