Skip to main content

Posts

Showing posts with the label jabalpur. india.

मुक्तिका: सच्चा नेह ---संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:                                                                                                                                       सच्चा नेह संजीव 'सलिल' * तुमने मुझसे सच्चा नेह लगाया था. पीट ढिंढोरा जग को व्यर्थ बताया था.. मेरे शक-विश्वास न तुमको ज्ञात तनिक. सत-शिव-सुंदर नहीं पिघलने पाया था.. पूजा क्यों केवल निज हित का हेतु बनी? तुझको भरमाता तेरा ही साया था.. चाँद दिखा आकर्षित तुझको किया तभी गीत चाँदनी का तूने रच-गाया था.. माँगा हिन्दी का, पाया अंग्रेजी का फूल तभी तो पैरों तले दबाया था.. प्रीत अमिय संदेह ज़हर है सच मानो. इसे हृदय में उसको कंठ बसाया था.. जूठा-मैला किया तुम्हींने, निर्मल था व्यथा-कथा को नहीं...

मुक्तिका: फिर ज़मीं पर..... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका: फिर ज़मीं पर..... संजीव 'सलिल' * फिर ज़मीं पर कहीं काफ़िर कहीं क़ादिर क्यों है? फिर ज़मीं पर कहीं नाफ़िर कहीं नादिर क्यों है? * फिर ज़मीं पर कहीं बे-घर कहीं बा-घर क्यों है? फिर ज़मीं पर कहीं नासिख कहीं नाशिर क्यों है? * चाहते हम भी तुम्हें चाहते हो तुम भी हमें. फिर ज़मीं पर कहीं नाज़िल कहीं नाज़िर क्यों है? * कौन किसका है सगा और किसे गैर कहें? फिर ज़मीं पर कहीं ताइर कहीं ताहिर क्यों है? * धूप है, छाँव है, सुख-दुःख है सभी का यक सा. फिर ज़मीं पर कहीं तालिब कहीं ताजिर क्यों है? * ज़र्रे -ज़र्रे में बसा वो न 'सलिल' दिखता है. फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं  मंदिर क्यों है? * पानी जन आँख में बाकी न 'सलिल' सूख गया. फिर ज़मीं पर कहीं सलिला कहीं सागर क्यों है? * -- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम कुछ शब्दों के अर्थ : काफ़िर = नास्तिक, धर्मद्वेषी, क़ादिर = समर्थ, ईश्वर, नाफ़िर = घृणा करनेवाला, नादिर = श्रेष्ठ, अद्भुत, बे-घर = आवासहीन, बा-घर = घर वाला, जिसके पास घर हो, नासिख = लिखनेवाला,  नाशिर = प्रकाशित करनेवाला, नाज़िल = मुसीबत, नाज़ि...

मुक्तिका : संजीव 'सलिल'

मुक्तिका : संजीव 'सलिल' * काम रहजन का करे नाम से रहबर क्यों है? मौला इस देश का नेता हुआ कायर क्यों है?? खोल अखबार- खबर सच से बेखबर क्यों है? फिर जमीं पर कहीं मस्जिद, कहीं मंदर क्यों है? जो है खूनी उकाब उसको अता की ताकत. भोला-मासूम परिंदा नहीं जबर क्यों है?? जिसने पैदा किया तुझको तेरी औलादों को. आदमी के लिए औरत रही चौसर क्यों है?? एक ही माँ ने हमें दूध पिलाकर पाला. पीठ हिन्दोस्तां की पाक का खंजर क्यों है?? लाख खाता है कसम रोज वफ़ा की आदम. कर न सका आज तलक बोल तो जौहर क्यों है?? पेट पलता है तेरा और मेरा भी जिससे- कामचोरी की जगह, बोल ये दफ्तर क्यों है?? ना वचन सात, ना फेरे ही लुभाते तुझको. राह देखा किया जिसकी तू, वो कोहबर क्यों है?? हर बशर चाहता औरत तो पाक-साफ़ रहे. बाँह में इसको लिए, चाह में गौहर क्यों है?? पढ़ के पुस्तक कोई नादान से दाना न हुआ. ढाई आखर न पढ़े, पढ़ के निरक्षर क्यों है?? फ़ौज में क्यों नहीं नेताओं के बेटे जाते? पूछा जनता ने तो नेता जी निरुत्तर क्यों है?? बूढ़े माँ-बाप की खातिर न जगह है दिल में. काट-तन-पेट खड़ा तुमने किया घर क्यों है?...

मुक्तिका:: कहीं निगाह... ---- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका::                                                                           कहीं निगाह... संजीव 'सलिल' * कदम तले जिन्हें दिल रौंद मुस्कुराना है. उन्ही के कदमों में ही जा गिरा जमाना है कहीं निगाह सनम और कहीं निशाना है. हज़ार झूठ सही, प्यार का फसाना है.. न बाप-माँ की है चिंता, न भाइयों का डर. करो सलाम ससुर को, वो मालखाना है.. पड़े जो काम तो तू बाप गधे को कह दे. न स्वार्थ हो तो गधा बाप को बताना है.. जुलुम की उनके कोई इन्तेहां नहीं लोगों मेरी रसोई के आगे रखा पाखाना है.. किसी का कौन कभी हो सका या होता है? अकेले आये 'सलिल' औ' अकेले जाना है.. चढ़ाये रहता है चश्मा जो आँख पे दिन भर. सचाई ये है कि बन्दा वो 'सल...

मुक्तिका: किस चरण का अनुकरण --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका: किस चरण का अनुकरण संजीव 'सलिल' * किस चरण का अनुकरण जन-जन करे. हर चरण के आचरण हैं जब बुरे.. गले मिलते मुस्कुराते मीत कह पीठ पीछे हाथ में थामे छुरे.. हैं बुरे, बनते भले जो आजकल. हैं भले जो आजकल लगते बुरे.. मायके में गुजर कब किसकी हुई? खोज प्रियतम को चलो अब सासरे.. सच कहो तो मानते सब गैर हैं. कहें मनचाही वही हैं खास रे.. बढ़ी है सुविधाएँ, वैभव, कीर्ति, धन. पर आधार से गुम गया है हास रे.. साँस तेरा साथ चाहे छोड़ दे. 'सलिल' जीते जी न तजना आस रे.. ************************** दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

मुक्तिका ......... बात करें संजीव 'सलिल'

मुक्तिका ......... बात करें संजीव 'सलिल' * * बात न मरने की अब होगी, जीने की हम बात करें. हम जी ही लेंगे जी भरकर, अरि मरने की बात करें. जो कहने की हो वह करने की भी परंपरा डालें. बात भले बेबात करें पर मौन न हों कुछ बात करें.. नहीं सियासत हमको करनी, हमें न कोई चिंता है. फर्क न कुछ, सुनिए मत सुनिए, केवल सच्ची बात करें.. मन से मन पहुँच सके जो, बस ऐसा ही गीत रचें. कहें मुक्तिका मुक्त हृदय से, कुछ करने की बात करें.. बात निकलती हैं बातों से, बात बात तक जाती है. बात-बात में बात बनायें, बात न करके बात करें.. मात-घात की बात न हो अब, जात-पांत की बात न हो. रात मौन की बीत गयी है, तात प्रात की बात करें.. पतियाते तो डर जाते हैं, बतियाते जी जाते हैं. 'सलिल' बात से बात निकालें, मत मतलब की बात करें.. *************** Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com