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देश का दुर्भाग्य

देश का दुर्भाग्य देश का दुर्भाग्य है कि, एक तरफ इस बच्ची को उस खतरे से बचाए जाने कि गुहार लगानी पड़ रही हैं जिसकी इसे कल्पना तक नहीं है...तो दूसरी तरफ आयातित सनी लियोने बता रही है कि, बलात्कार का कारण पोर्न फ़िल्में नहीं बल्कि गन्दी मानसिकता के लोग इसके जिम्मेदार हैं, कोई उनसे पूछे कि, ये गन्दी मानसिकता आई कहाँ से?? वहीँ देश कि राजधानी में एक फिल्मकार सार्वजनिक मंच से फिल्मो में स्मोकिंग दृश्य के दौरान चेतावनी दिखने के नियम का विरोध करने के कुतर्क देने और कमीने जैसे शब्द को गाली नहीं साबित करने पर तुले हुए थे, एक युवा के विरोध करने पर अपने संस्कार के अनुसार उन्होने उसको डपटते हुए कहा " " Abey  tu Dilli se hai? Dilli mein toh baap bhi apne bete ko yehi kehta hai, 'Abey kameenay, idhar aa'. "   मै ये नहीं कहता कि, समाज कि इस गिरावट के लिए ये ही जिम्मेदार हैं,  पर ये सच है कि इस तरह के लोग बहाने बना कर अपने गुनाहों पर पर्दा नहीं डाल सकते. तस्वीर लखनऊ विधानसभा के सामने ३० अप्रैल, शाम की है / दिल्ली  के इंटरव्यू  का लिंक भी दे रहा हु, रूचि बने तो...

दोहा सलिला : रूपमती तुम... -संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला : रूपमती तुम... संजीव 'सलिल' * रूपमती तुम, रूप के, हम पारखी अनूप. तृप्ति न पाये तृषित गर, व्यर्थ रूप का कूप.. * जुही चमेली चाँदनी, चम्पा कार्सित देह. चंद्रमुखी, चंचल, चपल, चतुरा मुखर विदेह.. * नख-शिख, शिख-नख मक्खनी, महुआ सा पीताभ. तन पाताल रत्नाभ- मुख, पौ फटता अरुणाभ.. * वाक् सारिका सी मधुर, भौंह नयन धनु बाण. वार अचूक कटाक्ष का, रुकें न निकलें प्राण.. * सलिल-बिंदु से सुशोभित, कृष्ण-कुंतली भाल. सरसिज पंखुड़ी से अधर, गुलकन्दी टकसाल.. * देह-गंध मादक-मदिर, कस्तूरी अनमोल. ज्यों गुलाब-जल में 'सलिल', अंगूरी दी घोल.. * दस्तक कर्ण-कपाट पर, देते रसमय बोल. पहुँच माधुरी हृदय तक, कहे नयन-पट खोल.. * दाड़िम रद-पट मौक्तिकी, संगमरमरी श्वेत. रसना मुखर सारिका, पिंजरे में अभिप्रेत.. * वक्ष-अधर रस-गगरिया, सुख पा, कर रसपान. बीत न जाए उमरिया, रीते ना रस-खान.. * रस-निधि पा रस-लीन हो, रस पी हो लव-लीन. सरस सृष्टि, नीरस बरस, तरस न हो रस-हीन.. * दरस-परस बिन कब हुआ, कहो सृष्टि-विस्तार? दृष्टि वृष्टि कर स्नेह की, करे सुधा-संचार.. * कंठ सुराहीदार है, ...

कविता: जीवन अँगना को महकाया -संजीव 'सलिल'

कविता: जीवन अँगना को महकाया संजीव 'सलिल' * * जीवन अँगना को महकाया श्वास-बेल पर खिली कली की स्नेह-सुरभि ने. कली हँसी तो फ़ैली खुशबू स्वर्ग हुआ घर. कली बने नन्हीं सी गुडिया. ममता, वात्सल्य की पुडिया. शुभ्र-नर्म गोला कपास का, किरण पुंज सोनल उजास का. उगे कली के हाथ-पैर फिर उठी, बैठ, गिर, खड़ी हुई वह. ठुमक-ठुमक छन-छननन-छनछन अँगना बजी पैंजन प्यारी दादी-नानी थीं बलिहारी. * कली उड़ी फुर्र... बनकर बुलबुल पा मयूर-पंख हँस-झूमी. कोमल पद, संकल्प ध्रुव सदृश नील-गगन को देख मचलती आभा नभ को नाप रही थी. नवल पंखुडियाँ ऊगीं खाकी मुद्रा-छवि थी अब की बाँकी. थाम हाथ में बड़ी रायफल कली निशाना साध रही थी. छननन घुँघरू, धाँय निशाना ता-ता-थैया, दायें-बायें लास-हास, संकल्प-शौर्य भी कली लिख रही नयी कहानी बहे नर्मदा में ज्यों पानी. बाधाओं की श्याम शिलाएँ संगमरमरी शिला सफलता कोशिश धुंआधार की धरा संकल्पों का सुदृढ़ किनारा. * कली न रुकती, कली न झुकती, कली न थकती, कली न चुकती. गुप-चुप, गुप-चुप बहती जाती. नित नव मंजिल गहती जाती. कली हँसी पुष्पायी आशा. सफल साधना, फलित ...

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: गीत भारत माँ को नमन करें.... संजीव 'सलिल'

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: गीत भारत माँ को नमन करें.... संजीव 'सलिल' * * आओ, हम सब एक साथ मिल भारत माँ को नमन करें. ध्वजा तिरंगी मिल फहराएँ इस धरती को चमन करें..... * नेह नर्मदा अवगाहन कर राष्ट्र-देव का आवाहन कर बलिदानी फागुन पावन कर अरमानी सावन भावन कर  राग-द्वेष को दूर हटायें एक-नेक बन, अमन करें. आओ, हम सब एक साथ मिल भारत माँ को नमन करें...... * अंतर में अब रहे न अंतर एक्य कथा लिख दे मन्वन्तर श्रम-ताबीज़, लगन का मन्तर भेद मिटाने मारें मंतर सद्भावों की करें साधना सारे जग को स्वजन करें. आओ, हम सब एक साथ मिल भारत माँ को नमन करें...... * काम करें निष्काम भाव से श्रृद्धा-निष्ठा, प्रेम-चाव से रुके न पग अवसर अभाव से बैर-द्वेष तज दें स्वभाव से 'जन-गण-मन' गा नभ गुंजा दें निर्मल पर्यावरण करें. आओ, हम सब एक साथ मिल भारत माँ को नमन करें...... * जल-रक्षण कर पुण्य कमायें पौध लगायें, वृक्ष बचायें नदियाँ-झरने गान सुनायें पंछी कलरव कर इठलायें भवन-सेतु-पथ सुदृढ़ बनाकर सबसे आगे वतन करें. आओ, हम सब एक साथ मिल भारत माँ को ...