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डा श्याम गुप्त की गज़ल...कितने दूर हैं....

पास भी है किन्तु कितने दूर है । आपकी चाहों से भी अब दूर हैं | आप चाहें या नहीं चाहें हमें , आप इस प्यासी नज़र के नूर हैं | आप को है भूल जाने का सुरूर , हम भी इस दिल से मगर मज़बूर हैं | चाह कर भी हम मना पाए नहीं , आपसे समझे यह कि हम मगरूर हैं | आपको ही सिर्फ यह शिकवा नहीं , हम भी शिकवे-गिलों से भरपूर हैं | आप मानें या न मानें 'श्याम हम, आपके ख्यालों में ही मशरूर हैं || -------- डा. श्याम गुप्त
सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ गीतिका आचार्य संजीव 'सलिल' आते देखा खुदी को जब खुदा ही जाता रहा. गयी दौलत पास से क्या, दोस्त ही जाता रहा. दर्दे-दिल का ज़िक्र क्यों हो?, बात हो बेबात क्यों? जब ये सोचा बात का सब मजा ही जाता रहा. ठोकरें हैं राह का सच, पूछ लो पैरों से तुम. मिली सफरी तो सफर का स्वाद ही जाता रहा. चाँद को जब तक न देखा चाँदनी की चाह की. शमा से मिल शलभ का अरमान ही जाता रहा 'सलिल' ने मझधार में कश्ती को तैराया सदा. किनारों पर डूबकर सम्मान ही जाता रहा.. ***********************************

आप आए --ग़ज़ल

आप आए दिल के आशियाने में क्या कहें क्या ना हुआ ज़माने में बात जो थी बस लवों तक आपके होगई है बयाँ हर फ़साने में । हम चलें उस आसमान के छोर तक, छोड़ना पङता है कुछ ,कुछ पाने में। प्रीति का यह चलन कब भाया किसे, कब कसर छोडेंगे ,ज़ुल्म ढाने में । इश्क फूलों का चमन ही तो नहीं, राह काँटों की है हर ज़माने में। ज़िंदगी हो गुले-गुलशन कब मज़ा, जो मज़ा काँटों में गुनगुनाने में। बात अपनी बने या ना बने श्याम, ना कसर रह जाय आज़माने में॥

एक त्रिपदा -अगीत ग़ज़ल --

लाख बद्दुआएं दीं दिल से बहुत चाहा न चाहें दिल से ; पर न निकल पाये वो दिल से । सोचा चले जायं महफ़िल से , यह न होगा अब तो दिल से ; बुलाया जो आपने दिल से । अब महफ़िल से जाएँ कैसे , बिना दीदार जाएँ कैसे; सदायें दीं आपने दिल से । लाख दुआ करे दुनिया, मन्नतें माने श्याम, दुनिया; न निकल पायें आपके दिल से। ।

यू. पी. की लस्सी!!!

ग र्मी आ चुकी है और काफी जोर से आई है, इस तरह की गर्मी दिल और दिमाग को ठंडक देने के लिए लोग तरह - तरह के शीतल पेय इस्तेमाल करते है...आजकल तो सॉफ्ट ड्रिंक फैशन में हैं हर कोई गर्मी लगने पर इन्ही सॉफ्ट ड्रिंक्स का इस्तेमाल करता है जो किसी भी लिहाज़ से सही नहीं है, सेहत को फायदा होने के बजाये नुक्सान ही होता है. लेकिन हमारे हिन्दुस्तान में बहुत सारे ऐसे कुदरती शीतल पेय इस्तेमाल होते है जो बहुत फायदेमंद, बहुत स्वादिष्ट और बहुत ही ताकतवर होते हैं इन्ही शीतल पेय में से एक मशहूर पेय है "लस्सी". अब आप लोगो को यह बताने की ज़रुरत नहीं है की "लस्सी" कैसे बनती है और इसमें क्या - क्या चीजे इस्तेमाल होती है. "लस्सी" पंजाब की बहुत ही मशहूर है वहां की लस्सी का कोई मुकाबला नहीं हैं वहां तो तांम्बे का नौ इंच से लेकर बारह इंच तक का गिलास होता है, एक गिलास पीने के बाद और पीने का दिल करता है लेकिन पेट इजाज़त नहीं देता... अब मैं आपको यू.पी. की लस्सी के बारे में बताता हूँ, यू.पी. में हर शहर में लस्सी अलग ही तरह से बनती है तो हम सबसे पहले शुरुआत करते है राजधानी से.... ल...

ग़ज़ल-दिल की लगी

दिल की लगी इस दिल्लगी पर क्यों न मर जाए कोई , या खुदा इस दिल्लगी पर ,क्या न कर जाए कोई ऐ जिंदगी ! तू ही बता , ये राज कैसा राज है , दिल मैं बस बैठा मगर ना दिल मैं बस पाये कोई दिल के करीव है वही जो आज हमसे दूर है, भूलना चाहें जिसे क्यों याद फ़िर आए कोई । दर्द तो दिल मैं है पर मीठी सी है तासीर भी , इस दर्दे दिल की दास्ताँ का क्या बयान गाये कोई । दिल की लगी की ये लगी मीठी तो है प्यारी भी है , श्याम मीठी छुरी के क्या ज़ख्म भर पाये कोई ।।