दोहों की दुनिया संजीव 'सलिल' देह नेह का गेह हो, तब हो आत्मानंद. स्व अर्पित कर सर्व-हित, पा ले परमानंद.. मन से मन जोड़ा नहीं, तन से तन को जोड़. बना लिया रिश्ता 'सलिल', पल में बैठे तोड़.. अनुबंधों को कह रहा, नाहक जग सम्बन्ध. नेह-प्रेम की यदि नहीं, इनमें व्यापी गंध.. निज-हित हेतु दिखा रहे, जो जन झूठा प्यार. हित न साधा तो कर रहे, वे पल में तकरार.. अपनापन सपना हुआ, नपना मतलब-स्वार्थ. जपना माला प्यार की, जप ना- कर परमार्थ.. भला-बुरा कब कहाँ क्या, कौन सका पहचान? जब जैसा जो घट रहा, वह हरि-इच्छा जान. बहता पानी निर्मला, ठहरा तो हो गंद. चेतन चेत न क्यों रहा?, 'सलिल' हुआ मति-मंद.. ********************