मुक्तक : आचार्य संजीव 'सलिल' By Divya Narmada April 20, 2009 सर को कलम कर लें भले, सरकश रहें हम. सजदा वहीं करेंगे, जहाँ आँख भी हो नम. उलझे रहो तुम घुंघरुओं, में सुनते रहो छम. हमको है ये मालूम,'सलिल'कम नहीं हैं गम. Read more