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pita ko dohanjali: sanjiv

पितृ दिवस पर-  पिता सूर्य सम प्रकाशक : संजीव  *  पिता सूर्य सम प्रकाशक, जगा कहें कर कर्म  कर्म-धर्म से महत्तम, अन्य न कोई मर्म   * गृहस्वामी मार्तण्ड हैं, पिता जानिए सत्य  सुखकर्ता भर्ता पिता, रवि श्रीमान अनित्य  * भास्कर-शशि माता-पिता, तारे हैं संतान  भू अम्बर गृह मेघ सम, दिक् दीवार समान  * आपद-विपदा तम हरें, पिता चक्षु दें खोल  हाथ थाम कंधे बिठा, दिखा रहे भूगोल  * विवस्वान सम जनक भी, हैं प्रकाश का रूप  हैं विदेह मन-प्राण का, सम्बल देव अनूप  * छाया थे पितु ताप में, और शीत में ताप छाता बारिश में रहे, हारकर हर संताप  * बीज नाम कुल तन दिया, तुमने मुझको तात अन्धकार की कोख से, लाकर दिया प्रभात  * गोदी आँचल लोरियाँ, उँगली कंधा बाँह  माँ-पापा जब तक रहे, रही शीश पर छाँह  * शुभाशीष से भरा था, जब तक जीवन पात्र  जान न पाया रिक्तता, अब हूँ याचक मात्र * पितृ-चरण स्पर्श बिन, कैसे हो त्यौहार  चित्र देख मन विकल हो, करता हाहाका...

doha salila : gataagat SANJIV

दोहा सलिला: गतागत सलिल * गर्व न जिनको विगत पर, जिन्हें आज पर शर्म। बदकिस्मत हैं वे सभी, ज्ञात न जीवन मर्म।। * विगत आज की प्रेरणा, बनकर करे सुधार। कर्म-कुंडली आज की, भावी का आधार।। * गत-आगत दो तीर हैं, आज सलिल की धार। भाग्य नाव खेत मनुज, थाम कर्म-पतवार।। * कौन कहे क्या 'सलिल' मत, करना इसकी फ़िक्र। श्रम-कोशिश कर अनवरत, समय करगा ज़िक्र।। * जसे मूल पर शर्म है, वह सचमुच नादान। तार नहीं सकते उसे, नर क्या खुद भगवान।। * दीप्ति भोर की ग्रहण कर, शशि बन दमका रात। फ़िक्र न कर वंदन करे, तेरा पुलक प्रभात।। * भला भले में देखते, हैं परदेशी विज्ञ। बुरा भेल में लिखते, हाय स्वदेशी अज्ञ।। * Sanjiv verma 'Salil' salil.sanjiv@gmail.com http://divyanarmada.blogspot.in

दोहा सलिला : रूपमती तुम... -संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला : रूपमती तुम... संजीव 'सलिल' * रूपमती तुम, रूप के, हम पारखी अनूप. तृप्ति न पाये तृषित गर, व्यर्थ रूप का कूप.. * जुही चमेली चाँदनी, चम्पा कार्सित देह. चंद्रमुखी, चंचल, चपल, चतुरा मुखर विदेह.. * नख-शिख, शिख-नख मक्खनी, महुआ सा पीताभ. तन पाताल रत्नाभ- मुख, पौ फटता अरुणाभ.. * वाक् सारिका सी मधुर, भौंह नयन धनु बाण. वार अचूक कटाक्ष का, रुकें न निकलें प्राण.. * सलिल-बिंदु से सुशोभित, कृष्ण-कुंतली भाल. सरसिज पंखुड़ी से अधर, गुलकन्दी टकसाल.. * देह-गंध मादक-मदिर, कस्तूरी अनमोल. ज्यों गुलाब-जल में 'सलिल', अंगूरी दी घोल.. * दस्तक कर्ण-कपाट पर, देते रसमय बोल. पहुँच माधुरी हृदय तक, कहे नयन-पट खोल.. * दाड़िम रद-पट मौक्तिकी, संगमरमरी श्वेत. रसना मुखर सारिका, पिंजरे में अभिप्रेत.. * वक्ष-अधर रस-गगरिया, सुख पा, कर रसपान. बीत न जाए उमरिया, रीते ना रस-खान.. * रस-निधि पा रस-लीन हो, रस पी हो लव-लीन. सरस सृष्टि, नीरस बरस, तरस न हो रस-हीन.. * दरस-परस बिन कब हुआ, कहो सृष्टि-विस्तार? दृष्टि वृष्टि कर स्नेह की, करे सुधा-संचार.. * कंठ सुराहीदार है, ...

भोजपुरी दोहे: संजीव 'सलिल'

भोजपुरी दोहे: संजीव 'सलिल' * नेह-छोह रखाब सदा, आपन मन के जोश. सत्ता दान बल पाइ त, 'सलिल; न छाँड़ब होश.. * कइसे बिसरब नियति के, मन में लगल कचोट. खरे-खरे पीछे रहल, आगे आइल खोट.. * जीए के सहरा गइल, आरच्छन के हाथ. अनदेखी काबलियत कs, लख- हरि पीटल माथ.. * आस बन गइल सांस के, हाथ न पड़ल नकेल. खाली बतिय जरत बा, बाकी बचल न तेल.. * दामन दोस्तन से बचा, दुसमन से मत भाग. नहीं पराया आपना, ला लगावत आग.. * प्रेम बाग़ लहलहा के, क्षेम सबहिं के माँग. सूरज सबहिं बर धूप दे, मुर्गा सब के बाँग.. * शीशा के जेकर मकां, ऊहै पाथर फेंक. अपने घर खुद बार के, हाथ काय बर सेंक?. *

दोहा गीत: धरती ने हरियाली ओढी --संजीव 'सलिल'

धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार., दिल पर लोटा सांप हो गया सूरज तप्त अंगार... * नेह नर्मदा तीर हुलसकर बतला रहा पलाश. आया है ऋतुराज काटने शीत काल के पाश. गौरा बौराकर बौरा की करती है मनुहार. धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार. * निज स्वार्थों के वशीभूत हो छले न मानव काश. रूठे नहीं बसंत, न फागुन छिपता फिरे हताश. ऊसर-बंजर धरा न हो, न दूषित मलय-बयार. धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार.... * अपनों-सपनों का त्रिभुवन हम खुद ना सके तराश. प्रकृति का शोषण कर अपना खुद ही करते नाश. जन्म दिवस को बना रहे क्यों 'सलिल' मरण-त्यौहार? धरती ने हरियाली ओढी, मनहर किया सिंगार.... *************** दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

बासंती दोहा ग़ज़ल -संजीव 'सलिल'

बासंती दोहा ग़ज़ल संजीव 'सलिल' स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार. किंशुक कुसुम विहंस रहे या दहके अंगार.. पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार. पवन खो रहा होश है, लख वनश्री श्रृंगार.. महुआ महका देखकर, बहका-चहका प्यार. मधुशाला में बिन पिए' सर पर नशा सवार.. नहीं निशाना चूकती, पञ्च शरों की मार. पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार.. नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार. देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार.. मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार. ऋतु बसंत में मन करे, मिल में गले, खुमार.. ढोलक टिमकी मंजीरा, करें ठुमक इसरार. तकरारों को भूलकर, नाचो गाओ यार.. घर आँगन तन धो लिया, सचमुच रूप निखार. अपने मन का मेल भी, हँसकर 'सलिल' बुहार.. बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार. सूरत-सीरत रख 'सलिल', निएमल-विमल सँवार.. ************************************ दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

सामयिक दोहे संजीव 'सलिल'

सामयिक दोहे संजीव 'सलिल' पत्थर से हर शहर में मिलते मकां हजारों. मैं ढूंढ-ढूंढ हरा, घर एक नहीं मिलता.. रश्मि रथी की रश्मि के दर्शन कर जग धन्य. तुम्हीं चन्द्र की ज्योत्सना, सचमुच दिव्य अनन्य.. राज सियारों का हुआ, सिंह का मिटा भविष्य. लोकतंत्र के यज्ञ में, काबिल हुआ हविष्य.. कहता है इतिहास यह, राक्षस थे बलवान. जिसने उनको मिटाया, वे सब थे इंसान.. इस राक्षस राठोड का होगा सत्यानाश. साक्षी होंगे आप-हम, धरती जल आकाश.. नारायण के नाम पर, सचमुच लगा कलंक. मैली चादर हो गयी, चुभा कुयश का डंक.. फंसे वासना पंक में, श्री नारायण दत्त. जैसे मरने जा रहा, कीचड में गज मत्त. कीचड में गज मत्त, लाज क्यों इन्हें न आयी. कभी उठाई थी चप्पल. अब चप्पल खाई.. ****************** Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com

दोहों की दुनिया संजीव 'सलिल'

दोहों की दुनिया संजीव 'सलिल' देह नेह का गेह हो, तब हो आत्मानंद. स्व अर्पित कर सर्व-हित, पा ले परमानंद.. मन से मन जोड़ा नहीं, तन से तन को जोड़. बना लिया रिश्ता 'सलिल', पल में बैठे तोड़.. अनुबंधों को कह रहा, नाहक जग सम्बन्ध. नेह-प्रेम की यदि नहीं, इनमें व्यापी गंध.. निज-हित हेतु दिखा रहे, जो जन झूठा प्यार. हित न साधा तो कर रहे, वे पल में तकरार.. अपनापन सपना हुआ, नपना मतलब-स्वार्थ. जपना माला प्यार की, जप ना- कर परमार्थ.. भला-बुरा कब कहाँ क्या, कौन सका पहचान? जब जैसा जो घट रहा, वह हरि-इच्छा जान. बहता पानी निर्मला, ठहरा तो हो गंद. चेतन चेत न क्यों रहा?, 'सलिल' हुआ मति-मंद.. ********************