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एक बार फिर से धर्म के नाम पे लोगो को काटने को तयारी

ए क बार फिर से धर्म के नाम पे लोगो को काटने कि तयारी कर रही है BJP. बकवास , राजनाथ सिंह बेवाकुफ्फ़ बनाना चाहते हैं ,वो सोच रहे हैं की लोग इस बकवास के पचडे में पड़ने के लिए वोट देंगे , ये B.J.P. की सबसे बड़ी गलती है . आब पब्लिक समझदार हो गई है और मुझे लगता है की BJP हमेसा k लिए गायब हो जायेगी . धर्म की राजनीति करके ये लोग na सिर्फ़ पार्टी बल्कि हमारे भारत देश का भी नाम ख़राब क़र रहे हैं ये लोग . मुझे लगता है ये लोग दिमागी तौर से बीमार हैं , इन्हे चेयर की नही मेंटल हॉस्पिटल की जरूरत है . धर्म के नाम पे कई सारे संघ बन गए हैं जिनमे 99% आतंकवादी वाले काम करते हैं , जैसे अभी मंगलोर में राम सेना ने जो किया वो बहूत ही सर्म्नक था . संघ का नाम राम सेना और भगवन राम के आदर्शो को ही भूल गए ? . और वो दूसरा वो ढोंगी बाबा मलेगओं ब्लास्ट वाला - आब उसे कौन समझाए की "साधू " का मतलब "अच्छा " होता है .कोई तो समझाए BJP को की ये भड़काऊ बयां न दे , इससे राजनाथ जैसे नेता को तो कुछ नही होगा लेकिन जो "आम आदमी " है उनकी जिंदगी में समस्याएं बढ़ जायेगी । में लोगो से भी गुजारिश करूँगा की ल...

भारत का वसीम अकरम...जहीर

मनीष कुमार असिस्टेंट प्रोड्यूसर दोनों बाएं हाथ के गेंदबाज। दोनों ही तेज गेंदबाज। दोनों का एक जैसा अंदाज, एक जैसा जोश और एक जैसा ही जज्बा। एक वसीम अकरम तो दूसरा जहीर खान। वैसे वसीम अकरम से जहीर खान की तुलना तो बेमानी होगी लेकिन हाल के दिनों में जहीर ने जिस तरह गेंदबाजी की है वो अकरम से कम नहीं है। आज से करीब 9 साल पहले जब जहीर ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा था तो लोग उनकी तुलना वसीम अकरम से करने लगे थे। लेकिन कुछ साल बाद ही जहीर की गेंदों की धार खत्म हो गई। ऐसा लगा कि उनके करियर का अस्त हो गया है। साल 2006 में दक्षिण अफ्रीका दौरे के बाद जहीर का अलग रूप देखने को मिला। उन्होंने अपनी गेंदबाजी से एक बार फिर अकरम की याद दिला दी। - मौजूदा दौर में जहीर, अकरम की तरह गेंद को विकेट के दोनों और स्विंग करा सकते हैं। - गेंद पुरानी हो या नई, उन्हें अकरम की तरह कोई फर्क नहीं पड़ता। - जहीर तेज गेंदों के साथ-साथ स्लोअर गेंदों का भी बखूबी इस्तेमाल करते हैं। - अकरम ने दुनिया की हर पिच पर शानदार गेंदबाजी की। वही हाल इन दिनों जहीर का है। वो चाहे भारतीय उपमहाद्वीप की बेजान विकेट हो या फिर ऑस्ट्रेलिया,...

किस मुंह से धोनी के पास जाओगे…

हरीश चंद्र बर्णवाल क हते हैं टीम इंडिया में एक से बढ़कर एक हीरा है। कहते हैं इस समय की इंडियन क्रिकेट टीम देश की सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट टीम है। कहते हैं भारतीय क्रिकेट का बैटिंग लाइनअप इससे बढ़िया कभी नहीं रहा। बॉलिंग में भी ऐसी वैरायटी कभी नहीं रही। ये टीम दुनिया की किसी भी टीम का कहीं भी मुकाबला कर सकती है। इस टीम में क्रिकेट के सभी फॉर्मेट में जीतते रहने का हुनर है। इसे सिर्फ जीतना आता है। हारना तो बस समझ लीजिए कि जब ये टीम चाहेगी तभी हारेगी। पर ये क्या...? नेपियर में तो पूरी टीम ही नप गई! क्या बैटिंग, क्या बॉलिंग और क्या फील्डिंग, हर मोर्चे पर इतना लिजलिजापन! क्या हो गया टीम इंडिया को?वही सचिन, वही सहवाग, वही लक्ष्मण, द्रविड़, विस्फोटक युवराज भी हैं। मगर सबके सब तीन सौ तक पहुंचते-पहुंचते ही निपट गए। ये भी न सोचा कि कीवियों ने रनों का पहाड़... आगे पढ़ें के आगे यहाँ

‘फिराक’ उन फिल्मों में से है, जो सोचने पर मजबूर करती है!

मनोरंजन के साथ-साथ फिल्म अपनी बात कहने या विचार प्रकट करने का भी सशक्त माध्यम है। 2002 में गुजरात में दंगों की आड़ में जो कुछ हुआ उससे अभिनेत्री नंदिता दास भी आहत हुईं और उन्होंने अपनी भावनाओं को ‘फिराक’ के जरिये पेश किया है। युद्ध या हिंसा कभी भी किसी समस्या का हल नहीं हो सकते। इनके खत्म होने के बाद लंबे समय तक इनका दुष्प्रभाव रहता है। फिराक में भी दंगों के समाप्त होने के बाद इसके ‘आफ्टर इफेक्ट्स’ दिखाए गए हैं। हिंसा में कई लोग मर जाते हैं, लेकिन जो जीवित रहते हैं उनका जीवन भी किसी यातना से कम नहीं होता। इस सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में वे लोग भी आते हैं, जिनका घर जला नहीं या कोई करीबी मारा नहीं गया है। फिल्म में 6 कहानियाँ हैं जो आपस में गुँथी हुई हैं। इसके पात्र हर उम्र और वर्ग के हैं, जिनकी जिंदगी के 24 घंटों को दिखाया गया है। पति (परेश रावल) का अत्याचार सहने वाली मध्यमवर्गीय पत्नी (दीप्ति नवल) को इस बात का पश्चाताप है कि वह दंगों के समय अपने घर के बाहर जान की भीख माँगने वाली महिला की कोई मदद नहीं कर सकी।  संजय सूरी एक उच्चवर्गीय और पढ़ा-लिखा मुस्लिम है, जिसने हिं...