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नवगीत : ओढ़ कुहासे की चादर संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत :  ओढ़ कुहासे की चादर  संजीव वर्मा 'सलिल' * ओढ़ कुहासे की चादर, धरती लगाती दादी। ऊँघ रहा सतपुडा, लपेटे मटमैली खादी... * सूर्य अंगारों की सिगडी है, ठण्ड भगा ले भैया। श्वास-आस संग उछल-कूदकर नाचो ता-ता थैया। तुहिन कणों को हरित दूब, लगती कोमल गादी... * कुहरा छाया संबंधों पर, रिश्तों की गरमी पर। हुए कठोर आचरण अपने, कुहरा है नरमी पर। बेशरमी नेताओं ने, पहनी-ओढी-लादी... * नैतिकता की गाय काँपती, संयम छत टपके। हार गया श्रम कोशिश कर, कर बार-बार अबके। मूल्यों की ठठरी मरघट तक, ख़ुद ही पहुँचा दी... * भावनाओं को कामनाओं ने, हरदम ही कुचला। संयम-पंकज लालसाओं के पंक-फँसा-फिसला। अपने घर की अपने हाथों कर दी बर्बादी... * बसते-बसते उजड़ी बस्ती, फ़िर-फ़िर बसना है। बस न रहा ख़ुद पर तो, परबस 'सलिल' तरसना है। रसना रस ना ले, लालच ने लज्जा बिकवा दी... * हर 'मावस पश्चात् पूर्णिमा लाती उजियारा। मृतिका दीप काटता तम् की, युग-युग से कारा। तिमिर पिया, दीवाली ने जीवन जय गुंजा दी... *****

कविता: जीवन अँगना को महकाया -संजीव 'सलिल'

कविता: जीवन अँगना को महकाया संजीव 'सलिल' * * जीवन अँगना को महकाया श्वास-बेल पर खिली कली की स्नेह-सुरभि ने. कली हँसी तो फ़ैली खुशबू स्वर्ग हुआ घर. कली बने नन्हीं सी गुडिया. ममता, वात्सल्य की पुडिया. शुभ्र-नर्म गोला कपास का, किरण पुंज सोनल उजास का. उगे कली के हाथ-पैर फिर उठी, बैठ, गिर, खड़ी हुई वह. ठुमक-ठुमक छन-छननन-छनछन अँगना बजी पैंजन प्यारी दादी-नानी थीं बलिहारी. * कली उड़ी फुर्र... बनकर बुलबुल पा मयूर-पंख हँस-झूमी. कोमल पद, संकल्प ध्रुव सदृश नील-गगन को देख मचलती आभा नभ को नाप रही थी. नवल पंखुडियाँ ऊगीं खाकी मुद्रा-छवि थी अब की बाँकी. थाम हाथ में बड़ी रायफल कली निशाना साध रही थी. छननन घुँघरू, धाँय निशाना ता-ता-थैया, दायें-बायें लास-हास, संकल्प-शौर्य भी कली लिख रही नयी कहानी बहे नर्मदा में ज्यों पानी. बाधाओं की श्याम शिलाएँ संगमरमरी शिला सफलता कोशिश धुंआधार की धरा संकल्पों का सुदृढ़ किनारा. * कली न रुकती, कली न झुकती, कली न थकती, कली न चुकती. गुप-चुप, गुप-चुप बहती जाती. नित नव मंजिल गहती जाती. कली हँसी पुष्पायी आशा. सफल साधना, फलित ...

शोक गीत: आचार्य संजीव 'सलिल'

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ शोक गीत: -आचार्य संजीव 'सलिल' (प्रसिद्ध कवि-कथाकार-प्रकाशक, स्व. डॉ. (प्रो.) दिनेश खरे, विभागाध्यक्ष सिविल इंजीनियरिंग, शासकीय इंजीनियरिंग महाविद्यालय जबलपुर, सचिव इंडियन जियोटेक्नीकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर के असामयिक निधन पर ) नर नहीं, नर-रत्न थे तुम, समय कीमत कर न पाया... *** विरल थी प्रतिभा तुम्हारी. ज्ञान के थे तुम पुजारी. समस्याएँ बूझते थे. रूढियों से जूझते थे. देव ने क्षमताएँ अनुपम देख क्या असमय बुलाया?... *** नाथ थे तुम 'निशा' के पर शशि नहीं, 'दिनेश' भास्वर. कोशिशों में गूँजता था लग्न-निष्ठा वेणु का स्वर. यांत्रिकी-साहित्य-सेवा दिग्-दिगन्तों यश कमाया... *** ''शीघ्र आऊंगा'' गए-कह. कहो तो, हो तुम कहाँ रह? तुम्हारे बिन ह्रदय रोता नयन से आँसू रहे बह. दूर 'अतिमा' से हुए- 'कौसुन्न' को भी है भुलाया... *** प्राण थे 'दिनमान' के तुम. 'विनय' के अभिमान थे तुम. 'सुशीला' की मृदुल ममता, स्वप्न थे अरमान थे तुम. दिखाए- सपने सलोने कहाँ जाकर, क्यों भ...

नवगीत

गीत आचार्य संजीव 'सलिल' आपा-धापी, दौड़ा-भागी, हाय! यही अब रही जिंदगी... राहु-केतु से रवि-शशि हैराँ। असत सत्य को करे परेशां। दाना पर हावी हैं नादां- है बनावटी, देव-बंदगी... सदियाँ भोगें पलों की खता। नातों से है नेह लापता। मन को तन ही रहा है सता। घर-घर व्यापी है दरिंदगी... ***********

एक मुक्तक : आचार्य संजीव 'सलिल'

देश इष्ट ईमान धर्म रब गॉड खुदा ईश्वर है अपना। पथ पग पथिक लक्ष्य साधन यह साध्य साधना सच औ' सपना।। श्वास-आस परिहास हर्ष दुःख मिलन-विरह वात्सल्य भक्ति भी- देश-प्रेम को नाप सके जो बना न 'सलिल' जगत में नपना ।। **********************************************

चंद अशआर : रात आचार्य संजीव 'सलिल'

पाक दामन दिख रहे हैं, दिन में हम भी दोस्तों। रात का मत ज़िक्र करना, क्या पता कैसे-कहाँ? पाक दामन दिख रहे हैं दिन में वो भी दोस्तों। रात भी शर्मा के जिनसे, दिनमें दिखती है नहीं। सागरों-मीना 'सलिल' को दिन में छू पाते नहीं। रात हो, बरसात हो तो कोई क्यों इनसे बचे? रात की बात ही निराली है। उजली सूरत भी लगे काली है॥ अँधेरा जितना घना हो रात में। सुबह उतनी खूबसूरत हो 'सलिल'॥ *************************

कविता आमंत्रण : अन्तिम तिथि ३०.५.२००९

साहित्य समाचार: भारतीय वांग्मय पीठ कोलकाता द्बारा नमामि मातु भारती २००९ हेतु रचना आमंत्रित अतिथि संपादक आचार्य संजीव 'सलिल' के कुशल संपादन में शीघ्र प्रकाश्य कोलकाता। विश्ववाणी हिन्दी के में श्रेष्ठ साहित्य सृजन की पक्षधर भारतीय वांग्मय पीठ कोलकाता द्वारा वश २००२ से हर साल एक स्तरीय सामूहिक काव्य संकलन का प्रकाशन किया जाता है. इस अव्यावसायिक योजना में सम्मिलित होने के लिए रचनाकारों से राष्ट्रीय भावधारा की प्रतिनिधि रचना आमंत्रित है. यह संकलन सहभागिता के आधार पर प्रकाशित किया जाता है. इस स्तरीय संकलन के संयोजक-संपादक श्री श्यामलाल उपाध्याय तथा अतिथि संपादक आचार्य संजीव 'सलिल', संपादक दिव्य नर्मदा हैं. हर सहभागी से संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्मतिथि, जन्मस्थान, आजीविका, संपर्क सूत्र, दूरभाष/चलभाष, ईमेल/चिटठा (ब्लोग) का पता, श्वेत-श्याम चित्र, नाम-पता लिखे २ पोस्ट कार्ड तथा अधिकतम २० पंक्तियों की राष्ट्रीय भावधारा प्रधान रचना २५०/- सहभागिता निधि सहित आमंत्रित है. हर सहभागी को संकलन की २ प्रतियाँ निशुल्क भेंट की जायेंगी जिनका डाकव्यय पीठ वहन करेगी. हर सहभागी की प्रतिष्ठा में ...

कविता:

जीवन का सत्य आचार्य संजीव 'सलिल' मुझे 'मैं' ने, तुझे 'तू' ने, हमेशा ही दिया झाँसा। खुदी ने खुद को मकडी की तरह जाले में है फांसा। । निकलना चाहते हैं हम नहीं, बस बात करते हैं। खुदी को दे रहे शह फिर खुदी की मात करते हैं। चहकते जो, महकते जो वही तो जिन्दगी जीते। बहकते जो 'सलिल' निज स्वार्थ में वे रह गए रीते। भरेगा उतना जीवन घट करोगे जितना तुम खाली। सिखाती सत्य जीवन का हमेशा खिलती शेफाली। ******************************************

वेश्या भी औरत है, उसकी आत्मा से न खेलिए

औरत में सागर सी गहराई और हिमालय सी ऊँचाई होती है. जिस तरह से सागर की गहराई से गंदगी के साथ सीप और मोती साथ-साथ पाए जाते हैं, उसी प्रकार औरत के हर रूप में एक रूप वेश्या का भी है. यहां एक उदाहरण देना चाहूगा. अगर हम सड़क पर जा रहे हैं और हमारे हाथ में खाने का टिफिन गिर जाये तो हम उस खाने को तो उसी सड़क पर छोड़ देते हैं मगर खाली टिफिन उठा कर घर में लाकर रख देते हैं. हम इस बात को अगर एक औरत की जिन्दगी से जोड़ कर देखें. हमारे देश की औरत इसी तरह की जिन्दगी जी रही है. औरत मां है, औरत बहन है, औरत पत्नी है, औरत देवी है. औरत एक ही है मगर औरत को देखने का हमारा नजरिया अलग-अलग है. यही नजरिया और नजर औरत के साथ हमारे रिश्ते का नामकरण करती है। यह सब जानते हैं कि औरत से ही हमारी सृष्टि चलती है. हम सभी कहते रहते हैं कि हमारा देश नारी प्रधान देश है और हमारे यहां नारी को देवी माना गया है. हम औरतों की पूजा करते हैं, मंदिर में जाकर. एक औरत जो पत्थर की मूरत में है, हम उसकी पूजा तो करते हैं और उसको कपड़े भी पहनाते हैं मगर दूसरी तरफ अगर वही औरत किसी कोठे पर मिल जाये तो चंद रुपये देकर हम लोग ही उसके कपड़े उतारने ...

आचार्य संजीव 'सलिल' जी की तीन लघुकथाएँ

जनतंत्र 'जनतंत्र की परिभाषा बताओ' राजनीतिशास्त्र के शिक्षक ने पूछा. ' जहाँ जन का भाग्य विधाता तंत्र हो' - एक छात्र ने कहा. ' जहाँ ग़रीब जनगण के प्रतिनिधि अमीर हों.' - दूसरे ने कहा. ' जहाँ संकटग्रस्त जनगण की दशा जानने के लिए प्रतिनिधि आसमान की सैर करें.' तीसरे की राय थी. ***** रावण-दहन - 'दादाजी! दशहरे पर रावण का पुतला क्यों जलाया जता है?' - ' रावण ने सीता मैया का धोखे से अपहरण कर विश्वासघात किया था. इसलिए.' - 'आप उस दिन कह रहे थे हमारे विधायक ने जनता से विश्वासघात किया है तब उसको क्यों नहीं...' - 'चुप राह. बकवास मत कर.' ***** ...

आचार्य संजीव 'सलिल' जी की नयी लघुकथा

लघुकथा स्वजन तंत्र राजनीति विज्ञान के शिक्षक ने जनतंत्र की परिभाषा तथा विशेषताएँ बताने के बाद भारत को विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र बताया तो एक छात्र से रहा नहीं गया. उसने अपनी असहमति दर्ज करते हुए कहा- ' गुरु जी! भारत में जनतंत्र नहीं स्वजन तंत्र है.' ' किताब में एसे किसी तंत्र का नाम नहीं है.' - गुरु जी बोले. ' कैसे होगा? यह हमारी अपनी खोज है और भारत में की गयी खोज को किताबों में इतनी जल्दी जगह मिल ही नहीं सकती. यह हमारे शिक्षा के पाठ्य क्रम में भी नहीं है लेकिन हमारी ज़िन्दगी के पाठ्य क्रम का पहला अध्याय यही है जिसे पढ़े बिना आगे का कोई पाठ नहीं पढ़ा जा सकता.' छात्र ने कहा. ' यह स्वजन तंत्र होता क्या है? यह तो बताओ.' -सहपाठियों ने पूछा. ...

आचार्य संजीव 'सलिल' की लघु कथा

जंगल में जनतंत्र जंगल में चुनाव होनेवाले थे. मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे.- ' जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर कदम रखिये. सिर्फ़ अपना नहीं सबका भला सोचिये.' ' मंत्री जी! लाइसेंस दिलाने के लिए धन्यवाद. आपके कागज़ घर पर दे आया हूँ. ' भाषण के बाद चतुर सियार ने बताया. मंत्री जी खुश हुए. तभी उल्लू ने आकर कहा- 'अब तो बहुत धांसू बोलने लगे हैं. हाऊसिंग सोसायटी वाले मामले को दबाने के लिए रखी' और एक लिफाफा उन्हें सबकी नज़र बचाकर दे दिया. विभिन्न महकमों के अफसरों उस अपना-अपना हिस्सा मंत्री जी के निजी सचिव गीध को देते हुए कामों की जानकारी मंत्री जी को दी. समाजवादी विचार धारा के मंत्री जी मिले उपहारों और लिफाफों को देखते हुए सोच रहे थे - 'जंगल में जनतंत्र जिंदाबाद. ' ************************** कल हम फिर हाजिर होने आचार्य संजीव 'सलिल' जी की नयी लघुकथा के साथ ''हिन्दुस्ता...

आचार्य संजीव 'सलिल' जी की रचना

आचार्य संजीव 'सलिल' स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार. किंशुक कुसुम विहंस रहे, या दहके अंगार? पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार होश खो राह है पवन, लख वनश्री-श्रृंगार. महका महुआ देखकर, सहसा बहका प्यार. मधुशाला जाए बिना, सिर पर नशा सवार. नहीं निशाना चूकती. पञ्चशरों की मार. पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार. नैन मिले, झुक, उठ, लड़े, करने को इंकार. देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार. मैं-तुम, यह-वह ही नहीं, बौराया संसार. फागुन में मिलते गले. सब को हुआ खुमार. ढोलक, टिमकी, मंजीरा, करें ठुमक इसरार. फगुनौटी में मस्त हो, नाचो-गाओ यार. घर-आँगन,तन धो, लिया तुमने रूप निखार. अंतर्मन का मेल भी, गुपचुप कभी बुहार. बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार. स्नेह-साधना कर 'सलिल', श्वासें रखो संवार. आगे यहाँ

फिर मचल उठे अल्फाज़ आतंकवाद के खात्मे को

फिर मचल पड़ें है अल्फाज़ आतंकवाद के विरोध को,फिर छेड़ दी है हमने ज़ंग आतंकवाद के खात्मे को तो दोस्तों दिल मे दबे जोश को बाहर निकालिए और रखिये अपनी बात इस मंच पर,क्योंकि यह हमारी और हमारे देश की सुरक्षा का सवाल है ! ''हिन्दुस्तान का दर्द''द्वारा आयोजित बहस मे एक बार फिर हम हाजिर है आचार्य संजीव 'सलिल' की एक रचना लेकर !तो पढिये इस रचना को और दीजिये अपनी राय! अबकी बार होली में. करो आतंकियों पर वार अबकी बार होली में. न उनको मिल सके घर-द्वार अबकी बार होली में. बना तोपोंकी पिचकारी चलाओ यार अब जी भर. निशाना चूक न पाए, रहो गुलज़ार होली में. बहुत की शांति की बातें, लगाओ अब उन्हें लातें. न कर पायें घातें कोई अबकी बार होली में. पिलाओ भांग उनको फिर नचाओ भांगडा जी भर. कहो बम चला कर बम, दोस्त अबकी बार होली में. छिपे जो पाक में नापाक हरकत कर रहे जी भर. करो बस सूपड़ा ही साफ़ अब की बार होली में. न मानें देव लातों के कभी बातों से सच मानो. चलो नहले पे दहला यार अबकी बार होली में. जहाँ भी छिपे हैं वे, जा वहीं पर खून की होली. चलो खेलें 'सलिल' मिल साथ अबकी बार होली में. जहाँ ...