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Showing posts with the label बचपन

बचपन, आंखें नम हैं!!

फ़राज़ खान... आज भी याद है, वो बचपन जब परियों की कहानी हकीकत होती थीं। गुज़रते वक्त के साथ परियां कहानी हो गईं, एक खूबसूरत ख्वाब जिसे बचपन कहा था, खुशियां मां की वो मुस्कुराहट थी, डर उसका रूठ जाना था, अब्बा की दी अठन्नी होती थी कमाई, दादा की गोद में बिस्तर मस्ताना था। दादा के दालान की हरी घास में वो धूप का बहना, वो बारिश की पहलॊ बूंदों से मिट्टी की महक उड़ना, आज भी लगता है कि वो कल ही की बात है, अभी तो रात हुई है कल सुबह देखना वही नर्म हाथ तुम्हें उस गर्म कम्बल से उठायेंगे, खुद हल्के से गुनगुने पानी से नहलायेंगे, वो उजड़ा सा बस्ता लेकर मैं स्कूल को जाउंगा, सबक जो याद ना किया उस पे मार खाउंगा। पहले घण्टे में ही डब्बा खत्म, और खाने की घण्टी तक तो सब कुछ हज़म, उस अठन्नी का फ़िर वहीं काम आयेगा, उसका साथी भी मिला तो जमूरा समोसा भी खायेगा। ज़िन्दगी की रफ़्तार ने वो ख्वाब धुंधला कर दिया, उस अठन्नी का क्या कसूर था जो उसे फ़कीर की कटोरी में तन्हा छोड़ दिया, आज भी वो ठिठुरती है उस ठण्डी सर्द कटोरी में। एक वक्त रहती थी गर्म उम्मीद से भरी मासूम मुठ्ठी में। जब दिल की धढ़्कनों से हम रिश्ते पहचानते थ...

ऐसे बदलें शिक्षा का चेहरा

हमारे यहां बच्चों की बढ़ती संख्या के अनुपात में अच्छे स्कूलों का नितांत अभाव है। एक अनुमान के अनुसार यदि छात्र-शिक्षक अनुपात को संतोषजनक स्तर पर बरकरार रखना है तो हमें कम से कम तीन गुना अधिक स्कूल चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सरकार के पास इतना पैसा नहीं है कि वह सभी स्कूलों को वित्तीय सहायता दे सके। स्कूलों को वित्तीय दृष्टि से स्वयं सक्षम होना होगा। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल भी हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नक्शेकदम पर चल रहे हैं। सिब्बल के पास नेहरू के जैसा ही विजन है, नेहरू के समान ही एक सपना है। लेकिन दुर्भाग्य से नेहरू के समान ही सिब्बल भी प्राथमिक शिक्षा की तुलना में उच्च शिक्षा को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। सवाल है कि दस साल की सड़ी-गली शिक्षा से जो नुकसान हो चुका होगा, क्या उसकी खानापूर्ति चार-पांच साल की कॉलेज शिक्षा से की जा सकती है? विभिन्न अध्ययनों व सर्वे से एक बात सामने आई है कि बिहार के प्राथमिक स्कूलों के बच्चों का प्रदर्शन महाराष्ट्र, गुजरात या मध्यप्रदेश के स्कूली बच्चों से बेहतर रहा है। इसकी एक वजह यह हो सकती...

वीकएंड टाइमपास...

देश फिलहाल बड़ी-बड़ी चिंताओं से घिरा है। कहीं चुनावी घोषणा पत्र जारी हो रहे हैं, आईपीएल साउथ अफ्रीका चला गया है, अक्षय कुमार पर केस चल रहा है...... यानि सबकी अपनी अपनी चिंताएं हैं...इन चिंताओ के बीच इन नन्हे मुन्नो के टेंशन को देखिए, शायद एक पल को आप का तनाव दूर हो जाए। भास्कर डॉट कॉम के व्यूअर्स ने हमें भेजा है नन्हें मुन्नों का एक चटपटा सा चित्र ... हमनें सोचा वीकएंड पर इसे आपके साथ शेयर करें। आगे पढ़ें के आगे यहाँ

किस मुंह से धोनी के पास जाओगे…

हरीश चंद्र बर्णवाल क हते हैं टीम इंडिया में एक से बढ़कर एक हीरा है। कहते हैं इस समय की इंडियन क्रिकेट टीम देश की सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट टीम है। कहते हैं भारतीय क्रिकेट का बैटिंग लाइनअप इससे बढ़िया कभी नहीं रहा। बॉलिंग में भी ऐसी वैरायटी कभी नहीं रही। ये टीम दुनिया की किसी भी टीम का कहीं भी मुकाबला कर सकती है। इस टीम में क्रिकेट के सभी फॉर्मेट में जीतते रहने का हुनर है। इसे सिर्फ जीतना आता है। हारना तो बस समझ लीजिए कि जब ये टीम चाहेगी तभी हारेगी। पर ये क्या...? नेपियर में तो पूरी टीम ही नप गई! क्या बैटिंग, क्या बॉलिंग और क्या फील्डिंग, हर मोर्चे पर इतना लिजलिजापन! क्या हो गया टीम इंडिया को?वही सचिन, वही सहवाग, वही लक्ष्मण, द्रविड़, विस्फोटक युवराज भी हैं। मगर सबके सब तीन सौ तक पहुंचते-पहुंचते ही निपट गए। ये भी न सोचा कि कीवियों ने रनों का पहाड़... आगे पढ़ें के आगे यहाँ

ऐसा भी होता है जमानें में .....

बात उस समय की है जब मै हाई स्कूल में पढ़ रहा था । रेडियो पर सुना की आज नामीबिया दिवस है । समझ नही पाया । स्कूल में जब मैंने अपने भूगोल के टीचर से पूछा तो उन्होंने थोडी देर सोचा .... फ़िर बताया की नामीबिया का मतलब खुशी होता है ...यह दिवस विदेशों में खुशी को हासिल करने के निमित मनाया जाता है । मै संतुष्ट हो गया । करीब एक साल बाद मुझे पता चला की नामीबिया अफ्रीका का एक देश है और वह अपने स्थापना दिवस को नामीबिया दिवस के रूप में मनाता है । यह जानकर काफी हैरानी हुई..... अब सोचता हूँ ... एक न एक दिन तो पोल खुल ही जाती है सो बरगलाना छोड़ देना ही समझदारी है ... इज्जत का कबाडा तो अलग ही होता है । हम अपनी नजरों में ही गिर जाते है ।