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Showing posts with the label अल्लाह

सपने बोए आंसू काटे

हर्ष मंदर उसके बेटे बाबू ने उसे घर के पीछे गौशाला में मरा हुआ पाया। कुसारा मल्लागौड़ ने पिछली रात कीटनाशक दवा पी ली थी और अपने आखिरी क्षणों में नि:शब्द छप्पर के नीचे पड़ा रहा, जहां कोई उसकी आवाज नहीं सुन सका। जिंदगी की अंतिम घड़ियों में वह बिल्कुल अकेला पीड़ा से कराह रहा था। यह बिल्कुल तय था कि जैसे उसने जिंदगी जी थी, ठीक वैसे ही अकेले मरना चाहता था। वह हमेशा अपनी यंत्रणाओं को अकेले सहते हुए परिवार के लिए रक्षा कवच बना रहा, लेकिन अंतत: उसने उन सबको अकेला छोड़ दिया। उस दुख के सामने उसने घुटने टेक दिए, जो हाल के वर्षो में हिंदुस्तान के गांवों में महामारी जैसा फैल रहा है। ऐसा भयानक अवसाद, जो 22,000 किसानों की जिंदगियां लील चुका है और खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। बाबू की उम्र मुश्किल से 19 बरस थी। अचानक उसने खुद को परिवार में सबसे बड़ा पाया। उसकी दादी और बुआ दहाड़ें मारकर रो रही थीं, लेकिन उसने हिम्मत से आंसुओं को रोके रखा। ‘अगर उसने हमें बताया होता तो हम उसका कर्ज चुकाने के लिए घर का एक-एक सामान बेच देते,’ कुसारा की बहन बिलख रही थी। आसपास इकट्ठा हुए गांव के लोगों ने कहा, ‘जब दूसरे हिम्मत...

यास्मीन की कला में समाया कण्डोम

सतीश सिंह यास्मीन एक तो मुस्लिम औरत हैं ऊपर से बिहार जैसे परंपरागत राज्य के पिछड़े हुए गांव में रहती हैं. लेकिन यास्मीन जो काम कर रही है वह तथाकथित आधुनिक और सभ्य समाज की भी किसी महिला के लिए शायद ही संभव हो. अपने मधुबनी कला के जरिए सेक्स शिक्षा का संदेश दे रही है. उनकी ही तर्ज पर मधुबनी की कुछ और महिला कलाकार कला को नयी परिभाषा दे रही हैं. हमारे समाज में सेक्स को वर्जित माना जाता है और शारारिक जरुरतों की अवहेलना की जाती है। दरअसल जीवन को संपूर्णता में जीने की कोशिश कोई नहीं करना चाहता। यौन कार्यकलापों को अश्लीलता की श्रेणी में रखा जाता है। इसका मूल कारण है हमारी सभ्यता और संस्कृति, जो हमें उन्मुक्त एवं स्वछंद होने से रोकती है। इस पूरे कवायद में हम इतने शालीन हो जाते हैं कि कंडोम और अन्यान्य जरुरी ऐतिहातों को बरतना ही भूल जाते हैं। आज सेक्स से जुड़ी समस्याओं पर बात करने के लिए कोई तैयार नहीं है। इस संबध में सरकार द्वारा उठाये जा रहे कदम भी नाकाफी हैं। इसी अधूरे काम को करने का बीड़ा उठाया है बिहार की कुछ ग्रामीण महिला कलाकारों ने की जिसमें उत्तर बिहार की रहनेवाली यास्मीन भी शामिल ...

मुस्लिम बेटे ने किया हिंदू रीति से पिता का अंतिम संस्कार

जावरा. शिक्षाविद् एक हिंदू पिता का देहांत होने पर उसके मुस्लिम बेटे ने हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया। सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन गुरुवार को यहां पिता के प्रति प्रेम और एकता की आदर्श मिसाल कायम हुई है। विज्ञान और गणित विषय के विशेषज्ञ आर.के. मजूमदार का गुरुवार को देहांत हुआ। वे 62 वर्ष के थे और वर्ष 1980 में कलकत्ता से काम की तलाश में जावरा आए थे। कुछ समय प्रीमियर ऑयल मिल में काम किया लेकिन शिक्षा का ज्ञान उन्हें शिक्षा जगत में ले आया। कई साल से वे पिपलौदा रोड स्थित एमरॉल्ड स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहे थे। इनसे शिक्षा लेकर कई बच्चे विदेशों में नाम कमा चुके हैं। यहां उनका अपना कोई न था ऐसे में पुरानी धानमंडी स्थित पुराने महल में रहने वाले बादशाह मियां उनके जीवन में आए और श्री मजूमदार को उन्होंने परिवार में बेटे का स्थान दिया। बादशाह मियां के देहांत के बाद उनके बेटे अमजद को श्री मजूमदार ने गोद ले लिया। अमजद फिलहाल मुगलपुरा में रहता है और श्री मजूमदार भी बीमार होने से पहले तक उनके साथ ही रहते थे। अपना अधिकांश समय एमरॉल्ड स्कूल के विकास की सोच में लगाते थे और इसीलिए गुरुवार को...

कब्रों की ज़ियारत किस लिये?

मुझ से यह सवाल हमारे एक भाई मे ई-मेल से पूछा था तो मै उस्का जवाब यहा दे रहा हू । सवाल :- कब्रों की ज़ियारत मज़ारों से वसीला लेना और (चढावे के तौर पर) वहां माल और दुंबे आदि ले जाने का क्या हुक्म है? जैसा कि लोग सय्यद अल-बदवी (सुडान में), हज़रत हुसैन बिन अली रज़ि ॒ (इराक में), और हज़रत जैनब रज़ि ॒ (मिस्र) कि कब्रों पर करते हैं । आप जवाब दें, अल्लाह आप के इल्म में बरकत दे । आमीन जवाब :- कब्रों के ज़ियारत की दो किस्में हैं । पहली किस्म वह है जो कब्र वालों पर रहम व मेह्र्बानी करने, उनके लिये दुआ करने, मौत को याद रखने और आखिरत कि तय्यारी के लिये कि जाये । यह ज़ियारत जाइज़ है और ऐसी ज़ियारत की आवश्यक्ता भी हैं । क्यौंकि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहिंं वसल्लम का फ़र्मान है । आगे पढ़े ...