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काम और दर्द का रिश्ता

अगर आप पीठ के भीषण दर्द से गुजर रहे हैं और हर रोज घर लौटने पर अपने जीवनसाथी से दर्द निवारक मरहम लगाने को कहते हैं, तो किसी आथरेपेडिक डॉक्टर के पास जाने से पहले स्वयं जांच कर लें कि क्या आप अपने कार्यस्थल से खुश और संतुष्ट हैं? यही नहीं, इस संदर्भ में बैठने के लिहाज से असुविधाजनक कुर्सी देने के लिए अपने ऑफिस मैनेजर को दोष देने की जरूरत भी नहीं है। यद्यपि पीठ दर्द की यह एक प्रमुख वजह हो सकती है, लेकिन क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी का नया शोध इस क्रम में कुछ अचंभित करने वाली बातों पर प्रकाश डालता है। इसके मुताबिक आपसे कुछ ज्यादा की मांग रखने वाले, किंतु कम नियंत्रण वाले कार्यालय में या असहयोगी रवैया अपनाने वाले प्रबंधन के साथ काम करने वाले कर्मचारी ‘बायोसाइकोसोशल’ कारण के चलते पीठ दर्द के अधिक शिकार होते हैं। बायोसाइकोसोशल मॉडल के तहत जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारणों के आधार पर बीमारी की पहचान की जाती है। इस शोध को अंजाम देने वाले निक पेनी के मुताबिक अब उक्त मॉडल को मानव स्वास्थ्य, उसमें भी खासतौर पर दर्द के क्रम में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस शोध से पता चलता है कि कर्मचारियों को होने ...

भारत का वसीम अकरम...जहीर

मनीष कुमार असिस्टेंट प्रोड्यूसर दोनों बाएं हाथ के गेंदबाज। दोनों ही तेज गेंदबाज। दोनों का एक जैसा अंदाज, एक जैसा जोश और एक जैसा ही जज्बा। एक वसीम अकरम तो दूसरा जहीर खान। वैसे वसीम अकरम से जहीर खान की तुलना तो बेमानी होगी लेकिन हाल के दिनों में जहीर ने जिस तरह गेंदबाजी की है वो अकरम से कम नहीं है। आज से करीब 9 साल पहले जब जहीर ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा था तो लोग उनकी तुलना वसीम अकरम से करने लगे थे। लेकिन कुछ साल बाद ही जहीर की गेंदों की धार खत्म हो गई। ऐसा लगा कि उनके करियर का अस्त हो गया है। साल 2006 में दक्षिण अफ्रीका दौरे के बाद जहीर का अलग रूप देखने को मिला। उन्होंने अपनी गेंदबाजी से एक बार फिर अकरम की याद दिला दी। - मौजूदा दौर में जहीर, अकरम की तरह गेंद को विकेट के दोनों और स्विंग करा सकते हैं। - गेंद पुरानी हो या नई, उन्हें अकरम की तरह कोई फर्क नहीं पड़ता। - जहीर तेज गेंदों के साथ-साथ स्लोअर गेंदों का भी बखूबी इस्तेमाल करते हैं। - अकरम ने दुनिया की हर पिच पर शानदार गेंदबाजी की। वही हाल इन दिनों जहीर का है। वो चाहे भारतीय उपमहाद्वीप की बेजान विकेट हो या फिर ऑस्ट्रेलिया,...

वे मायावती से डरते क्यों हैं ?

पंकज श्रीवास्तव इन दिनों जारी राजनीतिक गहमा-गहमी के बीच तमाम लोग एक अजब समस्या से जूझ रहे हैं। उन्हें डर है कि अगली लोकसभा के त्रिशंकु होने पर कहीं जोड़-तोड़ करके मायावती प्रधानमंत्री की कुर्सी तक ना पहुंच जाएं। ऐसा सोचने वालों में सिर्फ राजनीतिज्ञ नहीं, बुद्धिजीवी, पत्रकार और जनता का एक मुखर भी हिस्सा है। हाल ये है कि एक सर्वे के जरिये ये भी बता दिया गया है कि देश की 74 फीसदी से ज्यादा लोगों को मायावती का प्रधानमंत्री बनना पसंद नहीं। उन्हें लगता है कि इससे देश की प्रतिष्ठा घटेगी। ये अलग बात है कि हिंदुस्तान अमेरिका नहीं कि 622 लोगों के बीच हुए ऐसे सर्वेक्षणों के जरिये जमीनी हकीकत का ठीक-ठीक अंदाजा लगाया जा सके। बहरहाल चिंता में दुबले हो रहे इन लोगों की समस्या के निदान के लिए जरूरी है कि मायावती के गुनाह और खतरे को समझा जाए। मायावती को लेकर पहली चिंता... आगे पढ़ें के आगे यहाँ

‘धृतराष्ट्रों’ से भरी है हमारी राजनीति

हिदी के वरिष्ठ साहित्यकार और ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव का कहना है कि भारतीय राजनीति में सत्तांध धृतराष्ट्र आ गए हैं, जो अपढ़, बेरोजगार और गुंडों की फौजें तैयार करके सत्तासीन होना चाहते हैं। जिन्हें वे आज अपनी तोपों में बारूद की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, क्या कल वे भी सत्ता में हिस्सा नहीं मांगेंगे? यादव ने चुनाव मैदान में उतरने वाले राजनेताओं और राजनीतिक दल को खरी-खरी सुनाते हुए कहा है कि लोकसभा चुनावों के दौरान बुद्धिजीवियों, महिलाओं, दलितों और युवाओं की आवाज को सही नजरिए से सुने बिना लोकतंत्र की गतिशील संस्कृति को नहीं बचाया जा सकता। उनका कहना है कि टिकट वितरण से लेकर मतदान की प्रक्रिया तक इन सबकी भागीदारी पूरी तरह सुनिश्चित हो। चुनाव से जुड़े मसलों पर त्रिभुवन ने उनसे लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके प्रमुख अंश: - इस चुनाव में आप किन मुद्दों की प्रमुखता देखते हैं? मुद्दे तो कुछ दिखाई दे नहीं रहे। ये सब तो एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में लगे हैं। जातिवाद है, रुपए-पैसे का खेल है। कहने को विकास भी मुद्दा है। राष्ट्रवाद भी है। मुझे तो सब घपला लगता है। कन्फ्यूज्ड भी कह सकते हैं। - गठब...
गीत चलो हम सूरज उगायें आचार्य संजीव 'सलिल' चलो! हम सूरज उगाएं सघन तम से क्यों डरें हम? भीत होकर क्यों मरें हम? मरुस्थल भी जी उठेंगे- हरीतिमा मिल हम उगायें... विमल जल की सुनें कल-कल। भुला दें स्वार्थों की किल-किल। सत्य-शिव -सुंदर रचें हम। सभी सब के काम आयें... लाये क्या?, ले जायेंगे क्या?, किसी के मन भाएंगे क्या? सोच यह जीवन जियें हम। हाथ-हाथों से मिलाएं... आत्म में विश्वातं देखें। हर जगह परमात्म लेखें। छिपा है कंकर में शंकर। देख हम मस्तक नवायें... तिमिर में दीपक बनेंगे। शून्य में भी सुनेंगे। नाद अनहद गूंजता जो सुन 'सलिल' सबको सुनायें... **************************