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डा श्याम गुप्त के दोहे--

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ--- कविताई का सत्य-- जिनकी कविता में नहीं ,कोई कथ्य औ तथ्य। उनकी कविता में कहां, श्याम’ ढूढिये सत्य ॥ तुकबन्दी करते रहें, बिना भाव उद्देश्य । देश धर्म ओ सत्य का, नहीं कोई परिप्रेक्ष्य॥ कला कला सौन्दर्य रस, रटते रहें ललाम । जन मन के रस भाव का, नही कोई आयाम॥ गूढ शब्द पर्याय बहु, अलन्कार भरमार । ज्यों गदही पर झूल हो, रत्न जटित गल हार ॥ कविता वह है जो रहे, सुन्दर सरल सुबोध । जन मानस को कर सके, हर्षित प्रखर प्रबोध ॥ अलन्कार रस छन्द सब, उत्तम गहने जान। काया सच सुन्दर नही, कौन करेगा मान ॥ नारि दर्शना भव्य मन, शुभ्र सुलभ परिधान । भाल एक बिन्दी सहज़, सब गहनों की खान ॥ स्वर्ण अलन्क्रत तन जडे, माणिक और पुखराज भाव कर्म से हीन हो, नारि न सुन्दर साज ॥ भाव प्रबल,भाषा सरल, विषय प्रखर श्रुति -तथ्य । जन जन के मन बस सके, कविताई का सत्य ॥