अश'आर आचार्य संजीव 'सलिल' जब तलक जिंदा था, रोटी न मुहय्या थी। मर गया तो तेरही में दावतें हुई। पत्थर से हर शहर में मिलते मकां हजारों। मैं ढूंढ-ढूंढ हारा, घर एक नहीं मिलता । बाप की दो बात सह नहीं पाते। अफसरों की लात भी परसाद है। ************************