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Showing posts with the label गीत चंदेल

अपना कह दूँ मैं किसको...

मिलकर भी मिल न सका जो , मन खोज रहा है उसको। सव विश्व खलित धाराएं अपना कह दूँ मैं किसको ॥ याचक नयनो का पानी अवगुण्ठन में मुसकाता । ''कल्याण -रूप , चिर-सुंदर- तुम सत्य'' यही कह जाता॥ पृथ्वी का आँचल भीगा तरुनी -लहर ममता में। निर्दयता की गाथायें अम्बर -पट की समता में॥ -डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

कुछ डूबी सी उतराए...

जो है अप्राप्य इस जग में , वह अभिलाषा है मन की। मन-मख,विरहाग्नि जलाकर आहुति दे रहा स्वयं की॥ अपने से स्वयं पराजित , होकर भी मैं जीता हूँ । अभिशाप समझ कर के भी मैं स्मृति - मदिरा पीता हूँ ॥ दुर्दिन की घाटी भी अब विश्वाश भरी लहराए। उस संधि -पत्र की नौका कुछ डूबी सी उतराए॥ -डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ''राही''

क्रय कर ली अभिलाषाएं...

मधु के ग्राहक बहुत मिले , क्रय कर ली अभिलाषाएं। अब मोल चुका कर रोती कुचली अतृप्त आशाएं ॥ अव्यक्त कथा कुछ ऐसी, आँचल में सोई रहती। हसने की अभिलाषा में, आंसू में भीगी रहती ॥ मेरे दृगमबू सुमनों पर, तुहिन कणों से बिखरे है स्नेहिल सपनो के रंग में, पोषित होकर संवरे है ॥ -डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ''राही''

किसी के प्यार के बिना....

ऐसे बीती जिंदगी किसी के प्यार के बिना। जैसे नदिया बहती जाए इन्तजार के बिना ॥ कोरे सपने रंग को तरसे तरुबाई तरसे मधुबन को - रूप चांदिनी को मन तरसे सुधि तरसे आलिंगन को- ऐसे योवन का बसंत है बहार के बिना। जैसे कोई प्रेम सुहागिनी हो श्रींगार के बिना॥ सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ