यदि वॉल स्ट्रीट जर्नल के बुक्स एडिटर न्यूयॉर्क टाइम्स के बुक्स एडिटर जितने ही विवेकशील होते तो संभव है कि नरेंद्र मोदी जोसेफ लेलीवेल्ड की किताब द ग्रेट सोल पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाते। मैनहट्टन के दैनिक अखबारों ने उसी सप्ताहांत इस किताब की समीक्षाएं प्रकाशित की थीं, लेकिन वे शैली या विषयवस्तु के स्तर पर जर्नल से बहुत अलग थीं। टाइम्स के समीक्षक, जो स्वयं भारत पर बहुत अच्छी किताबें लिख चुके हैं, ने लेलीवेल्ड के रवैये की खूबियों और खामियों का तर्कसंगत आकलन किया है, गांधी की ऐतिहासिक स्थिति की पड़ताल की है और महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने हरमन कालेनबाख का कतई जिक्र नहीं किया है। दूसरी तरफ जर्नल ने यह किताब एक ऐसे ब्रिटिश समीक्षक के हाथों में सौंप दी, जिनकी विवेकशीलता का यह आलम है कि एक दफे उन्होंने टोनी ब्लेयर को भविष्य का विंस्टन चर्चिल बता दिया था। बोअर नस्लवादियों से एकात्मता व्यक्त करने वाले इन समीक्षक ने इस अवसर का उपयोग ब्रिटिश साम्राज्य के महान शत्रु की चरित्र हत्या करने के लिए किया। संदर्भ से हटकर उद्धरण देते हुए उन्होंने गांधी के व्यक्तित्व की एक अलग ही व्याख्या की। उन्होंने ग...