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हास्य मुक्तिका: ...छोड़ दें?? -- संजीव 'सलिल'

हास्य मुक्तिका: ...छोड़ दें?? संजीव 'सलिल' * वायदों का झुनझुना हम क्यों बजाना छोड़ दें? दिखा सपने आम जन को क्यों लुभाना छोड़ दें?? गलतियों पर गलतियाँ कर-कर छिपाना छोड़ दें? दूसरों के गीत अपने कह छपाना छोड़ दें?? उठीं खुद पर तीन उँगली उठें परवा है नहीं एक उँगली आप पर क्यों हम उठाना छोड़ दें?? नहीं भ्रष्टाचार है, यह महज शिष्टाचार है. कह रहे अन्ना कहें, क्यों घूस खाना छोड़ दें?? पूजते हैं मंदिरों में, मिले राहों पर अगर. तो कहो क्यों छेड़ना-सीटी बजाना छोड़ दें?? गर पसीना बहाना है तो बहायें आम जन. ख़ास हैं हम, कहें क्यों करना बहाना छोड़ दें??   राम मुँह में, छुरी रखना बगल में विरसा 'सलिल' सिया को बेबात जंगल में पठाना छोड़ दें?? बुढाया है तन तो क्या? दिल है जवां  अपना 'सलिल' पड़ोसन को देख कैसे मुस्कुराना छोड़ दें? हैं 'सलिल' नादान क्यों दाना कहाना छोड़ दें?  रुक्मिणी पा गोपियों को क्यों भुलाना छोड़ दें?? Acharya Sanjiv verma 'Salil' http://divyanarmada.blogspot. com http://hindihindi.in

मुक्तिका: सच्चा नेह ---संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:                                                                                                                                       सच्चा नेह संजीव 'सलिल' * तुमने मुझसे सच्चा नेह लगाया था. पीट ढिंढोरा जग को व्यर्थ बताया था.. मेरे शक-विश्वास न तुमको ज्ञात तनिक. सत-शिव-सुंदर नहीं पिघलने पाया था.. पूजा क्यों केवल निज हित का हेतु बनी? तुझको भरमाता तेरा ही साया था.. चाँद दिखा आकर्षित तुझको किया तभी गीत चाँदनी का तूने रच-गाया था.. माँगा हिन्दी का, पाया अंग्रेजी का फूल तभी तो पैरों तले दबाया था.. प्रीत अमिय संदेह ज़हर है सच मानो. इसे हृदय में उसको कंठ बसाया था.. जूठा-मैला किया तुम्हींने, निर्मल था व्यथा-कथा को नहीं...

मुक्तिका : संजीव 'सलिल'

मुक्तिका : संजीव 'सलिल' * काम रहजन का करे नाम से रहबर क्यों है? मौला इस देश का नेता हुआ कायर क्यों है?? खोल अखबार- खबर सच से बेखबर क्यों है? फिर जमीं पर कहीं मस्जिद, कहीं मंदर क्यों है? जो है खूनी उकाब उसको अता की ताकत. भोला-मासूम परिंदा नहीं जबर क्यों है?? जिसने पैदा किया तुझको तेरी औलादों को. आदमी के लिए औरत रही चौसर क्यों है?? एक ही माँ ने हमें दूध पिलाकर पाला. पीठ हिन्दोस्तां की पाक का खंजर क्यों है?? लाख खाता है कसम रोज वफ़ा की आदम. कर न सका आज तलक बोल तो जौहर क्यों है?? पेट पलता है तेरा और मेरा भी जिससे- कामचोरी की जगह, बोल ये दफ्तर क्यों है?? ना वचन सात, ना फेरे ही लुभाते तुझको. राह देखा किया जिसकी तू, वो कोहबर क्यों है?? हर बशर चाहता औरत तो पाक-साफ़ रहे. बाँह में इसको लिए, चाह में गौहर क्यों है?? पढ़ के पुस्तक कोई नादान से दाना न हुआ. ढाई आखर न पढ़े, पढ़ के निरक्षर क्यों है?? फ़ौज में क्यों नहीं नेताओं के बेटे जाते? पूछा जनता ने तो नेता जी निरुत्तर क्यों है?? बूढ़े माँ-बाप की खातिर न जगह है दिल में. काट-तन-पेट खड़ा तुमने किया घर क्यों है?...

मुक्तिका:: कहीं निगाह... ---- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका::                                                                           कहीं निगाह... संजीव 'सलिल' * कदम तले जिन्हें दिल रौंद मुस्कुराना है. उन्ही के कदमों में ही जा गिरा जमाना है कहीं निगाह सनम और कहीं निशाना है. हज़ार झूठ सही, प्यार का फसाना है.. न बाप-माँ की है चिंता, न भाइयों का डर. करो सलाम ससुर को, वो मालखाना है.. पड़े जो काम तो तू बाप गधे को कह दे. न स्वार्थ हो तो गधा बाप को बताना है.. जुलुम की उनके कोई इन्तेहां नहीं लोगों मेरी रसोई के आगे रखा पाखाना है.. किसी का कौन कभी हो सका या होता है? अकेले आये 'सलिल' औ' अकेले जाना है.. चढ़ाये रहता है चश्मा जो आँख पे दिन भर. सचाई ये है कि बन्दा वो 'सल...

मुक्तिका: किस चरण का अनुकरण --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका: किस चरण का अनुकरण संजीव 'सलिल' * किस चरण का अनुकरण जन-जन करे. हर चरण के आचरण हैं जब बुरे.. गले मिलते मुस्कुराते मीत कह पीठ पीछे हाथ में थामे छुरे.. हैं बुरे, बनते भले जो आजकल. हैं भले जो आजकल लगते बुरे.. मायके में गुजर कब किसकी हुई? खोज प्रियतम को चलो अब सासरे.. सच कहो तो मानते सब गैर हैं. कहें मनचाही वही हैं खास रे.. बढ़ी है सुविधाएँ, वैभव, कीर्ति, धन. पर आधार से गुम गया है हास रे.. साँस तेरा साथ चाहे छोड़ दे. 'सलिल' जीते जी न तजना आस रे.. ************************** दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

गीतिका: कद छोटा परछाईं बड़ी है... ---आचार्य संजीव 'सलिल'

गीतिका संजीव 'सलिल' कद छोटा परछाईं बड़ी है. कैसी मुश्किल आई घड़ी है. चोर कर रहे पहरेदारी सच में सच रुसवाई बड़ी है.. बीवी बैठी कोष सम्हाले खाली हाथों माई खड़ी है.. खुद पर खर्च रहे हैं लाखों भिक्षुक हेतु न पाई पडी है.. 'सलिल' सांस-सरहद पर चुप्पी मौत शीश पर आई-अड़ी है.. *************************

गीतिका: बिना नाव पतवार हुए हैं... ---आचार्य संजीव 'सलिल'

बिना नाव पतवार हुए हैं. क्यों गुलाब के खार हुए हैं. दर्शन बिन बेज़ार बहुत थे. कर दर्शन बेज़ार हुए हैं. तेवर बिन लिख रहे तेवरी. जल बिन भाटा-ज्वार हुए हैं. माली लूट रहे बगिया को- जनप्रतिनिधि बटमार हुए हैं. कल तक थे मनुहार मृदुल जो, बिना बात तकरार हुए हैं. सहकर चोट, मौन मुस्काते, हम सितार के तार हुए हैं. महानगर की हवा विषैली. विघटित घर-परिवार हुए हैं. सुधर न पाई है पगडण्डी, अनगिन मगर सुधार हुए हैं. समय-शिला पर कोशिश बादल, 'सलिल' अमिय की धार हुए हैं. * * * * *

मुक्तिका: खुशबू --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका खुशबू संजीव 'सलिल' कहीं है प्यार की खुशबू, कहीं तकरार की खुशबू.. कभी इंकार की खुशबू, कभी इकरार की खुशबू.. सभी खुशबू के दीवाने हुए, पीछे रहूँ क्यों मैं? मुझे तो भा रही है यार के दीदार की खुशबू.. सभी कहते न लेकिन चाहता मैं ठीक हो जाऊँ. उन्हें अच्छी लगे है दिल के इस बीमार की खुशबू. तितलियाँ फूल पर झूमीं, भ्रमर यह देखकर बोला. कभी मुझको भी लेने दो दिले-गुलज़ार की खुशबू. 'सलिल' थम-रुक न झुक-चुक, हौसला रख हार को ले जीत. रहे हर गीत में मन-मीत के सिंगार की खुशबू.. ****************

तेवरी: नफरत की भट्टी --संजीव 'सलिल'

तेवरी संजीव 'सलिल' नफरत की भट्टी में सुलग रहा देश. कलियाँ नुचवाता दे माली आदेश.. सेना में नेता-सुत एक भी नहीं. पढिये, क्या छिपा हुआ इसमें संदेश?. लोकतंत्र पर हावी लोभतंत्र है. लेन-देन में आती शर्म नहीं लेश.. द्रौपदी-दुशासन ने मिला लिये हाथ. धर्मराज के खींचें दोनों मिल केश. 'मावस अनमोल हुई, पूनम बेदाम.. निशा उषा संध्या को ठगता राकेश.. हूटर मदमस्त, पस्त श्रमिक हैं हताश. खरा त्याज्य, है वरेण्य खोता परिवेश.. पूज रहा सत्य को असत्य आचरण. नर ने नारायण को 'सलिल' दिया क्लेश.. *******************

गीतिका: तितलियाँ --संजीव 'सलिल'

गीतिका तितलियाँ संजीव 'सलिल' * यादों की बारात तितलियाँ. कुदरत की सौगात तितलियाँ.. बिरले जिनके कद्रदान हैं. दर्द भरे नग्मात तितलियाँ.. नाच रहीं हैं ये बिटियों सी शोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ.. बद से बदतर होते जाते. जो, हैं वे हालात तितलियाँ.. कली-कली का रस लेती पर करें न धोखा-घात तितलियाँ.. हिल-मिल रहतीं नहीं जानतीं क्या हैं शाह औ' मात तितलियाँ.. 'सलिल' भरोसा कर ले इन पर हुईं न आदम-जात तितलियाँ.. ********************************* Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com

गीतिका: तुमने कब चाहा दिल दरके? --संजीव वर्मा 'सलिल'

गीतिका संजीव वर्मा 'सलिल' * तुमने कब चाहा दिल दरके? हुए दिवाने जब दिल-दर के। जिन पर हमने किया भरोसा वे निकले सौदाई जर के.. राज अक्ल का नहीं यहाँ पर ताज हुए हैं आशिक सर के। नाम न चाहें काम करें चुप वे ही जिंदा रहते मर के। परवाजों को कौन नापता? मुन्सिफ हैं सौदाई पर के। चाँद सी सूरत घूँघट बादल तृप्ति मिले जब आँचल सरके. 'सलिल' दर्द सह लेता हँसकर सहन न होते अँसुआ ढरके। **********************