कहीं धूप क्यों?, कहीं छाँव क्यों??... सबमें तेरा अंश समाया, फ़िर क्यों भरमाती है काया? जब पाते तब- खोते हैं क्यों? जब खोते तब पाते पाया। अपने चलते सतत दाँव क्यों?... नीचे-ऊपर, ऊपर-नीचे। झूलें सब तू डोरी खींचे, कोई डरता, कोई हँसता। कोई रोये अँखियाँ मींचे। चंचल-घायल हुए पाँव क्यों?... तन पिंजरे में मन बेगाना। श्वास-आस का ताना-बाना। बुनता-गुनता चुप सर धुनता। तू परखे, दे संकट नाना। सूना पनघट, मौन गाँव क्यों?... ******