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नवगीत: आचार्य संजीव 'सलिल', संपादक दिव्य नर्मदा

कहीं धूप क्यों?, कहीं छाँव क्यों??... सबमें तेरा अंश समाया, फ़िर क्यों भरमाती है काया? जब पाते तब- खोते हैं क्यों? जब खोते तब पाते पाया। अपने चलते सतत दाँव क्यों?... नीचे-ऊपर, ऊपर-नीचे। झूलें सब तू डोरी खींचे, कोई डरता, कोई हँसता। कोई रोये अँखियाँ मींचे। चंचल-घायल हुए पाँव क्यों?... तन पिंजरे में मन बेगाना। श्वास-आस का ताना-बाना। बुनता-गुनता चुप सर धुनता। तू परखे, दे संकट नाना। सूना पनघट, मौन गाँव क्यों?... ******

दोहे ; तन और मन आचार्य संजीव 'सलिल'

प्रश्न चिन्ह मेरा तन मैं बेचता, तुमको क्यों आपत्ति? तुमने कब किसकी हरी, बोलो कहीं विपत्ति? तन की करते फ़िक्र तुम, मन को दिया बिसार। मन ही मन, मन पर किए, कितने ? तन नश्वर बेचा अगर, तो क्यों हाहाकार। शाश्वत निर्मल आत्मा, उसकी करो सम्हार॥ नारी के कौमार्य पर, क्यों रखता तू दृष्टि? पगले क्यों यह भूलता, हुई वहीं उत्पत्ति॥ नर का यदि ख़ुद पर हुआ, मान्य सदा अधिकार। नारी के हक का किया, बोलो क्यों प्रतिकार? --दिव्यनर्मदा.blogspot .com **********************************