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मुक्तिका: सच्चा नेह ---संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:                                                                                                                                       सच्चा नेह संजीव 'सलिल' * तुमने मुझसे सच्चा नेह लगाया था. पीट ढिंढोरा जग को व्यर्थ बताया था.. मेरे शक-विश्वास न तुमको ज्ञात तनिक. सत-शिव-सुंदर नहीं पिघलने पाया था.. पूजा क्यों केवल निज हित का हेतु बनी? तुझको भरमाता तेरा ही साया था.. चाँद दिखा आकर्षित तुझको किया तभी गीत चाँदनी का तूने रच-गाया था.. माँगा हिन्दी का, पाया अंग्रेजी का फूल तभी तो पैरों तले दबाया था.. प्रीत अमिय संदेह ज़हर है सच मानो. इसे हृदय में उसको कंठ बसाया था.. जूठा-मैला किया तुम्हींने, निर्मल था व्यथा-कथा को नहीं...

सामयिक दोहे संजीव 'सलिल'

सामयिक दोहे संजीव 'सलिल' पत्थर से हर शहर में मिलते मकां हजारों. मैं ढूंढ-ढूंढ हरा, घर एक नहीं मिलता.. रश्मि रथी की रश्मि के दर्शन कर जग धन्य. तुम्हीं चन्द्र की ज्योत्सना, सचमुच दिव्य अनन्य.. राज सियारों का हुआ, सिंह का मिटा भविष्य. लोकतंत्र के यज्ञ में, काबिल हुआ हविष्य.. कहता है इतिहास यह, राक्षस थे बलवान. जिसने उनको मिटाया, वे सब थे इंसान.. इस राक्षस राठोड का होगा सत्यानाश. साक्षी होंगे आप-हम, धरती जल आकाश.. नारायण के नाम पर, सचमुच लगा कलंक. मैली चादर हो गयी, चुभा कुयश का डंक.. फंसे वासना पंक में, श्री नारायण दत्त. जैसे मरने जा रहा, कीचड में गज मत्त. कीचड में गज मत्त, लाज क्यों इन्हें न आयी. कभी उठाई थी चप्पल. अब चप्पल खाई.. ****************** Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com