हिदी के वरिष्ठ साहित्यकार और ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव का कहना है कि भारतीय राजनीति में सत्तांध धृतराष्ट्र आ गए हैं, जो अपढ़, बेरोजगार और गुंडों की फौजें तैयार करके सत्तासीन होना चाहते हैं। जिन्हें वे आज अपनी तोपों में बारूद की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, क्या कल वे भी सत्ता में हिस्सा नहीं मांगेंगे? यादव ने चुनाव मैदान में उतरने वाले राजनेताओं और राजनीतिक दल को खरी-खरी सुनाते हुए कहा है कि लोकसभा चुनावों के दौरान बुद्धिजीवियों, महिलाओं, दलितों और युवाओं की आवाज को सही नजरिए से सुने बिना लोकतंत्र की गतिशील संस्कृति को नहीं बचाया जा सकता। उनका कहना है कि टिकट वितरण से लेकर मतदान की प्रक्रिया तक इन सबकी भागीदारी पूरी तरह सुनिश्चित हो। चुनाव से जुड़े मसलों पर त्रिभुवन ने उनसे लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके प्रमुख अंश: - इस चुनाव में आप किन मुद्दों की प्रमुखता देखते हैं? मुद्दे तो कुछ दिखाई दे नहीं रहे। ये सब तो एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में लगे हैं। जातिवाद है, रुपए-पैसे का खेल है। कहने को विकास भी मुद्दा है। राष्ट्रवाद भी है। मुझे तो सब घपला लगता है। कन्फ्यूज्ड भी कह सकते हैं। - गठब...