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डा श्याम गुप्त का गीत ......ए मेरे मन ....

ऐ मेरे मन ...ऐ मेरे में..ऐ मेरे में .. आज तू है उदास क्यों इतना , कैसी चिंता ने तुझको घेरा है | किन ख्यालों में आज डूबा हुआ, कौन से गम ने डाला डेरा है ||.....ऐ मेरे मन ... हमने देखे जो सपने तू उन्हें याद न कर, टूटे सपनों की किसी से तू फ़रियाद न कर | तेर सपने थे कि सुन्दर ज़हां बसायेंगे, देश संस्कृति को नए ढंग से सजायेंगे |.....ऐ मेरे मन .... मिट गए देश की खातिर जो लिए सिर  पै कफ़न, मिट गए चाह लिए एसा व स्वाधीन वतन | मिट गए आस लिए देश बनेगा ये चमन | लुट गए देश पै ,बन जाए यही राहे- अमन ||.......ऐ मेरे मन .... बात अब देश संस्कृति की न करता कोई, उन शहीदों की भी राहों पै न चलता कोई | याद में वीरों की अब कौन लगाए मेले , बीर रस के भी नहीं गीतों को सुनता कोई ||......ऐ मेरे मन .... श्याम, चलिए जहां गम के न हों मेले कोई, हम अकेले हों न हों सारे झमेले कोई | याद में वीरों की पथ-दीप जलाए जाएँ, उन की रहां को भी पुष्पों से सजाये कोई || ऐ मेरे मन ....ऐ मेरे मन .... ऐ मेरे मन .....||
सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ अमर शहीद चन्द्र शेखर आजाद जयंती पर विशेष रचना आचार्य संजीव 'सलिल' तुम गुलाम देश में आजाद हो जिए और हम आजाद देश में गुलाम हैं.... तुम निडर थे हम डरे हैं, अपने भाई से. समर्पित तुम, दूर हैं हम अपनी माई से. साल भर भूले तुम्हें पर एक दिन 'सलिल' सर झुकाए बन गए विनत सलाम हैं... तुम वचन औ' कर्म को कर एक थे जिए. हमने घूँट जन्म से ही भेद के पिए. बात या बेबात भी आपस में नित लड़े. एकता? माँ की कसम हमको हराम है... तुम गुलाम देश में आजाद हो जिए और हम आजाद देश में गुलाम हैं....