इस संसार में सर्वाधिक प्रेम, स्वप्न, विवाद और फैंटेसी जिस चीज के इर्द-गिर्द घूमते हैं, वह है धन। धन सुख है, आराम है, धन खुशियों की राह खोलता है। धन बहुत कुछ है, लेकिन धन सबकुछ नहीं है। वह एक राह है, मंजिल नहीं, लेकिन राह भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती। हमारे देश में पैसे को लेकर दो तरह के दृष्टिकोण नजर आते हैं। हम धन को बुरा भी कहते हैं और उसी धन की मन ही मन कामना भी करते हैं। एक तरफ तो वे हैं, जिनके पास अथाह धन है और वे निरंतर उस धन को दुगुना और तिगुना करने को लेकर चिंतित रहते हैं, लेकिन वे अपनी संपत्ति दूसरों के साथ बांटना नहीं चाहते। इसी के परिणामस्वरूप समाज में धन को लेकर एक दूसरा दर्शन विकसित होता है, जो एक खास वर्ग को यह सिखाता है कि संतोषी सदा सुखी यानी संतुष्टि में ही जीवन का सबसे बड़ा सुख है। आपके पास धन नहीं है, संतोष करिए। अभाव है, संतोष करिए। एक व्यक्ति दोनों हाथों से दुनिया का सारा धन बटोरता जाता है और दूसरों को उपदेश देता है कि संतोष करो। इसी के साथ पूर्वजन्म और कर्मफल का दर्शन विकसित होता है। कोई भिखारी है तो यह उसके पूर्वजन्म के कर्मो का फल है। वे कहते हैं, धन की कामना ही ब...