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Showing posts with the label सन्जीव 'सलिल'

लघुकथा: जंगल में जनतंत्र

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ आचार्य संजीव 'सलिल' की लघु कथाएँ लघुकथा जंगल में जनतंत्र जंगल में चुनाव होनेवाले थे. मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे.- ' जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर कदम रखिये. सिर्फ़ अपना नहीं सबका भला सोचिये.' ' मंत्री जी! लाइसेंस दिलाने के लिए धन्यवाद. आपके कागज़ घर पर दे आया हूँ. ' भाषण के बाद चतुर सियार ने बताया. मंत्री जी खुश हुए. तभी उल्लू ने आकर कहा- 'अब तो बहुत धांसू बोलने लगे हैं. हाऊसिंग सोसायटी वाले मामले को दबाने के लिए रखी' और एक लिफाफा उन्हें सबकी नज़र बचाकर दे दिया. विभिन्न महकमों के अफसरों उस अपना-अपना हिस्सा मंत्री जी के निजी सचिव गीध को देते हु...

मुक्तक : आचर्य सन्जीव 'सलिल'

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ मुक्तक : आचार्य सन्जीव 'सलिल' जो दूर रहते हैं वही तो पास होते हैं. जो हँस रहे, सचमुच वही उदास होते हैं. सब कुछ मिला 'सलिल' जिन्हें अतृप्त हैं वहीं- जो प्यास को लें जीत वे मधुमास होते हैं. ********* पग चल रहे जो वे सफल प्रयास होते हैं न थके रुक-झुककर वही हुलास होते हैं. चीरते जो सघन तिमिर को सतत 'सलिल'- वे दीप ही आशाओं की उजास होते है. ********* जो डिगें न तिल भर वही विश्वास होते हैं. जो साथ न छोडें वही तो खास होते हैं. जो जानते सीमा, 'सलिल' कह रहा है सच देव! वे साधना-साफल्य का इतिहास होते हैं **********

मुक्तक आचार्य संजीव 'सलिल'

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ मुक्तक आचार्य संजीव 'सलिल' राष्ट्र जमीं का महज न टुकडा, यह आस्था-विश्वास हमारा. तीर्थ, धर्म, मंदिर, मस्जिद, मठ, गिरजा, देवालय, गुरुद्वारा. भाषा-भूषा-भेष भिन्न हैं, लेकिन ह्रदय भिन्न मत मानो- कोटि-कोटि हम मात्र एक हैं, 'जय भारत माँ' सबका नारा. ********* सत्ता और सियासत केवल साधन, साध्य न इनको मानो. जनहित-राष्ट्रोत्थान एक ही लक्ष्य अटल अपना पहचानो. . संसद और विधानसभा में वाग्वीर जो पहुँच गए हैं- ठुकरा उनको, जन-सेवक चुन, जनगण की जय निश्चय जानो.. ********** देव, खुदा, रब, गौड, ईश्वर, गुरु, ऋषि भारत की संतान. भारत जग में सबसे ज्यादा पावन, सबसे अधिक महान. मंत्र, ऋचाएँ, श्लोक, आरती, आयत, प्रेयर औ' अरदास. वन्दन-अर्चन करें राष्ट्र का, 'सलिल' सतत का र्गौरव गान. ********* संसद मंदिर लोकतंत्र का, हुल्लड़ जनगण का उपहास. चला गोलियां मानव-द्रोही फैलाते नृशंस संत्रास. मूक रहे गर इन्हें न रोका, तो अपराधी हम होंगे- 'सलिल' सत्य यह, क्षमा न हमको देगा किंचित भी इतिहास. *********** 'बाजी लगा जान की, रोको आतंकी-हत्यारों को. असफल हुआ स...

गीतिका: नर्मदा -आचार्य सन्जीव' सलिल'

सारांश यहाँ गीतिका आचार्य संजीव 'सलिल' साधना हो सफल नर्मदा- नर्मदा. वंदना हो विमल नर्मदा-नर्मदा. संकटों से न हारें, लडें,जीत लें. प्रार्थना हो प्रबल नर्मदा-नर्मदा. नाद अनहद गुंजाती चपल हर लहर. नृत्यरत हर भंवर नर्मदा-नर्मदा. धीर धर पीर हर लें गले से लगा. रख मनोबल अटल नर्मदा-नर्मदा. मोहिनी दीप्ति, आभा मनोरम नवल. नाद निर्मल नवल नर्मदा-नर्मदा. सिर कटाते समर में झुकाते नहीं. शौर्य-अर्णव अटल नर्मदा-नर्मदा. सतपुडा विन्ध्य मेकल सनातन शिखर सोन जुहिला सजल नर्मदा-नर्मदा. आस्था हो शिला, मित्रता हो 'सलिल'. प्रीत-बंधन तरल नर्मदा-नर्मदा. * * * * * आगे पढ़ें के आगे यहाँ