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कॉकटेल:दिखने में नयी,सोच में पुरानी।

होमी अदजानिया निर्देशित कॉकटेल की कहानी इम्तियाज अली ने लिखी है। इम्तियाज अली की लिखी और निर्देशित फिल्मों के नायक-नायिका संबंधों को लेकर बेहद कंफ्यूज रहते हैं। संबंधों को स्वीकारने और नकारने में ढुलमुल किरदारों का कंफ्यूजन ही उनकी कहानियों को इंटरेस्टिंग बनाता है। कॉकटेल के तीनों किरदार गौतम, वेरोनिका और मीरा अंत-अंत तक कंफ्यूज रहते हैं। इम्तियाज अली ने इस बार बैकड्रॉप में लंदन रखा है। थोड़ी देर के लिए हम केपटाउन भी जाते हैं। कहानी दिल्ली से शुरू होकर दिल्ली में खत्म होती है। गौतम कपूर आशिक मिजाज लड़का है। उसे हर लड़की में हमबिस्तर होने की संभावना दिखती है। वह हथेली में दिल लेकर चलता है। लंदन उड़ान में ही हमें गौतम और मीरा के स्वभाव का पता चल जाता है। लंदन में रह रही वेरोनिका आधुनिक बिंदास लड़की है। सारे रिश्ते तोड़कर मौज-मस्ती में गुजर-बसर कर रही वेरोनिका के लिए आरंभ में हर संबंध की मियाद चंद दिनों के लिए होती है। एनआरआई शादी के फरेब में फंसी मीरा पति से मिलने लंदन पहुंचती है। पहली ही मुलाकात में उसका स्वार्थी पति उसे दुत्कार देता है। बेघर और बेसहारा हो चुकी मीरा को वेरो...

उत्‍सवधर्मी भारतीय समाज में उत्‍सव के सोलह प्रसंग क्‍या हैं?

♦ अजय ब्रह्मात्‍मज भा रतीय दर्शन और जीवनशैली में गर्भधारण से मृत्‍यु तक के विभिन्‍न चरणों को रेखांकित करने के साथ उत्‍सव का प्रावधान है। आरंभ में हम इसे चालीस संस्‍कारों के नाम से जानते थे। गौतम स्‍मृति में चालीस संस्‍कारों का उल्‍लेख मिलता है। महर्षि अंगिरा ने इन्‍हें पहले 25 संस्‍कारों में सीमित किया। उसके बाद व्‍यास स्‍मृति में 16 संस्‍कारों का वर्णन मिलता है। इन संस्‍कारों का  किसी धर्म, जाति, संप्रदाय से सीधा संबंध नहीं हैं। वास्‍तव में ये संस्‍कार मनुष्‍य जीवन के सभी चरणों के उत्‍सव हैं। इन उत्‍सवों के बहाने परिजन एकत्रित होते हैं। उनमें परस्‍पर सहयोग, सामूहिकता और एकता की भावना बढ़ती है। जीवन का सामूहिक उल्‍लास उन्‍हें जोड़ता है। आधुनिक जीवन पद्धति के विकास के साथ वर्तमान में संयुक्‍त परिवार टूट रहे हैं। फिर भी 16 संस्‍कारों में से प्रचलित कुछ संस्‍कारों के अवसर पर विस्‍तृत परिवार के सभी सदस्‍यों और मित्रों के एकत्रित होने की परंपरा नहीं टूटी है। शहरों में न्‍यूक्लियर परिवार के सदस्‍य अपने मित्रों और पड़ोसियों के साथ इन संस्‍कारों का उत्‍सव मनाते हैं। देहातों और कस्...

सिने बहसतलब : अनुराग के गीत जिंदा रहेंगे ?

सिने बहसतलब के पहले दिन बहुत देर से पहुंचा अनुराग कश्यप बस उठकर जाने ही वाले थे ।  मंच पर डॉ.चन्द्र प्रकाश द्रिवेदी,अभिषेक शर्मा और स्वानंद किरकिरे मुख्य रूप से उपस्तिथ थे ।  वहा होने वाली जायदा बातें तो याद नहीं रही बस स्वानंद की एक बात याद रह गयी,स्वानंद ने कहा की आज गानों की हालत फिल्म में उतनी ठीक नहीं है,कोर्पोरेट कंपनी को आज संगीत और म्यूजिक की जरुरत बस उतनी है जितनी की मोबाइल कंपनी को कॉलर टियून की ।  स्वानंद की बात ने गहरा प्रभाव छोड़ा की आज लेखक की स्वतंत्रता प्रोडूसर और कंपनी के मुनाफे में कैद है,लेखक की कलम उनके ही इशारे पर चलती है ।  अनुराग की फिल्मो की बात करें तो अनुराग की फिल्मों के गीतों में हमेशा एक वीर रस और उल्लास्ता को महसूस किया जा सकता है लेकिन यह दोनों चीज़ें कोर्पोरेट कंपनी के फॉर्मेट में बहुत जायदा जगह पाती हो ऐसा नहीं है तो ऐसे में मेरे जेहन में यह सवाल अगले दिन तक कौंधता रहा की क्या कुछ दिन बाद अनुराग की फिल्मो से गीत गायब हो जाएँगे ।   क्योंकि जब गीत बिकेंगे ही नहीं तो उन पर बहुत अधिक समय तक पैसा ख...

सिनेमा क्‍या है? चलती हुई तस्‍वीरें या सपनों का कारखाना?

♦ तत्याना षुर्लेई भारतीय सिनेमा के सौ साल की अभी खूब चर्चाएं हैं। लेकिन यह सौ साल इसी साल क्यूं? जबकि यूरोप में तो यह 1995 में मनाया जा चुका है। इसके सैद्धांतिक आधार क्या रहे हैं, क्या हैं? हिंदी में इसकी चर्चा नहीं के बराबर है। सिनेमा यथार्थ है या कल्पना? दस्तावेज है या रूपक? इन्हीं सवालों को तत्याना बहुत ही बारीकी से इस संक्षिप्त से नोट में हमें बताने की कोशिश करती हैं :  उदय शंकर यह लेख मोहल्‍ला लाइव की सिने बहसतलब के लिए तैयार की जा रही स्‍मारिका से लिया गया है। स्‍मारिका का संपादन प्रकाश के रे कर रहे हैं :  मॉडरेटर … सि नेमा बहुत पुराना आविष्कार नहीं है। उसका जन्म 28 दिसंबर 1895 को हुआ, जब  लिमिएर (Lumière) बंधु  ने पेरिस में अपना नया मशीन दिखाया। एक दिलचस्प बात यह है कि पहला शो ग्रैंड होटल के ‘इंडियन रूम’ मे किया गया। शायद यह जगह एक संकेत था कि आगे चलकर भारत फिल्मों का सबसे बड़ा व्यावसायिक केंद्र बन गया। पहले शो के बाद लोगों को पता चला कि यह आविष्कार कितना अच्छा है और सारी दुनिया बंधुओं की चलती हुर्इ तस्वीरें देखना चाहती थी। आस्ट्रेलिया (Austra...

सिनेमा के सौ बरस पर बहसतलब, 23-24 को दिल्‍ली पधारें।

ती न साल पहले सिनेमा पर बहसतलब का सिलसिला शुरू हुआ था। फिल्‍म महोत्‍सवों की समृद्ध परंपरा के बीच सिर्फ बातचीत का एक आयोजन करने का विचार इसलिए भी आया था, क्‍योंकि सिनेमा देखना पहले की तुलना में अब बहुत आसान हो गया है। अब कोई भी फिल्‍म ऐसी एक्‍सक्‍लूसिव नहीं रह जाती है, जैसे पहले हुआ करती थी। इसलिए फिल्‍म महोत्‍सवों का पहले जितना क्रेज था, अब उतना नहीं है। कम से कम भारत में तो नहीं है। हमारी समझ थी कि जो सिनेमा बनाते हैं, उन्‍हें अपने सिनेमा और सिनेमा के अलावा अपने समय की दूसरी गतिविधियों के बारे में बातचीत करनी चाहिए। फिल्‍मकारों का  एक तेज-तर्रार समूह बहसतलब को समर्थन देने की मुद्रा में आ गया। अनुराग कश्‍यप, डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी और मनोज बाजपेयी एक तरह से संरक्षक की भूमिका में आ गये और जब भी मौका मिला, अपना कीमती समय बहसतलब के बारे में सोचने और बहसतलब के आयोजनों को संभव बनाने में लगाते रहे। पटना के आयोजन में पैसा जुटाने के लिए मनोज वाजपेयी ने एक जूते की दुकान के फीते काटे, एक होटल में जाकर शाम का खाना खाया और एक टेलीकॉम कंपनी के उपभोक्‍ताओं से एक घंटे तक बातचीत की। डॉक्‍ट ...

जनसंघर्षों के साथ भद्दा मजाक है शांघाई-समर अनार्य

शांघाई  शहर नहीं एक सपने का नाम है. उस सपने का जो पूंजीवाद के नवउदारवादी संस्करण के वैश्विक नेताओं की आँखों से धीरे धीरे विकासशील देशों में मजबूत हो रहे दलाल शासक वर्गों की आँखों में उतर आया है. उस सपने का भी जिसने नंदीग्राम, नोएडा और खम्मम जैसे हजारों कस्बों के सादे से नामों को हादसों के मील पत्थर में तब्दील के लिए इन शासक वर्गों ने हरसूद जैसे तमाम जिन्दा कस्बों को जबरिया जल समाधि दे दी.  क्या है यह सपना फिर?  यह सपना है हमारे खेतों, खलिहानों के सीने में ऊँची ईमारतों के नश्तर उतार उन्हें पश्चिमी दुनिया की जरूरतों को पूरा करने वाले कारखानों में तब्दील कर देना. यह सपना है हमारे किसानों को सिक्योरिटी गार्ड्स में बदल देने का. यह सपना है हमारे देशों को वैश्विक बाजारवादी व्यवस्था के जूनियर पार्टनर्स में बदल देने का.  पर फिर,  दुनिया के अब तक के इतिहास में कोई सपना अकेला सपना नहीं रहा है. हर सपने के बरक्स कुछ और आँखों ने आजादी, अमन और बराबरी के सपने देखे हैं और अपनी जान पे खेल उन्हें पूरा करने के जतन भी किये हैं. वो सपने जो ग्राम्शी को याद करें तो वर्चस्ववाद (हेजेम...

सिनेमा को नए रंग दे रही स्त्रियां।

‘सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं है..’ साल 1913 में भारत में मोशन पिक्चर्स की शुरुआत के साथ इस धारणा ने भी पैठ बना ली थी। भारतीय सिनेमा पर यह पूर्वाग्रह लंबे समय तक हावी रहा। आलम यह था कि महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष निभाते। हालांकि भारतीय सिनेमा के शैशवकाल में ही फिल्म मोहिनी भस्मासुर में एक महिला कमलाबाई गोखले ने अभिनय कर नई शुरुआत की, लेकिन सिनेमा अब भी महिलाओं के लिए दूर की कौड़ी थी। कमलाबाई, चरित्र अभिनेता विक्रम गोखले की परदादी थीं, जिन्होंने बाद में कई फिल्मों में पुरुष किरदार भी निभाए। बाद में फिल्मों में महिलाओं के काम करने का सिलसिला बढ़ता गया और अब यह कोई नहीं कहता कि सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं।  लाइट, कैमरा, एक्शन.. फ्लैशबैक की बात छोड़ वर्तमान में आते हैं; अभिनय छोड़कर कैमरे के पीछे चलते हैं। शुरुआत फिल्म निर्देशन से करें तो इस फेहरिस्त का पहला नाम जो जहन में कौंधता है वो सई परांजपे का है। सई ऐसी फिल्मकार हैं, जिनमें विविधता है, जिन्होंने अपने निर्देशन से हमेशा हैरान किया है। जादू का शंख, स्पर्श, चश्मेबद्दूर, कथा या दिशा सरीखी फिल्में इसकी बानगी हैं। सई ...