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सिनेमा को नए रंग दे रही स्त्रियां।

‘सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं है..’ साल 1913 में भारत में मोशन पिक्चर्स की शुरुआत के साथ इस धारणा ने भी पैठ बना ली थी। भारतीय सिनेमा पर यह पूर्वाग्रह लंबे समय तक हावी रहा। आलम यह था कि महिला पात्रों की भूमिका भी पुरुष निभाते। हालांकि भारतीय सिनेमा के शैशवकाल में ही फिल्म मोहिनी भस्मासुर में एक महिला कमलाबाई गोखले ने अभिनय कर नई शुरुआत की, लेकिन सिनेमा अब भी महिलाओं के लिए दूर की कौड़ी थी। कमलाबाई, चरित्र अभिनेता विक्रम गोखले की परदादी थीं, जिन्होंने बाद में कई फिल्मों में पुरुष किरदार भी निभाए। बाद में फिल्मों में महिलाओं के काम करने का सिलसिला बढ़ता गया और अब यह कोई नहीं कहता कि सिनेमा महिलाओं के बस की बात नहीं।  लाइट, कैमरा, एक्शन.. फ्लैशबैक की बात छोड़ वर्तमान में आते हैं; अभिनय छोड़कर कैमरे के पीछे चलते हैं। शुरुआत फिल्म निर्देशन से करें तो इस फेहरिस्त का पहला नाम जो जहन में कौंधता है वो सई परांजपे का है। सई ऐसी फिल्मकार हैं, जिनमें विविधता है, जिन्होंने अपने निर्देशन से हमेशा हैरान किया है। जादू का शंख, स्पर्श, चश्मेबद्दूर, कथा या दिशा सरीखी फिल्में इसकी बानगी हैं। सई ...

पवित्र कानों की परवाह किये बिना “वासेपुर” गुलजार है

♦ अविनाश सें सर बोर्ड गैंग्‍स ऑफ वासेपुर को लेकर जिस असमंजस में था, वह खत्‍म हो गया और कल शाम साफ हो गया कि इस फिल्‍म की रीलीज में अब कोई अड़चन नहीं है। कल रात भी भोजपुरी फिल्‍मों के निर्देशक किरणकांत वर्मा इस बात को लेकर तंज कर रहे थे कि फिल्‍मों में थोड़ी मर्यादा तो बाकी रहे। मेरी लाइन यह थी कि क्‍या हम सब इतने बड़े तोप हैं कि समाज को सिखाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते? रचना में समाज जैसा है, वैसा आता है। वैसा लाने की हिम्‍मत भी कम लोगों में होती है। मंटो, राजकमल चौधरी, राही मासूम रजा का विरोध करने वाले, उनके साहित्‍य को सड़कछाप बताने वाले साहित्‍य और रचना के नैतिक सिपाही उनके समय में भी कम नहीं थे। अनुराग कश्‍यप ने  वासेपुर की मनोहर गालियों को जितने सुरुचिपूर्ण ढंग से संयोजित किया है, वह यथार्थ से भी ज्‍यादा यथार्थ लगता है। क्‍या यह गलत है? रचना और समाज के बीच में लेखक या निर्देशक को परदे का काम करना चाहिए? ये ऐसे सवाल हैं, जिन पर अरसे से अदब के हर मंच पर बात होती रही है और हमेशा से ही इस मसले पर लोगों के बीच दो राय रही है। चंद लोग , जो परदा होने की जगह बेपरदा होने के ...

खिलाडी की धमाकेदार बापसी

  सराहना और विवेचना से अधिक श्रद्धांजलि लिखने में सक्रिय फिल्म पत्रकारों ने अक्षय कुमार के करिअर का अंत कर दिया था। उनके अनुसार खिलाड़ी अक्षय कुमार की वापसी असंभव है। उनकी फिल्में लगातार पिट रही थीं। उसी दरम्यान एक-एक कर सारे लोकप्रिय स्टार की फिल्में  100  करोड़ क्लब में पहुंच रही थीं। सलमान खान ,  आमिर खान ,  अजय देवगन और शाहरुख खान के बाद सीधे रितिक रोशन ,  रणबीर कपूर ,  इमरान खान और इमरान हाशमी का जिक्र किया जाने लगा था। निरंतर असफलता के बावजूद अक्षय कुमार में कटुता नहीं आई थी। वे खिन्न जरूर रहने लगे थे। इस खिन्नता में उन्होंने अपने आलोचकों को आड़े हाथों लिया। अपनी बुरी फिल्मों की बुराई भी उन्हें पसंद नहीं आई। यह स्वाभाविक था। स्टार एक बार फिसलता है तो रुकने-थमने और फिर से उठने तक वह यों ही अपनी नाकामी पर चिल्लाता है। अक्षय कुमार अपवाद नहीं रहे।   एक अच्छी बात रही कि फिर से शीर्ष पर आने की बेताबी में उन्होंने ऊलजलूल फिल्म नहीं कीं। वे अपनी सीमाओं और खूबियों को अच्छी तरह जानते हैं। देश का आम दर्शक उन्हें पसंद करता है। प्रशंसक और दर्शक ...

दिबाकर बनर्जी की पॉलिटिकल थ्रिलर ‘शांघाई’

-अजय ब्रह्मात्‍मज    हर फिल्म पर्दे पर आने के पहले कागज पर लिखी जाती है। लेखक किसी विचार, विषय, मुद्दे, संबंध, भावना, ड्रामा आदि से प्रेरित होकर कुछ किरदारों के जरिए अपनी बात पहले शब्दों में लिखता है। बाद में उन शब्दों को निर्देशक विजुअलाइज करता है और उन्हें कैमरामैन एवं अन्य तकनीशियनों की मदद से पर्दे पर रचता है। ‘शांघाई’ दिबाकर बनर्जी की अगली फिल्म है। उन्होंने उर्मी जुवेकर के साथ मिल कर इसका लेखन किया है। झंकार के लिए दोनों ने ‘शांघाई’ के लेखन के संबंध में बातें कीं।   पृष्ठभूमि  उर्मी -  ‘शांघाई’ एक इंसान की जर्नी है। वह एक पाइंट से अगले पाइंट तक यात्रा करता है। दिबाकर से अक्सर बातें होती रहती थीं कि हो गया न ! समाज खराब है, पॉलिटिशियन करप्ट हैं, पढ़े-लिखे लोग विवश और दुखी हैं। ऐसी बातों से भी ऊब हो गई है। आगे क्या बात करती है?  दिबाकर -  अभी तो पॉलीटिशयन बेशर्म भी हो गए हैं। वे कहते हैं कि तुम ने मुझे बुरा या चोर क्यों कहा? अभी अन्ना आंदोलन में इस तरह की बहस चल रही थी। ‘शांघाई’ में तीन किरदार हैं। वे एक सिचुएशन में अपने ढंग...

चीन की कनेक्टिविटी से चलता है भारत का मोबाइल।

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं चूकते हैं। हालांकि आमतौर पर मोदी के निशाने पर कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी, पीएम मनमोहन सिंह या फिर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी होते हैं लेकिन इस बार उन्‍होंने पूर्व प्रधानमंत्री स्‍वर्गीय इंदिरा गांधी पर निशाना साधा है। मोदी ने इंदिरा के बारे में दिए गए विवादास्‍पद बयान में कांग्रेस के पुराने मेनिफेस्‍टो का जिक्र करते हुए पूर्व पीएम पर धर्म और संप्रदाय के नाम पर राजनीति करने का आरोप लगाया है। मुंबई में सोमवार को नॉर्थ ईस्‍ट के लोगों के सम्‍मेलन में हिस्‍सा लेते हुए मोदी ने आरोप लगाया कि पूर्वोत्‍तर के राज्‍यों में अपने चुनाव के दौरान इंदिरा गांधी ने ऐलान किया था कि यदि कांग्रेस पार्टी चुनाव में जीतती है तो बाइबिल के मुताबिक शासन चलाया जाएगा। मोदी ने कहा, 'मैं समझता हूं कि इंदिरा गांधी ने बहुत बड़ा पाप किया था। वहां (पूर्वोत्‍तर में) जब वो चुनाव लड़ (प्रचार कर) रही थीं तो वहां उन्‍होंने कई बातें कहीं। इंदिरा ने अपने अधिकृत मेनिफेस्‍टो में कहा था कि हम यहां चुनाव ...

चक्रधर की चारागाह बनकर रह गया है केंद्रीय हिंदी संस्थान

यह एक बहुत ही जरूरी रिपोर्ट है, जो बताती है कि देश का एक महत्‍वपूर्ण संस्‍थान कैसे कैसे लोगों के चंगुल में फंसा है। इस रिपोर्ट से जुड़े तमाम तथ्‍य हमारे पास हैं। जरूरत पड़ी तो हम उन तथ्‍यों की सिलसिलेवार प्रस्‍तुति यहां जारी करेंगे। इस रिपोर्ट की एक कॉपी अशोक चक्रधर को भी मेल कर दी गयी है। अगर वे इस रिपोर्ट से जुड़े तथ्‍यों के संदर्भ में हमें वापस कोई मेल करते हैं, तो हम उसे भी यहां शेयर करेंगे :  मॉडरेटर कें द्रीय हिंदी संस्थान जिसका मुख्यालय आगरा में है और दिल्ली सहित आठ क्षेत्रीय केंद्र हैं, में उपाध्यक्ष पद के लिए कोई नियमित राशि अथवा तनख्वाह का प्रावधान नहीं है। सिर्फ संस्थान के लिए किये गये कार्यों में उन्हें मानदेय दिये जाने का प्रावधान है। इसके बावजूद केंद्रीय हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर अपने पद का दुरुपयोग कर संस्थान को अब तक विभिन्न मदों में प्रतिमाह लाखों का चूना लगा रहे हैं। लगता है जैसे अशोक चक्रधर ने केंद्रीय हिंदी संस्थान को अपना चारागाह बना लिया है। संस्थान की गतिविधि  अथवा उसके विकास से चक्रधर को कोई लेना-देना नहीं है। दिल्ली केंद्र पर पि...

मेरी फिल्‍म का माफिया केवल गोली भरता हुआ नहीं दिखता

अनुराग कश्‍यप से अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत संदर्भ : कान फिल्‍म फेस्टिवल और गैंग्‍स ऑफ वासेपुर फिल्‍मकार अनुराग कश्‍यप से वरिष्‍ठ फिल्‍म समीक्षक अजय ब्रह्मात्‍मज की यह बातचीत उनके कान फिल्‍म फेस्विल जाने के पहले हुई थी। जैसा कि अजय ब्रह्मात्‍मज सूचना देते हैं, उस दिन अनुराग कश्‍यप बहुत व्‍यस्‍त थे। बड़ी मुश्किल से देश-विदेश के पत्रकारों से बातचीत और इंटरव्‍यू के बीच-बीच में मिले समय में यह साक्षात्‍कार हो पाया। इसका पहला अंश पढ़िए… मॉडरेटर … कान में चार फिल्मों का चुना जाना बड़ी खबर है, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में जैसे कोई हलचल ही नहीं है? ह म क्या कर सकते हैं। कुछ लोगों के व्यक्तिगत संदेश आये हैं। कुछ नहीं कह सकते। हमारी इंडस्ट्री ऐसी ही है। मेनस्ट्रीम की कोई फिल्म चुनी गयी रहती, तो बड़ी खबर बनती। इंडस्ट्री कभी हमारी कामयाबी को सेलिब्रेट नहीं करती। हर छोटी बात पर ट्विट की बाढ़ सी आ जाती है। इस बार वहां भी सन्नाटा छाया है? उ न्हें लगता होगा कि हम योग्य फिल्ममेकर नहीं हैं। ये कौन से लोग हैं, जिनकी फिल्में जा रही हैं? इनसे अच्छी फिल्में तो हम बनाते हैं। इंडस्ट्री क...