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चक्रधर की चारागाह बनकर रह गया है केंद्रीय हिंदी संस्थान



यह एक बहुत ही जरूरी रिपोर्ट है, जो बताती है कि देश का एक महत्‍वपूर्ण संस्‍थान कैसे कैसे लोगों के चंगुल में फंसा है। इस रिपोर्ट से जुड़े तमाम तथ्‍य हमारे पास हैं। जरूरत पड़ी तो हम उन तथ्‍यों की सिलसिलेवार प्रस्‍तुति यहां जारी करेंगे। इस रिपोर्ट की एक कॉपी अशोक चक्रधर को भी मेल कर दी गयी है। अगर वे इस रिपोर्ट से जुड़े तथ्‍यों के संदर्भ में हमें वापस कोई मेल करते हैं, तो हम उसे भी यहां शेयर करेंगे : मॉडरेटर
केंद्रीय हिंदी संस्थान जिसका मुख्यालय आगरा में है और दिल्ली सहित आठ क्षेत्रीय केंद्र हैं, में उपाध्यक्ष पद के लिए कोई नियमित राशि अथवा तनख्वाह का प्रावधान नहीं है। सिर्फ संस्थान के लिए किये गये कार्यों में उन्हें मानदेय दिये जाने का प्रावधान है। इसके बावजूद केंद्रीय हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर अपने पद का दुरुपयोग कर संस्थान को अब तक विभिन्न मदों में प्रतिमाह लाखों का चूना लगा रहे हैं। लगता है जैसे अशोक चक्रधर ने केंद्रीय हिंदी संस्थान को अपना चारागाह बना लिया है।
संस्थान की गतिविधि अथवा उसके विकास से चक्रधर को कोई लेना-देना नहीं है। दिल्ली केंद्र पर पिछले लगभग दो वर्षों से लाइब्रेरी बंद है। राष्ट्रीय महत्व की कई परियोजनाएं ठप्प पड़ी हुई हैं। पिछले वर्षों में वित्त समिति और गवर्निंग बॉडी की कोई बैठक नहीं हुई है। चक्रधर के द्वारा अब तक किये गये कुछ महत्वपूर्ण वित्तीय अनियमितता का उदाहरण देखिएः
 केंद्रीय हिंदी संस्थान के दिल्ली केंद्र का अपना चार मंजिला विशाल भवन है, जिसमें उनके लिए कमरा आरक्षित है। इसके बावजूद अशोक चक्रधर ने सरिता विहार स्थित अपने आवास को अपना निजी ऑफिस बनाया हुआ है। यहां संस्थान द्वारा उन्हें तमाम सुविधाएं मुहैया करायी गयी हैं। चैबीसों घंटे के लिए गाड़ी ड्राइवर, स्टेनो, चतुर्थवर्गीय कर्मचारी, विभिन्न मशीनी उपकरण, फैक्स, टेलीफोन, इंटरनेट, अपना मोबाइल (10,000 रु) व पत्नी का मोबाइल (5,000 रु), लैपटॉप (80 हजार) डाटा कनेक्टिंग, ब्राडबैंड सर्विस (प्रतिमाह 4,000), एसी, बिजली बिल (प्रतिमाह 5,000), सात पत्रिकाएं, नौ दैनिक समाचार-पत्र (प्रतिमाह 2,000) आदि जिस पर प्रतिमाह संस्थान के लाखों रुपयों का चूना लग रहा है।
 कार के पेट्रोल आदि खर्च पर प्रतिमाह 30 से 40 हजार तथा उसके मेंटिनेंस पर प्रति दो माह पर पचास हजार से अधिक खर्च हो रहे हैं। साहब जब दिल्ली से बाहर होते हैं, तो भी गाड़ी उनके घरवालों की सेवा में लगी रहती है। जिस दिन कार में खराबी हो जाती है, उस दिन उन्हें टैक्सी की सुविधा दी जाती है जबकि नियमानुसार उन्हें सिर्फ संस्थान के कार्य के लिए वाहन सुविधा देय है। उनके घर काम कर रहे स्टाफ पर प्रतिमाह पचास हजार से अधिक का खर्च है। इसके अलावा अन्य सुविधाओं को जोड़कर लाखों रुपये संस्थान से प्रतिमाह वसूले जाते हैं। अपने घर काम करने वाली नौकरानी को पंद्रह हजार रुपये संस्थान से दिलाये जा रहे हैं। चक्रधर द्वारा अब तक सिर्फ टेलीफोन पर लगभग-लगभग दो लाख रुपये खर्च किये गये हैं।
अशोक चक्रधर को संस्थान द्वारा ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ की सदस्यता तोहफे में दी गयी है, जहां माननीय उपाध्यक्ष अपने मित्रों आदि के साथ बैठकर जलपान (सोमरस सहित) और चकल्लस करते हैं और उसके तमाम बिलों के भुगतान संस्थान द्वारा किये जाते है, जिसमें लाखों रुपये का खर्च आता है। पूर्व में इस सदस्यता पर ऑडिट ऑब्जेक्शन भी हो चुका है, जिसका जवाब अभी तक संस्थान द्वारा नहीं दिया गया।
 अशोक चक्रधर संस्थान के रुपये से हमेशा गगन-विहारी बने रहते हैं। चाहे बंबई में अमिताभ बच्चन का कार्यक्रम हो, चाहे जयपुर में लिटरेचल फेस्टिवल हो, ये जहां भी शामिल होते हैं, उसका तमाम खर्च संस्थान से वसूलते हैं। अभी एक सेमिनार के बहाने आस्ट्रेलिया गये थे, जहां उनके पुत्र रहते हैं। इस यात्रा में लगभग चार लाख रुपये से अधिक खर्च संस्थान के हुए। दो महीने पहले संस्थान से ढाई लाख रुपये लेकर स्पेन घूम आये थे। इससे पहले भी साढ़े तीन लाख रुपये से अधिक और वीजा शुल्क लेकर लंदन में अपनी कविता पढ़ आये। [जबकि किसी विदेश यात्रा के लिए मिनिस्‍ट्री से अनुमति लेनी होती है, लेकिन इन तमाम यात्राओं के लिए कोई अनुमति नहीं ली गयी...] इसी प्रकार बंबई, मैसूर, जयपुर, रांची, इंदौर, भोपाल आदि कई शहरों में ये जाते हैं अपने काम से, पर सारा खर्च संस्थान से वसूलते रहे हैं। इन प्रत्येक शहरों की यात्राओं पर तीस से पचास हजार तक संस्थान द्वारा वसूले गये हैं।
 स्वर्ण जयंती समारोह में पांच लाख से अधिक के प्रकाशन का कार्य अपने प्रभाव से अशोक चक्रधर ने ‘डायमंड बुक्स प्रकाशन’ को दिलवाया, जहां से इनकी किताबें छपीं हैं। जबकि संस्थान द्वारा तमाम प्रकाशन का कार्य स्वयं किया जाता रहा है। स्वर्ण जयंती समारोह के तमाम कार्य अशोक चक्रधर ने अपने प्रभाव से खास-खास लोगों को दिलाये। पांच लाख से अधिक रुपये सिर्फ शॉल, फोल्डर आदि में खर्च कर दिये गये। एक डाक्यूमेंट्री फिल्म के प्रोजेक्टर द्वारा प्रदर्शन मात्र पर एक लाख रुपये खर्च किये गये। यह डाक्यूमेंट्री स्वयं उन्होंने बनायी और ‘किट्टी इमेंजिंग’ के नाम पर लाख रुपये वसूल लिये। फोटोग्राफी में एक लाख, मोंमेंटो एक लाख, लोगो डिजाइन के लिए 30 हजार रुपये खर्च किये गये।
 उपाध्यक्ष वित्त समिति का पदेन अध्यक्ष होता है। यही कारण है कि चक्रधर इस आत्‍मविश्‍वास के साथ पहले पैसे ऐंठते हैं कि बाद में तो इसे उन्‍हें ही पास करना है। वह जिस दिन भी संस्थान में पैर रखते हैं, उन्हें एक हजार रुपये का लिफाफा मिल जाता है।
 डायमंड बुक्‍स ने ही चक्रधर के जन्म दिवस समारोह को प्रायोजित किया। 15 हजार की एक कांस्य मूर्ति मंत्री एवं संस्थान के अध्यक्ष कपिल सिब्बल को स्वर्ण जयंती पर गिफ्ट देने के लिए खरीदी गयी थी। सिब्बल महोदय उक्त समारोह में नहीं आये, तो वह मूर्ति अपने जन्म दिन पर अशोक चक्रधर ने खुद गिफ्ट ले लिया। ज्ञातव्य हो कि स्वर्ण जयंती समारोह में बरती गयी गंभीर वित्तीय अनियमितता पर भी एजी, यूपी के ऑडिट में ऑब्जेक्शन आया हुआ है, जिसका जवाब अभी तक संस्थान द्वारा नहीं दिया गया है।
पिछले तीन-चार सालों में जबसे अशोक चक्रधर ने यहां का कार्यभार संभाला है, एक भी उल्लेखनीय कार्य नहीं हो सका है। उल्टे पहले से चल रही परियोजनाओं की जड़ों पर मट्ठा डालने का काम अवश्य किया गया है। जहां उनका अपना स्वार्थ जुड़ा होता है, वहीं अपना हाथ रखते हैं। मसलन संस्थान की अपनी वेबसाइट है, जिसे अपडेट करने का काम अपने आदमी को देना चाहते हैं। सिर्फ कोटेशन लेने में अब तक पचासों हजार रुपये खर्च किये जा चुके हैं। कहा जाता है कि पूर्व के एक कार्यकारी निदेशक को हटाने में अपनी एड़ी-चोटी का दम लगा दिया था, कारण कि वह इनके बेजा बिलों को पास नहीं करते थे। इसके बाद खुद निदेशक का चार्ज लेने के लिए मंत्रालय पर दबाव बनाया। ऐसा न होने पर विजय कुमार को मंत्रालय द्वारा कार्यभार दिया गया, जिनके पास पहले से ही दो-तीन संस्थानों का कार्यभार था। और अब तो अपना निदेशक भी ले आये हैं ताकि उनके अनाप-शनाप बिल पास होते रहें और हो भी यही रहा है।
दरअसल पिछले चुनाव में अशोक चक्रधर ने कांग्रेस के लिए एक पैरोडी लिखी थी, बदले में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने तोहफे की बारिश कर दी : हिंदी अकादमी, दिल्ली का उपाध्यक्ष, केंद्रीय हिंदी संस्थान का उपाध्यक्ष, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, विभिन्न मंत्रालयों के राजभाषा कमिटी के सदस्य आदि न जाने कहां-कहां बैठा दिया गया। अशोक चक्रधर ने इन संस्थानों का जमकर दुरुपयोग किया। एक पैरोडी के करोड़ों रुपये वसूल चुके चक्रधर पर कृपा इसलिए भी बरस रही है, क्‍योंकि उन्‍होंने मानव संसाधन विकास मंत्री और केंद्रीय हिंदी संस्‍थान के अध्‍यक्ष कपिल सिब्‍बल के कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद भी किया है।
मोहल्ला लाइव से साभार प्रकाशित 

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