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तभी एक बेहतर दुनिया देख पायेंगे

संवाद

अनवर फ़ज़ल से बिजू नेगी की बातचीत

राइट लाईवलीहुड कॉलेज के निदेशक व यूनिवर्सिटी सेंस मलेशिया, पेनांग से संबद्ध अनवर फ़ज़ल दुनिया भर की कई नागरिक अभियानों व संस्थाओं के प्रणेता रहे हैं. कंज्यूमर्स इंटरनेशनल के अध्यक्ष रहे 69 साल के अनवर फ़ज़ल को वैकल्पिक नोबल पुरुस्कार राइट लाईवलीहुड अवार्ड, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का ग्लोबल 500 सम्मान, गांधी-किंग-इकेदा शांति पुरस्कार, मलेशिया के सम्मानित मानोपाधि ‘दातो’समेत कई पुरस्कार और सम्मान मिले हैं. पिछले दिनों कंज्यूमर्स इंटरनेशनल की स्थापना के 50 साल पूरे होने पर कुआलालंपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में अनवर फ़ज़ल को संस्थान का प्रथम लाईफटाईम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया. इस अवार्ड के साथ दिये गये प्रशस्ति पत्र में उन्हें अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता आंदोलन के इतिहास में सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्ति कहा गया. उसी अवसर पर उनसे की गई बातचीत के अंश यहां प्रस्तुत हैं.

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कंज्यूमर्स इंटरनेशनल की स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने पर आपने कहा कि “50 वर्ष पूर्व कंज्यूमर्स इंटरनेशनल का जन्म हुआ, जिसका तब समय आ गया था.” आप क्या समझते हैं, क्या वह समय अभी भी बरकरार है?

यह उचित समय अनंत है. आपने जिस कथन का उल्लेख किया है, दरअसल वह मेरी अपनी एक कविता का ही अंश है, जो मैंने 1985 में ‘कंज्यूमर्स यूनियन ऑफ युनाइटड स्टेट्स’ की स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने पर लिखी थी. तो आप समझ सकते हैं कि इस मुद्दे की सार्थकता शाश्वत है. यह समझना जरूरी है कि आदमी हमेशा ही उपभोक्ता रहेगा. हम अक्सर भूल जाते हैं कि हम कई तरह की चीजों के उपभोक्ता हैं- उन चीजों के जो हम खरीदते हैं, उन चीजों के भी जो हमे अधिकार स्वरूप मिलती हैं, जैसे सरकारी सेवाएं, और हम उन चीजों के भी उपभोक्ता हैं जो हमे ईश्वर द्वारा मुक्तरूप से दी गई हैं जैसे हवा या पानी, हांलाकि अब इनका व्यापारीकरण हो गया है.

पानी को ही लीजिए. इसका इस हद तक व्यापारीकरण हो गया है कि हमारे प्राकृतिक जल स्त्रोत बुरी तरह दूषित किए जा चुके हैं. आज कोका-कोला व नेस्ले जैसी कंपनियां भी बोतलबंद पानी के धंधे में लग गई हैं क्योंकि इसमें अत्याधिक पैसा है. इस तरह के पानी पर काफी अध्ययन हुए हैं और उन से यही स्थापित हुआ है कि नल व बोतलबंद पानी में कुछ वास्तविक फर्क नही है. सो, कोका-कोला और नेस्ले क्या करते हैं? वे पानी में ‘जादुई’ परिवर्तन करते हैं- जैसे उसे एक हल्का रंग या महीन खुशबू व स्वाद दे देते हैं और फिर नल के पानी की तुलना में वे आपसे हजार गुणा ज्यादा पैसा वसूलते हैं. यह उपभोक्ताओं का शोषण है. और यह सब बहुत होशियारी से, विज्ञापनों द्वारा किया जाता है.

विज्ञापन हमारे भय व असुरक्षा की भावनाओं पर खेलते हैं. या वे हमे एक छद्म सुख व प्रतिष्ठा पाने के अहसास से लुभाते हैं. वे जानते हैं कि यदि वे आपको प्रभावित कर सके और विशेषकर कच्ची उम्र में यदि आपको उन चीजों की लत लगवा सकें तो वह लत आपके व्यक्तित्व का हिस्सा हो जाती है और फिर आजीवन बनी रहती है क्योंकि किसी भी आदत या लत को छोड़ना किसी चीज को सीखने से दस गुणा मुश्किल होता है.

क्या यह शोषण इसलिए भी संभव हो जाता है, क्योंकि उपभोक्ता शब्द का विशुद्ध अर्थ ही उपभोग करने से जुड़ा है?

निःसन्देह, पर उपभोग व उपभोक्तावाद में फर्क है और उपभोक्ता आंदोलन उपभोक्तावाद के खिलाफ रहे हैं. इस वजह से उन्हे दक्षिणपंथियों के विरोध का सामना भी करते रहना पड़ा है. यह विरोध इसलिए भी रहा है कि यदि हम उपभोक्ता आंदोलन का इतिहास देखें तो पाएगें कि इसके शुरूआती तार मजदूर व न्यायिक आंदोलनों से जुड़े हैं.

संयुक्त राष्ट्र द्वारा उपभोक्ता आंदोलन पर कराया गया सबसे पहला अध्ययन अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठन- आईएलओ ने किया था, जिसका शीर्षक था उपभोक्ता संरक्षण पर अध्ययन संदर्शिका - ‘स्टडी गाइड फॉर कन्ज्यूमर प्रोटेक्शन.’ इसमें कर्मियों को अपना पैसा चोरी होने से बचाने के निर्देश दिए गये थे. पैसा चोरी से संदर्शिका का इशारा उस उधार-व्यवस्था से था जो उपभोक्ताओं को मासिक किश्त के एवज में वस्तु देते हैं. कहने को तो इन किश्तों पर ब्याज 8-10 प्रतिशत होता है, पर कुल मिला कर देखें तो वह अंततः 40 प्रतिशत तक पड़ जाता है. कर्मियों को इस तरह की खुली लूट के प्रति सजग किया गया था.

तो एक चेतना जागृत करने का प्रयास था कि लोग अपने पैसे का सही मूल्य प्राप्त करें?

इतना ही नही. आंदोलन उन वस्तुओं पर भी निशाना साधते रहे हैं जो न्यायसंगत परिस्थितियों में न बनाई गई हों. उपभोक्ता आंदोलन के इस पक्ष के बारे में लोगों को कम ही अहसास है, क्योंकि वे ऐसे मुद्दों को मजदूर आंदोलनों से जोड़ कर देखते हैं, जबकि उपभोक्ता आंदोलन ने उत्पादन प्रक्रिया, उपभोग प्रक्रिया और उपभोग के बाद अपशिष्ट उत्पाद और इन सबका पर्यावरण पर प्रभाव पर सोच व्यक्त व विकसित की है.

कंज्यूमर्स इंटरनेशनल की पत्रिका के पहले अंक के संपादकीय में यह स्पष्ट लिखा था कि हम वस्तुओं को न केवल उपभोग की दृष्टि से देखें वरन् उनका उत्पादन किस तरह से किया है, उस बात के प्रति भी बराबर चिंतित रहें.

1960 व 1970 के दशकों में, विशेषकर विकासशील देशों में जहां तब पर्यावरण आंदोलन लगभग न के बराबर थे, वहां अक्सर उपभोक्ता आंदोलनों ने ही उनके मुद्दे उठाए. कंज्यूमर्स इंटरनेशनल की स्वयं मेरी अध्यक्षता के दौरान 1978-1984 में हमने रासायनिक कीटनाशकों का मुद्दा बड़ी जोर-शोर से उठाया और उनके विरोध में पर्यावरण समूहों, मजदूर संघों, चर्च समूहों को जोड़ा. उसके बाद हमने ‘मां का दूध’मुद्दा उठाया और उसमे भी सभी तरह के समूहों, धार्मिक, महिला, आदि को साथ लिया.


हमने दवा कंपनियों के खिलाफ आवाज उठाई और उसमें भी कई तरह के समूहों को जोड़ा. ये सभी आंदोलन, वास्तव में उपभोक्ता आंदोलन के नए चेहरे थे जो उपभोक्ताबोध के तीन मूल्यों पर आधारित थे- पैसों के प्रति, लोगों के प्रति, व पर्यावरण के प्रति. कई मायनों में, उपभोक्ता आंदोलन ऐसे मुद्दों पर व प्रयासों को एक आवश्यक समग्रता प्रदान करता दिखता है.

‘कंज्यूमर्स यूनियन ऑफ युनाइटड स्टेट्स’ के प्रथम वार्षिक रपट में भी, जितने अधिक उत्पादों को लेकर संभव हो सका, उनका उत्पादन कर रही कंपनियों का भी मूल्यांकन किया गया था कि अमुक कंपनी मजदूरों को लेकर कितनी प्रतिबद्ध है, आदि. 1980 के दशक में ‘एक बेहतर दुनिया के लिए खरीदारी’ जैसी संदर्शिका उपलब्ध हो गई थी, जिसमें उत्पादों व उनकी उत्पादन कंपनियों के मूल्यांकन के लिए सात-आठ सामाजिक व पर्यावरणीय मानदण्ड स्थापित किए गए थे कि क्या अमुक कंपनी सैन्य उत्पादन से जुड़ी है? यदि हां, तो उसका समर्थन न करें. क्या अमुक कंपनी दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद का समर्थन करती है? उसका बहिष्कार करें, उसके उत्पाद न खरीदें, आदि. एक उपभोक्ता के पास बड़ी ताकत है- न खरीदने की ताकत.

तो उपभोक्ता आंदोलन विशुद्ध उपभोक्ता विषय के बाहर भी जागृत व क्रियाशील रहे?

विशुद्ध उपभोक्ता की मेरी परिभाषा इतनी व्यापक है कि वह किसी भी चीज से अछूती नही है. मैं समझता हूं कि यदि कोई उपभोक्ता संगठन ऐसा व्यापक नजरिया नही रखता या मात्र पैसे से अलग लोक मूल्य या पर्यावरणीय मूल्य को आत्मसात नही करता है तो वह एक अधूरा, विखंडित संगठन है.

कुछ संवाद और...


पर चुनौतियां अभी भी हैं?

बेशक. हमें न सिर्फ नीतिपरक उपभोग की बात करनी है बल्कि गांधीजी के ‘सरल जीवनयापन’ के मार्ग पर भी चलना है. हमें अपनी आवश्यकता के अनुसार खरीदना है, न कि अपने लालच के अनुसार. मगर दुर्भाग्यवश आज ऐसी वैश्विक व्यवस्था पनप गई है, जहां सामाजिक, राजनैतिक व संचार तंत्रों सभी ने एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था खड़ी कर दी है, जिसमें लोग पूंजीवाद के पूर्णतः गुलाम बना दिए जा रहे हैं. जिसमें मूल्यों का प्रचार-प्रसार नही बल्कि लोगों के मनों को इस तरह वश में किया जा रहा है, जिसमें लालच को, फैशन की छद्म प्रतिष्ठा को प्रोत्साहन दिया जाता है.

इसलिये हमें अभी बहुत कुछ करना है. रीगन युग व थैचर युग में कई उपभोक्ता संरक्षण कानूनों को विखंडित कर दिया गया, कानून जो कई दशकों के संघर्ष के बाद प्राप्त हुए थे. कंपनियों को अथाह अधिकार दे दिए गए. बाजार को तथाकथित मुक्त किया गया- कंपनियों द्वारा शोषण के लिए, न कि लोगों के हित के लिए. फलस्वरूप, आज पहले से कई ज्यादा लोग भूखे व कुपोषित हैं. सो, हमारी लड़ाई वास्तव में एक व्यवस्था के विरुद्ध है और उपभोक्ता आंदोलन के मूल मुद्दे आज भी सार्थक हैं.

हमें वैश्वीकरण की पूंजीवादी प्रक्रिया के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़नी है. कम्प्यूटर व इंटरनेट हमें इस संघर्ष में नए अवसर प्रदान करता है. हमें इस नए संचार माध्यम के व्यापक पंहुच का पूरा लाभ उठाना व उसे प्रभावकारी तरीके से प्रयोग करना सीखना होगा. उपभोक्ता आंदोलनों को यह माध्यम अन्य आंदोलनों से बखुबी जुड़ने का मौका देता है जिससे हम किसी भी मुद्दे को उसकी समग्रता में देख-समझ सकते हैं. एक-दूसरे से जुड़कर, एक-दूसरे से सीखकर और एक-दूसरे की उर्जा से हम और अधिक प्रभावकारी हो सकते हैं और उस उर्जा को और व्यापक बांट-हस्तांतरित कर सकते हैं.

क्या आपने कभी भारत या भारतीयों के साथ काम किया है?

मेरे पिताजी भारतीय थे और जालंधर इलाका, पंजाब से आकर यहां मलेशिया में बस गए थे, पर मेरा स्वंय भारतीयों से बहुत करीब का संपर्क रहा है- न सिर्फ उपभोक्ता आंदोलन से जुड़े लोगों से बल्कि एक व्यापक क्षेत्र, पर्यावरण से लेकर मानवाधिकार से लेकर मीडिया, आदि से जुड़े लोगों के साथ. मैं ऐसे सैकड़ों लोगों के नाम गिना सकता हूं. मेरे लिए वे लोग विभिन्न क्षेत्रों व अलग-अलग आंदोलनों से न हो कर, एक साझा बेहतर दुनिया के लिए प्रयासरत, हिंसा और छल-कपट की संस्कृति के विरुद्ध संघर्षरत थे, हैं और मैं उनसे आसानी से जुड़ सका. यदि आपके मूल सिद्धांत व मूल्य ठोस हैं, जैसे गांधीजी के सात सामाजिक पाप- राजनीति बगैर सिद्धांत, धन बगैर कर्म, सुख बगैर विवेक, ज्ञान बगैर चरित्र, व्यापार बगैर नैतिकता, विज्ञान बगैर मानवता, भक्ति बगैर त्याग- तो सभी मुद्दे महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

आपने गांधीजी का नाम लिया. और किन व्यक्तियों से आपने प्रेरणा ली हैं?

बहुत लोग हैं. मेरी दृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति जिसने अच्छा काम किया है, मैंने उससे प्रेरणा ली है. न सिर्फ वे लोग जिन्होनें कोई बड़ा मुकाम हासिल किया बल्कि दुनिया भर में सैकड़ों छोटी-छोटी जगहों में छोटे-छोटे काम कर रहे, छोटे-छोटे लोग जिनके छोटे छोटे प्रयासों से ही बदलाव आता है.

हम में से सभी बदलाव ला सकते हैं. जरूरी है कि हम व्यक्तिगत स्तर पर निर्णय लें. हम तय कर लें कि हम जहां भी हैं, और जो हो सकेगा, जिसके साथ हो सकेगा, हम करेंगे. व्यक्तिगत हैसियत से, व्यक्तिगत स्तर पर हम यह निर्णय लें कि हम वे चीजें, और उन कंपनियों की चीजें नही खरीदेंगें, सेवाएं नही लेंगें जिन्हें हम सोचते हैं कि गलत हैं. हम सरल जीवन जिएंगे, हम पर्यावरण की परवाह करेंगे. हम वही खरीदेंगे जिसका मानव समाज व पर्यावरण पर सुखद प्रभाव हो. तब हम एक बेहतर दुनिया देख पाएंगे.


रविवार.कॉम से साभार प्रकाशित

Comments

  1. आम जनता को शोषण की चक्की में पिसने से बचाने का अच्छा प्रयास....

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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