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इश्वर सबको सदबुद्धि दे....

मै पलकें नीची किये बगल से गुजर जाऊंगा जब तुम किसी पार्क में --------------.रही होगी, क्योंकि मेरे बाप का क्या जाता है?, मै देख कर भी अनदेखा करूँगा क्योंकि, मुझसे क्या मतलब होगा?...तुम कुछ भी करो, मै अपने काम से काम रखूँगा, जब किसी दीवार के पीछे या झाडियों की ओट से या किसी तनहा कमरे से तुम्हारी आहट मिलेगी क्योंकि, तुम्हें अपना भला-बुरा अच्छी तरह पता है!!..पर याद रखना मै उस वक्त भी चुप रहूँगा जब तुम किसी के एक फोन पर उससे मिलने जाओगी इंडिया गेट, या किसी पब या बार के बाहर जब तुम्हारे कपडे तार-तार हो रहे होंगे या जब किसी चलती बस में तुम्हारा बालात्कार हो रहा होगा ....मुझे डर होगा कही तुम फिर मुझे अपना रास्ता देखने की नसीहत न पकड़ा दो ..... मुझे हमेशा दुख रहेगा उन माँ-बाप के लिए जो तुमपर भरोसा करते है...इश्वर सबको सदबुद्धि दे.

ये है भारत का वो इकलौता गांव, जिसके पास है देश का तिरंगा बनाने का लाइसेंस

63 गणतंत्र का साक्षी बना भारत देश इस महीने 26 जनवरी को 64वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। इस खास मौके को लेकर  dainikbhaskar.com  एक स्पेशल सीरीज चला रहा है। पाठकों को संविधान, गणतंत्र और तिरंगे से जुड़ी रोचक जानकारियां देंगे। इस सीरीज के पहले दिन  आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि देश की शान तिरंगा आखिर बनता कैसे है? क्यों भारत के सिर्फ एक ही शहर को तिरंगा बनाने का अधिकार दिया गया है। साथ ही हम आपको बताएंगे कि किन-किन प्रक्रियाओं से गुजरकर आप तक पहुंचता है तिरंगा। 26 जनवरी को गांव के प्रधान से लेकर देश के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति तक सभी झंडा रोहण करते हैं। हम सभी भी अपने घरों पर शान से झंडा फराते हैं। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड द्वारा राष्ट्रध्वज को तैयार करने के तीन दस्तावेज जारी किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि सभी झंडे खादी के सिल्क या कॉटन के होंगे। झंडे बनाने का  मानक 1968 में तय किया गया जिसे 2008 में पुन: संशोधित किया गया। तिरंगे के लिए नौ स्टैंडर्ड साइज तय किए गए हैं। सबसे बड़ा झंडा 21 फीट लंबा और 14 फीट चौड़ा होता है।   सबसे पहले ब...

गत्यात्मक ज्योतिष : श्रीमती संगीता पुरी

गत्यात्मक ज्योतिष : श्रीमती संगीता पुरी

तलाश उर्फ खूबसूरत आत्मा का खूनी बदला !!

आमिर   के बारे में कहा जाता है वे पटकथा पढ़कर किसी फिल्म के लिए हां करते हैं, आमिर इस मामले में बहुत सजग माने जाते हैं। आमिर की फिल्में कुछ अलग होती हैं, उनके ट्रीटमेंट, कहानी आदि सब में कुछ नयापन होता है। आमिर पर भरोसा करने वाले तलाश देखने भी इसी उम्मीद से जायेंगे कि आमिर अपने छवि पर खरा उतरेंगे। पर यह फिल्म आमिर की साख के अनुरूप बिलकुल नहीं है। हाल के कुछ वर्षों में सिनेमा ने दर्शकों की पसंद को समृद्ध भी किया है, आमिर भी अच्छा सिनेमा देने के लिए, दर्शकों की रूचि परिष्कृत करने के लिए जाने जाते हैं, लिहाजा यह फिल्म उल्टी पड़ गयी है। दर्शक को आमिर से यह उम्मीद तो नहीं ही होगी। इस फिल्म में आप कहानी की ‘तलाश’ करते रह जायेंगे। ‘तलाश’ फिल्म एक भुतहा या हारर फिल्म नहीं भी कही जाए पर आत्मा के विश्वास पर केंद्रित तो है ही। ‘तलाश’ की कहानी फिल्म स्टार अरमान कपूर की कार समन्दर में डूब जाती है। कार खुद अरमान चला रहा था, वह आत्महत्या नहीं कर सकता था फिर ऐसा क्या हुआ कि रात में सुनसान सडक पर तेज गति से दौड़ती हुई गाड़ी अचानक समंदर की ओर घूम गयी और सीढियां तोड़ते हुए समंदर में जा घुसी…! ...

शाहरुख का विस्तार और नियति की सीमाएं

धन एक अजीब उद्दीपक है। यह हठ को अकड़ देता और बुद्धि को नरम करता है, जबकि इसका उल्टा ज्यादा उपयोगी हो सकता था। इसमें थोड़ी-सी चेहरे की पहचान भी मिला लीजिए, जिसके लिए सेलिब्रिटी बड़े बेकरार रहते हैं और प्रतिमा-भक्त जिसकी पेशकश करते हैं। और फिर जो कॉकटेल बनता है, वह इतना प्रचंड होता है कि ठीक आपके चेहरे पर फटने में इसे बस एक पल ही लगता है।  चूंकि सेलिब्रिटी दोष स्वीकार करना अपनी सेहत के लिए हानिकारक मानते हैं, इसलिए ढिठाई भी एक ही कदम दूर होती है। हर सुपरस्टार इस बीमारी का शिकार नहीं होता, लेकिन मौके-बेमौके उन्माद का हमला होने पर बचाव के चंद रास्ते ही होते हैं। मैं शाहरुख खान से दो बार मिला हूं। एक बार हाल ही में। और तीसरे मौके पर संभवत: कुछ क्षण के लिए। निश्चित तौर पर यह निकटता का सबूत नहीं है, इसलिए इसे बस जान-पहचान ही रहने दीजिए। परंतु मैं जितना भी थोड़ा-बहुत जानता हूं, उससे पहले प्रभाव की पुष्टि होती है।  वे बेहद दिलकश और बुद्धिमान शख्स हैं। उनका बेहतरीन गुण है मृदु हास्यबोध। तीखी और यहां तक कि कटु टिप्पणी इस हास्यबोध के आड़े आती है। लेकिन वे रिश्तों पर चोट पहुंचाए बगैर दुनि...

‘कोल’गेट की काली राजनीति

मान लें कि आप एक विशाल संयुक्त परिवार में रहते हैं। परिवार के सदस्यों में मतभेद हैं, फिर भी वे एक इकाई की तरह साथ रहते हैं। परिवार एक विशाल ज्वैलरी शॉप का मालिक है, जो बहुमूल्य रत्न-आभूषणों और पारिवारिक खजाने से भरपूर है। इस शॉप को चलाने के लिए परिवार एक मैनेजर को नियुक्त करते हुए उसे इसका पूरा नियंत्रण सौंप देता है।  यहां तक कि मैनेजर को इन गहनों को बेचना भी नहीं पड़ता। वह तो चयन संबंधी कुछ मानदंडों (जो मैनेजर द्वारा खुद ही तैयार किए गए हैं) की कसौटी पर जिसे चाहे हीरे-मोती जैसे ये बेशकीमती नगीने दे सकता है। इस तरह मैनेजर अपने पसंदीदा लोगों को रेवड़ियां बांट सकता है और चाहे जिसे ठुकरा सकता है।  जरा सोचिए कि ऐसी स्थिति में कोई भी मैनेजर क्या करेगा? जाहिर तौर पर वह पहले अपने मित्रों व सगे-संबंधियों को बुलाकर यह सुनिश्चित करेगा कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में रत्न-आभूषण मिल जाएं। मैनेजर उन लोगों को भी गहने वगैरह बांटेगा, जो उसे बदले में नकद लाभ या उपहार वगैरह दे सकें। इस तरह जल्द ही दुकान लुट जाएगी और परिवार को भारी घाटा झेलना होगा। इसके बाद, मान लें कि परिवार पहले मैनेजर को बाहर...

मिलिए FB की पहली महिला इंजीनियर से, इनके दम पर खड़ी हुई कंपनी

साल 2005 की बात है। फेसबुक हैडक्वार्टर एकदम खाली भूतहा जैसा दिख रहा था। एक लड़की पहली जॉब और इंटरव्यू के लिए ऑफिस में बैठी थी। दोपहर में लगभग दो घंटे इंतजार करने के बाद उसे बुलाया गया।  लड़की ने फेसबुक प्रमुख  'मार्क जुकरबर्ग'  को ऐसा प्रभावित किया कि वह बन गई  'फेसबुक'   की पहली महिला इंजीनियर। यह लड़की थी  'रुचि सांघवी' , जिसने फेसबुक की सबसे विवादित फीचर  'न्यूज फीड'   का आइडिया दिया। उन्होंने अपने कुछ बेहतरीन आईडिया से फेसबुक को दुनिया की सोशल नेटवर्किंग साइट बनाया. 2005 में नौकरी ज्वाइन करने वाली 23 वर्षीय रुचि ने 2010 में कंपनी में बड़े पद को छोड़कर सबको चौंका दिया। महाराष्ट्र के पुणे की रहने वाली रुचि सांघवी ने फेसबुक उस समय ज्वाइन किया, जब उसे कोई जानता नहीं था। वह शुरुआत के 10 इंजीनियर्स में अकेली लड़की थी। सिर्फ पांच साल के फेसबुक करियर में उन्होंने कंपनी को दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किग साइट बनते हुए देखा। अपने पिता की कंपनी से न जुड़कर रुचि कुछ अलग करना चाहती थीं। उन्होंने अमेरिका जाकर  'कार्न...