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सत्यजित ना होते तो सत्यमेव जयते ना होता।

आमिर खान की प्रस्तुति सत्यमेव जयते के 13 एपीसोड पूरे हो गए। इस शो के इंपैक्ट के ऊपर भी उन्होंने एक एपिसोड शूट किया है, जो जल्द प्रसारित होगा। सत्यमेव जयते की पूर्णाहुति कर आमिर खान अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए निकल चुके हैं। वे शिकागो में धूम-3 की शूटिंग करेंगे। सत्यमेव जयते के निर्देशक सत्यजित भटकल का काम अभी समाप्त नहीं हुआ है। वे इसे समेटने में लगे हैं। सत्यमेव जयते से निकलने में उन्हें और उनकी टीम को वक्त लगेगा। पिछले ढाई-तीन सालों से वे अपनी टीम के साथ इस स्पेशल शो की तैयारियों, शोध, अध्ययन और प्रस्तुति में लगे रहे। उनकी मेहनत और सोच का ही यह फल है कि सत्यमेव जयते टीवी का असरकारी प्रोग्राम साबित हुआ। हालांकि ऊपरी तौर पर सारा क्रेडिट आमिर खान ले गए और यही होता भी है। टीवी हो या फिल्म,उसके ऐंकर और कलाकारों को ही श्रेय मिलता है। सत्यमेव जयते भारतीय टीवी परिदृश्य का ऐसा पहला शो है, जिसने दर्शकों समेत ब्यूरोक्रेसी, सरकार और राजनीतिज्ञों को झकझोरा। सामाजिक मुद्दों और विषयों पर पहले भी शो आते रहे हैं, लेकिन सत्यमेव जयते की तरह सारगर्भित और प्रभावकारी शो और कोई नहीं आ पाया। शो में ...

क्या GOW ‘सत्या’ का झारखंडी-बिहारी देहातीकरण है?

♦ उदय प्रकाश रा त पौने ग्यारह का शो था। डेढ़ के आस-पास छूटा। पूरा हाल ठसा-ठस भरा हुआ था। हर डायलाग पर तालियां और सीटियां। हर डायलाग एक पंचलाइन। शोले के सलीम-जावेद, यहूदी के सोहराब मोदी और अभी हाल वाले कादिरखान के संवादों को बाहर का गेट दिखाती एक डरावनी, हारर, हास्य-फिल्म। एक वायोलेंट कामेडी। फनी … फन-फिल्म। घर पहुंचते-पहुंचते  ढाई बज गये थे। पिटरौल पंप के पास  तड़ातड़ गोलियां। कार के दोनों साइड के कांच तोड़ के, कट्टा और आटोमेटिक तमंचे की नली नीचे करके। गियर बक्सा की साइड पर, सीट की आड़ में भी छुपा हो साला तो छेद डाल। दाहिनी कनपटी में  छेद हो गया है। खून से बायें हाथ का पंजा भीग गया है। दाहिने में पिस्तौल। बनारस में चिरकुट आर्मडीलर यादव को गोली मार कर उड़ाया गया आटोमेटिक पिस्तौल। कमीज पैंट  सब में खून। खूनम खून। सरदार खान  सूरज की चकमक रोशनी के खिलाफ चौंधियाया हुआ, मुंह खोल कर सांस भरता, किसी कदर डगमगाता हुआ ‘जयसवाल बिल्डिंग मेटीरियल’ के छकड़े पर गिर कर ढेर हो जाता है। पंजे से पिस्तौल छूट कर जमीन में गिरती है। छकड़े का पहिया पिस्तौल पर चढ़ता है औ...

सिनेमा को मुंबई से छीनने के लिए शटलकॉक ब्‍वॉयज देखिए

♦ अविनाश क ल शटलकॉक ब्‍वॉयज रीलीज हो रही है। चार सालों के संघर्ष के बाद। इससे पहले कुछ फिल्‍म महोत्‍सवों में शटलकॉक ब्‍वॉयज दिखायी गयी है। अच्‍छा ये लग रहा है कि शटलकॉक ब्‍वॉयज उन फिल्‍मों की छोटी सी फेहरिस्‍त में शामिल हो गयी है, जिसने अपनी निर्माण प्रक्रिया में मुंबई का सहारा नहीं लिया। सिनेमा निर्माण के विकेंद्रीकरण को लेकर एक पूरी बहस इन दिनों चल रही है। एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार ने आधे घंटे की एक डॉक्‍युमेंट्री मेरठ में फिल्‍मों की खेती पर की थी। जैसे जैसे टेक्‍नॉलॉजी सस्‍ती और सुलभ होगी, उसकी विशेषज्ञता का समूह भी बड़ा होगा। शटलकॉक ब्‍वॉयज  इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं। युवा उद्यमिता (Youth Entrepreneurship) की एक सामान्‍य सी कहानी को चुस्‍त पटकथा, सहज संवाद और संयमित संपादन के जरिये बेहद रोचक बना दिया गया है। अलग अलग मन-मिजाज के चार दोस्त फॉर्मूला जीवन जीने से इनकार कर देते हैं और नये रास्‍ते पर चलने का जोखिम उठाते हैं। बहुत पहले  अखिलेश की एक कहानी चिट्ठी में चार ऐसे ही दोस्‍त हैं। भारत में उदारीकरण की धमक से पहले अखिलेश ने ये कहानी बुनी थी। विश्‍वविद्य...

यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे, तबे एकला चलो रे!

♦ आमिर खान … मैं अकेला क्या कर सकता हूं? एक अरब बीस करोड़ की आबादी में मैं तो बस एक हूं। अगर मैं बदल भी जाता हूं, तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? बाकी का क्या होगा? सबको कौन बदलेगा? पहले सबको बदलो, फिर मैं भी बदल जाऊंगा। ये विचार सबसे नकारात्मक विचारों में से हैं। इन सवालों का सबसे सटीक जवाब दशरथ मांझी की कहानी में छिपा है। यह हमें बताती है कि एक अकेला आदमी क्या हासिल कर सकता है? यह हमें एक व्यक्ति की शक्ति से परिचित कराती है। यह हमें बताती है कि आदमी पहाड़ों को हटा सकता है। बिहार में एक  छोटा सा गांव गहलोर पहाड़ों से घिरा है। नजदीकी शहर पहुंचने के लिए गांव वालों को पचास किलोमीटर घूम कर जाना पड़ता था, जबकि उसकी वास्तविक दूरी महज पांच किलोमीटर ही थी। दरअसल, शहर और गांव के बीच में एक पहाड़ पड़ता था, जिसका चक्कर लगाकर ही गांव वाले वहां पहुंच पाते थे। इस पहाड़ ने गहलोर के वासियों का जीवन नरक बना दिया था। एक दिन गांव में दशरथ मांझी नाम के व्यक्ति ने फैसला किया कि वह पर्वत को काटकर उसके बीच से रास्ता निकालेगा। अपनी बकरियां बेचकर उन्होंने एक हथौड़ा और कुदाल खरीदी और अपने अभियान में ज...

कॉकटेल:दिखने में नयी,सोच में पुरानी।

होमी अदजानिया निर्देशित कॉकटेल की कहानी इम्तियाज अली ने लिखी है। इम्तियाज अली की लिखी और निर्देशित फिल्मों के नायक-नायिका संबंधों को लेकर बेहद कंफ्यूज रहते हैं। संबंधों को स्वीकारने और नकारने में ढुलमुल किरदारों का कंफ्यूजन ही उनकी कहानियों को इंटरेस्टिंग बनाता है। कॉकटेल के तीनों किरदार गौतम, वेरोनिका और मीरा अंत-अंत तक कंफ्यूज रहते हैं। इम्तियाज अली ने इस बार बैकड्रॉप में लंदन रखा है। थोड़ी देर के लिए हम केपटाउन भी जाते हैं। कहानी दिल्ली से शुरू होकर दिल्ली में खत्म होती है। गौतम कपूर आशिक मिजाज लड़का है। उसे हर लड़की में हमबिस्तर होने की संभावना दिखती है। वह हथेली में दिल लेकर चलता है। लंदन उड़ान में ही हमें गौतम और मीरा के स्वभाव का पता चल जाता है। लंदन में रह रही वेरोनिका आधुनिक बिंदास लड़की है। सारे रिश्ते तोड़कर मौज-मस्ती में गुजर-बसर कर रही वेरोनिका के लिए आरंभ में हर संबंध की मियाद चंद दिनों के लिए होती है। एनआरआई शादी के फरेब में फंसी मीरा पति से मिलने लंदन पहुंचती है। पहली ही मुलाकात में उसका स्वार्थी पति उसे दुत्कार देता है। बेघर और बेसहारा हो चुकी मीरा को वेरो...

उत्‍सवधर्मी भारतीय समाज में उत्‍सव के सोलह प्रसंग क्‍या हैं?

♦ अजय ब्रह्मात्‍मज भा रतीय दर्शन और जीवनशैली में गर्भधारण से मृत्‍यु तक के विभिन्‍न चरणों को रेखांकित करने के साथ उत्‍सव का प्रावधान है। आरंभ में हम इसे चालीस संस्‍कारों के नाम से जानते थे। गौतम स्‍मृति में चालीस संस्‍कारों का उल्‍लेख मिलता है। महर्षि अंगिरा ने इन्‍हें पहले 25 संस्‍कारों में सीमित किया। उसके बाद व्‍यास स्‍मृति में 16 संस्‍कारों का वर्णन मिलता है। इन संस्‍कारों का  किसी धर्म, जाति, संप्रदाय से सीधा संबंध नहीं हैं। वास्‍तव में ये संस्‍कार मनुष्‍य जीवन के सभी चरणों के उत्‍सव हैं। इन उत्‍सवों के बहाने परिजन एकत्रित होते हैं। उनमें परस्‍पर सहयोग, सामूहिकता और एकता की भावना बढ़ती है। जीवन का सामूहिक उल्‍लास उन्‍हें जोड़ता है। आधुनिक जीवन पद्धति के विकास के साथ वर्तमान में संयुक्‍त परिवार टूट रहे हैं। फिर भी 16 संस्‍कारों में से प्रचलित कुछ संस्‍कारों के अवसर पर विस्‍तृत परिवार के सभी सदस्‍यों और मित्रों के एकत्रित होने की परंपरा नहीं टूटी है। शहरों में न्‍यूक्लियर परिवार के सदस्‍य अपने मित्रों और पड़ोसियों के साथ इन संस्‍कारों का उत्‍सव मनाते हैं। देहातों और कस्...

सिने बहसतलब : अनुराग के गीत जिंदा रहेंगे ?

सिने बहसतलब के पहले दिन बहुत देर से पहुंचा अनुराग कश्यप बस उठकर जाने ही वाले थे ।  मंच पर डॉ.चन्द्र प्रकाश द्रिवेदी,अभिषेक शर्मा और स्वानंद किरकिरे मुख्य रूप से उपस्तिथ थे ।  वहा होने वाली जायदा बातें तो याद नहीं रही बस स्वानंद की एक बात याद रह गयी,स्वानंद ने कहा की आज गानों की हालत फिल्म में उतनी ठीक नहीं है,कोर्पोरेट कंपनी को आज संगीत और म्यूजिक की जरुरत बस उतनी है जितनी की मोबाइल कंपनी को कॉलर टियून की ।  स्वानंद की बात ने गहरा प्रभाव छोड़ा की आज लेखक की स्वतंत्रता प्रोडूसर और कंपनी के मुनाफे में कैद है,लेखक की कलम उनके ही इशारे पर चलती है ।  अनुराग की फिल्मो की बात करें तो अनुराग की फिल्मों के गीतों में हमेशा एक वीर रस और उल्लास्ता को महसूस किया जा सकता है लेकिन यह दोनों चीज़ें कोर्पोरेट कंपनी के फॉर्मेट में बहुत जायदा जगह पाती हो ऐसा नहीं है तो ऐसे में मेरे जेहन में यह सवाल अगले दिन तक कौंधता रहा की क्या कुछ दिन बाद अनुराग की फिल्मो से गीत गायब हो जाएँगे ।   क्योंकि जब गीत बिकेंगे ही नहीं तो उन पर बहुत अधिक समय तक पैसा ख...