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फिर मचल उठे अल्फाज़ आतंकवाद के खात्मे को

फिर मचल पड़ें है अल्फाज़ आतंकवाद के विरोध को,फिर छेड़ दी है हमने ज़ंग आतंकवाद के खात्मे को तो दोस्तों दिल मे दबे जोश को बाहर निकालिए और रखिये अपनी बात इस मंच पर,क्योंकि यह हमारी और हमारे देश की सुरक्षा का सवाल है !
''हिन्दुस्तान का दर्द''द्वारा आयोजित बहस मे एक बार फिर हम हाजिर है आचार्य संजीव 'सलिल'
की एक रचना लेकर !तो पढिये इस रचना को और दीजिये अपनी राय!


अबकी बार होली में.

करो आतंकियों पर वार अबकी बार होली में.
न उनको मिल सके घर-द्वार अबकी बार होली में.

बना तोपोंकी पिचकारी चलाओ यार अब जी भर.
निशाना चूक न पाए, रहो गुलज़ार होली में.

बहुत की शांति की बातें, लगाओ अब उन्हें लातें.
न कर पायें घातें कोई अबकी बार होली में.

पिलाओ भांग उनको फिर नचाओ भांगडा जी भर.
कहो बम चला कर बम, दोस्त अबकी बार होली में.

छिपे जो पाक में नापाक हरकत कर रहे जी भर.
करो बस सूपड़ा ही साफ़ अब की बार होली में.

न मानें देव लातों के कभी बातों से सच मानो.
चलो नहले पे दहला यार अबकी बार होली में.

जहाँ भी छिपे हैं वे, जा वहीं पर खून की होली.
चलो खेलें 'सलिल' मिल साथ अबकी बार होली में.

जहाँ भी छिपे हैं वे, जा वहीं पर खून की होली.
चलो खेलें 'सलिल' मिल साथ अबकी बार होली में.

जहाँ भी छिपे हैं वे, जा वहीं पर खून की होली.
चलो खेलें 'सलिल' मिल साथ अबकी बार होली में.

आगे पढ़ें के आगे यहाँ

Comments

  1. संजीव जी आपकी रचना मे आतंकवाद के प्रति नफरत झलक रही है
    उम्दा लेखन

    ReplyDelete

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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