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तलाश उर्फ खूबसूरत आत्मा का खूनी बदला !!

आमिर   के बारे में कहा जाता है वे पटकथा पढ़कर किसी फिल्म के लिए हां करते हैं, आमिर इस मामले में बहुत सजग माने जाते हैं। आमिर की फिल्में कुछ अलग होती हैं, उनके ट्रीटमेंट, कहानी आदि सब में कुछ नयापन होता है। आमिर पर भरोसा करने वाले तलाश देखने भी इसी उम्मीद से जायेंगे कि आमिर अपने छवि पर खरा उतरेंगे। पर यह फिल्म आमिर की साख के अनुरूप बिलकुल नहीं है। हाल के कुछ वर्षों में सिनेमा ने दर्शकों की पसंद को समृद्ध भी किया है, आमिर भी अच्छा सिनेमा देने के लिए, दर्शकों की रूचि परिष्कृत करने के लिए जाने जाते हैं, लिहाजा यह फिल्म उल्टी पड़ गयी है। दर्शक को आमिर से यह उम्मीद तो नहीं ही होगी। इस फिल्म में आप कहानी की ‘तलाश’ करते रह जायेंगे। ‘तलाश’ फिल्म एक भुतहा या हारर फिल्म नहीं भी कही जाए पर आत्मा के विश्वास पर केंद्रित तो है ही। ‘तलाश’ की कहानी फिल्म स्टार अरमान कपूर की कार समन्दर में डूब जाती है। कार खुद अरमान चला रहा था, वह आत्महत्या नहीं कर सकता था फिर ऐसा क्या हुआ कि रात में सुनसान सडक पर तेज गति से दौड़ती हुई गाड़ी अचानक समंदर की ओर घूम गयी और सीढियां तोड़ते हुए समंदर में जा घुसी…! ...

शाहरुख का विस्तार और नियति की सीमाएं

धन एक अजीब उद्दीपक है। यह हठ को अकड़ देता और बुद्धि को नरम करता है, जबकि इसका उल्टा ज्यादा उपयोगी हो सकता था। इसमें थोड़ी-सी चेहरे की पहचान भी मिला लीजिए, जिसके लिए सेलिब्रिटी बड़े बेकरार रहते हैं और प्रतिमा-भक्त जिसकी पेशकश करते हैं। और फिर जो कॉकटेल बनता है, वह इतना प्रचंड होता है कि ठीक आपके चेहरे पर फटने में इसे बस एक पल ही लगता है।  चूंकि सेलिब्रिटी दोष स्वीकार करना अपनी सेहत के लिए हानिकारक मानते हैं, इसलिए ढिठाई भी एक ही कदम दूर होती है। हर सुपरस्टार इस बीमारी का शिकार नहीं होता, लेकिन मौके-बेमौके उन्माद का हमला होने पर बचाव के चंद रास्ते ही होते हैं। मैं शाहरुख खान से दो बार मिला हूं। एक बार हाल ही में। और तीसरे मौके पर संभवत: कुछ क्षण के लिए। निश्चित तौर पर यह निकटता का सबूत नहीं है, इसलिए इसे बस जान-पहचान ही रहने दीजिए। परंतु मैं जितना भी थोड़ा-बहुत जानता हूं, उससे पहले प्रभाव की पुष्टि होती है।  वे बेहद दिलकश और बुद्धिमान शख्स हैं। उनका बेहतरीन गुण है मृदु हास्यबोध। तीखी और यहां तक कि कटु टिप्पणी इस हास्यबोध के आड़े आती है। लेकिन वे रिश्तों पर चोट पहुंचाए बगैर दुनि...

‘कोल’गेट की काली राजनीति

मान लें कि आप एक विशाल संयुक्त परिवार में रहते हैं। परिवार के सदस्यों में मतभेद हैं, फिर भी वे एक इकाई की तरह साथ रहते हैं। परिवार एक विशाल ज्वैलरी शॉप का मालिक है, जो बहुमूल्य रत्न-आभूषणों और पारिवारिक खजाने से भरपूर है। इस शॉप को चलाने के लिए परिवार एक मैनेजर को नियुक्त करते हुए उसे इसका पूरा नियंत्रण सौंप देता है।  यहां तक कि मैनेजर को इन गहनों को बेचना भी नहीं पड़ता। वह तो चयन संबंधी कुछ मानदंडों (जो मैनेजर द्वारा खुद ही तैयार किए गए हैं) की कसौटी पर जिसे चाहे हीरे-मोती जैसे ये बेशकीमती नगीने दे सकता है। इस तरह मैनेजर अपने पसंदीदा लोगों को रेवड़ियां बांट सकता है और चाहे जिसे ठुकरा सकता है।  जरा सोचिए कि ऐसी स्थिति में कोई भी मैनेजर क्या करेगा? जाहिर तौर पर वह पहले अपने मित्रों व सगे-संबंधियों को बुलाकर यह सुनिश्चित करेगा कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में रत्न-आभूषण मिल जाएं। मैनेजर उन लोगों को भी गहने वगैरह बांटेगा, जो उसे बदले में नकद लाभ या उपहार वगैरह दे सकें। इस तरह जल्द ही दुकान लुट जाएगी और परिवार को भारी घाटा झेलना होगा। इसके बाद, मान लें कि परिवार पहले मैनेजर को बाहर...

मिलिए FB की पहली महिला इंजीनियर से, इनके दम पर खड़ी हुई कंपनी

साल 2005 की बात है। फेसबुक हैडक्वार्टर एकदम खाली भूतहा जैसा दिख रहा था। एक लड़की पहली जॉब और इंटरव्यू के लिए ऑफिस में बैठी थी। दोपहर में लगभग दो घंटे इंतजार करने के बाद उसे बुलाया गया।  लड़की ने फेसबुक प्रमुख  'मार्क जुकरबर्ग'  को ऐसा प्रभावित किया कि वह बन गई  'फेसबुक'   की पहली महिला इंजीनियर। यह लड़की थी  'रुचि सांघवी' , जिसने फेसबुक की सबसे विवादित फीचर  'न्यूज फीड'   का आइडिया दिया। उन्होंने अपने कुछ बेहतरीन आईडिया से फेसबुक को दुनिया की सोशल नेटवर्किंग साइट बनाया. 2005 में नौकरी ज्वाइन करने वाली 23 वर्षीय रुचि ने 2010 में कंपनी में बड़े पद को छोड़कर सबको चौंका दिया। महाराष्ट्र के पुणे की रहने वाली रुचि सांघवी ने फेसबुक उस समय ज्वाइन किया, जब उसे कोई जानता नहीं था। वह शुरुआत के 10 इंजीनियर्स में अकेली लड़की थी। सिर्फ पांच साल के फेसबुक करियर में उन्होंने कंपनी को दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किग साइट बनते हुए देखा। अपने पिता की कंपनी से न जुड़कर रुचि कुछ अलग करना चाहती थीं। उन्होंने अमेरिका जाकर  'कार्न...

कार्टूनलीला का विमोचन करेंगे मशहूर कार्टूनिष्ट इरफ़ान

   ख्यातिप्राप्त कार्टूनिष्ट राजेश दुबे “डूबेजी” कृत कार्टूनलीला ( त्रैमासिक-पत्रिका ) के प्रवेशांक का लोकार्पण28 अक्टूबर 2012 को रानीदुर्गावती संग्रहालय कला वीथिका में कार्टूनलीला परिवार एवम सव्यसाची कला ग्रुप जबलपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित है.कार्यक्रम के मुख्य  अतिथि इरफ़ान (जनसत्ता)  विशिष्ठ अतिथि श्री राजीव मित्तल (लखनऊ) होगें. साहित्यकार श्री ग्यानरंजन,श्री अमृत लाल वेगड़, श्री दिनेश अवस्थी, चित्रकार श्री सुरेश श्रीवास्तव कार्टून विधा पर वक्तव्य देंगे. कार्टूनिष्ट राजेश दुबे “डूबेजी” का मानना है कि विज़ुअलिटी एवम समय की कमी से जूझते पाठकों को रेखाचित्र,कैरीकेचर,कार्टून, व्यंग्यचित्र के ज़रिये गुदगुदाते हैं. तक़नीकी एवम कला के संयुक्तिकरण का प्रयोग इश्तहारों एवम फ़िल्मों तक में किया जा रहा है. कार्टून दिलो दिमाग़ पर गहरा असर छोड़ते हैं. कार्टून विधा को आर के लक्ष्मण, सुधीर दर , अबू अब्राहम, काक, सुधीर तैलंग, अजीत नैनन, इरफ़ान, इस्माइल लहरी, देवेंद्र, अविषेक जयपुर,काजल कुमार   पवन पटना, हरिओम भोपाल, हाड़ा जयपुर...

टीवी में ब्‍लैकमेलिंग का खेल, बीईए ने सुधीर को सजा दी

♦ रामबहादुर राय जी न्‍यूज के संपादक सुधीर चौधरी को उनके मालिकानों ने भले ब्‍लैकमेलिंग के एक बड़े आरोप से जरूर बरी कर दिया, लेकिन टीवी संपादकों के संगठन बीईए (ब्रॉडकास्‍ट एडीटर्स एसोसिएशन) ने उन्‍हें उनकी प्राथमिक सदस्‍यता से मुक्‍त कर दिया। यानी बीईए के मुताबिक सुधीर चौधरी दोषी हैं। इस मामले में प्रथम प्रवक्‍ता में छपा राम बहादुर राय की यह टिप्‍पणी गौरतलब है। साथ ही, हम बीईए की प्रेस रीलीज और सुधीर चौधरी की सफाई, दोनों ही प्रकाशित कर रहे हैं :  मॉडरेटर … Sudhir Chaudhary removed from primary membership of the BEA New Delhi, 18.10.2012 T he Executive Committee of the Broadcast Editors’ Association (BEA) met to discuss and consider the report of the three-member Fact Finding Committee, comprising Mr N. K. Singh, Mr Dibang and Mr. Rahul Kanwal, in the matter of the issues of professional ethics emanating out of the allegations leveled by Jindal Steel and Power Limited against Mr Sudhir Chaudhary, Treasurer, BEA and Editor, Zee News, on October 18, 2012. As the BEA ...