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लो क सं घ र्ष !: प्रेम और सौहार्द्र का विकास भी होगा

दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उदघाटन करते वरिष्ठ साहित्यकार उद्भान्त, साथ मे शिखा वार्श्नेय,गिरीश पंकज,रणधीर सिंह सुमन और रवीन्द्र प्रभात आज से 75 साल पहले सन 1936 में लखनऊ शहर प्रगतिषील लेखक संघ के प्रथम अधिवेषन का गवाह बना था, जिसकी गूंज आज तक सुनाई पड़ रही है। उसी प्रकार आज जो लखनऊ में ब्लॉग लेखकों का अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हो रहा है, इसकी गूंज भी आने वाले 75 सालों तक सुनाई पड़ेगी। उपरोक्त विचार बली प्रेक्षागृह, कैसरबाग, लखनऊ में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रतिष्ठित कवि उद्भ्रांत ने व्यक्त किये। सकारात्मक लेखन को बढ़ावा देने के उद्देष्य से यह सम्मेलन तस्लीम एवं परिकल्पना समूह द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में पूर्णिमा वर्मन (षारजाह) रवि रतलामी (भोपाल), षिखा वार्ष्णेय (लंदन), डॉ0 अरविंद मिश्र (वाराणसी), अविनाष वाचस्पति (दिल्ली), मनीष मिश्र (पुणे), इस्मत जैदी (गोवा), आदि ब्लॉगरों ने अपने उद्गार व्यक्त किये। का...

'49 साल का हूं और अब तक सच्चे प्यार की तलाश कर रहा हूं'

  सुभाष के झा के साथ संजय लीला भंसाली की खास बातचीत  आपकी बहन बेला को अपनी पहली फिल्म (शिरीं फरहाद की तो निकल पड़ी) बनाने में दस साल लग गए। सुना है लोग इसके लिए आपको जिम्मेदार कह रहे हैं! चीजें तभी होती हैं जब उन्हें होना होता है। मैं जानता हूं कि लोग मुझे उस बरगद के पेड़ की तरह समझते हैं जिसकी छाया में कोई दूसरा पेड़ उग नहीं सकता। जब मुझ पर अपनी ही बहन के कॅरियर को खराब करने के इल्जाम लगाए जाते हैं तो मैं आहत हो जाता हूं। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि उसी ने मुझे फिल्मी दुनिया के कद्दावर लोगों से परिचित करवाया। वे मुझे एफ टीआईआई ले गईं और फि ल्म इंडस्ट्री में इंट्रोड्यूस किया। मैं आज जो भी हूं उसका पूरा श्रेय उन्हीं को जाता है। शायद मेरी किस्मत अच्छी थी कि मैं उनसे पहले कोई फि ल्म बना पाया, पर ऐसा मौका उन्हें मिलना चाहिए था। आप उन्हें पहले फिल्म बनाने के लिए मदद कर सकते थे। कई बार मुझे लगा कि मेरी फिल्मों की एडिटिंग की वजह से वे अपनी कोई फिल्म नहीं बना पा रहीं। इसमें मैं कुछ नहीं कर सकता था। बेला हमेशा मेरी क्रिएटिव टीम का हिस्सा थीं। उन्होंने फिल्म ब्लैक के पहले मेरी हर...

शोले - 37 वर्षो का सफर

भारतीय सिनेमा की ऐतिहासिक फिल्म शोले' ने इस माह अपने 37 वर्षो का सफर पूरा कर लिया है। फिल्म 15 अगस्त 1975 में रिलीज हुई थी। तब किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि यह भारतीय फिल्मी जगत में मील का ऐसा पत्थर साबित होगी कि जिस तक कोई दूसरी कोई फिल्म पहुंच ही नहीं पाएगी। शोले की प्रसिद्धि का आलम ही तो है कि इसके सारे पात्र इतिहास के पन्नों में अमर हो गए हैं। फिल्म का ऐसा कोई पात्र नहीं, ऐसा कोई दृश्य नहीं, जिसकी नकल न की गई हो या जिसकी चर्चा न की जाती हो। आईए आपको रू-ब-रू करवाते हैं..अपनी 37वीं वषर्गांठ मना रही फिल्म ‘शोले’ की कुछ हसीन यादों से। ये लेख गुजरात के प्रसिद्ध लेखक व डॉ. शरद ठाकर ने लिखा है। शरद ठाकर, अमिताभ बच्चन पर एक किताब लिख रहे हैं। यह लेख उसी किताब का अंश है। शरद ठाकर।  बॉलीवुड की महानतम फिल्मों में से एक ‘शोले’ एक महान पिता के होनहार बेटे द्वारा बनाई गई फिल्म थी। रमेश सिप्पी के पिता जी.पी. सिप्पी खुद एक धुरंधर फिल्म निर्माता थे। ‘शोले’ फिल्म बनाने से पहले रमेश सिप्पी कई सफल फिल्में बना चुके थे, जिसमें सीता और गीता मुख्य थी। सन् 1973 में रिलीज हुई इस फिल्म न...

असम दंगों से जुड़े पूर्वाग्रह

भावनाओं से संचालित और ध्रुवीकृत व्यवस्था में दंगों की राजनीति भी सापेक्ष तरीके से चलती है। इसीलिए गुजरात दंगों के बारे में होने वाली किसी टेलीविजन बहस में 1984 के सिख-विरोधी दंगों का पक्ष भी रखा जाता है। ऐसा न करने पर आप पर पक्षपाती होने का आरोप लग सकता है। यह लगभग वैसा ही है मानो विरोधी पक्ष यह कहे कि ‘दंगों से निपटने में हमारा रिकॉर्ड आपसे बेहतर है क्योंकि ‘हमारे दंगों’ में अपेक्षाकृत कम लोग मारे गए।’ यह देखकर लगता है मानो हिंसा जैसे भयावह कृत्य का अपराधबोध किसी ऐसे ही दूसरे कृत्य से जोड़ने से मिट जाएगा। हमें दंगे की भेंट चढ़ने वाली हरेक जिंदगी को देश पर एक दाग की तरह देखना चाहिए, लेकिन यह बात टीवी बहस के गरमागरम माहौल में गुम होकर रह जाती है। फिलहाल गुजरात और असम के दंगों के बीच ऐसी ही तुलना हो रही है। हाल के हफ्तों में अनेक मंचों से इस तरह के सवाल उठे कि ‘आखिर मीडिया ने असम की हिंसा को उतनी ही तीव्रता से कवर क्यों नहीं किया, जैसा गुजरात को किया गया था?’ एक लिहाज से चौबीसों घंटे चलने वाले खबरिया चैनलों के दौर में यह सवाल जायज भी है, लेकिन इसमें कहीं न कहीं यह कुटिल संदेश भी छि...

परपेंडीकूलर मासूम है,घातक है।

किसी ने कहा था की  गैंग्स ऑफ वासेपुर-2   में परपेंडीकूलर की कोई जरुरत नहीं थी लेकिन मुझे यह किरदार सबसे ख़ास लगा,मुझे याद नहीं आता जब कोई इतनी मासूमियत से इतना खतरनाक साबित हुआ हो ।जो इतनी मासूमियत  बताता हो की उसके बड़े भाई का नाम फैसल खान है वो दूकान लूटने आया है। इसलिए घर आते आते यह किरदार कुछ ख़ास बनकर याद रह गया। नवाजुद्दीन सिद्दीकी,पहले पहल जितने आशिक मिजाज नजर आते है,समय निकलते निकलते उतने ही घातक होते जाते है,और बासेपुर की कहानी जिस तरह से सरदार खान और रामाधीर सिंह की लड़ाई की भूमि ना रहते,ऐसे लोगों की कहानी बन जाती है जो फैज़ल की तरह बासेपुर का सरताज बनना चाहते है ।  गैंग्स ऑफ वासेपुर-1 और गैंग्स ऑफ वासेपुर-2  दोनों देखते समय मन में यह सवाल जरुर कौंधता रहा की यशपाल शर्मा जैसे अभिनेता के लिए गैंग्स ऑफ वासेपुर में क्या कोई मजबूत रोल नहीं था ? यशपाल जी की महानता मुझे उस रोल में नजर आयी,जहा मेरे हिसाब से उन्हें बिलकुल भी नहीं होना चाहिए था ।  पीयूष मिश्रा जी के बिना भी काम लिया जा सकता था लेकिन उन्हें फिल्म में खुद के बुजुर्गों की ...

सत्यजित ना होते तो सत्यमेव जयते ना होता।

आमिर खान की प्रस्तुति सत्यमेव जयते के 13 एपीसोड पूरे हो गए। इस शो के इंपैक्ट के ऊपर भी उन्होंने एक एपिसोड शूट किया है, जो जल्द प्रसारित होगा। सत्यमेव जयते की पूर्णाहुति कर आमिर खान अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए निकल चुके हैं। वे शिकागो में धूम-3 की शूटिंग करेंगे। सत्यमेव जयते के निर्देशक सत्यजित भटकल का काम अभी समाप्त नहीं हुआ है। वे इसे समेटने में लगे हैं। सत्यमेव जयते से निकलने में उन्हें और उनकी टीम को वक्त लगेगा। पिछले ढाई-तीन सालों से वे अपनी टीम के साथ इस स्पेशल शो की तैयारियों, शोध, अध्ययन और प्रस्तुति में लगे रहे। उनकी मेहनत और सोच का ही यह फल है कि सत्यमेव जयते टीवी का असरकारी प्रोग्राम साबित हुआ। हालांकि ऊपरी तौर पर सारा क्रेडिट आमिर खान ले गए और यही होता भी है। टीवी हो या फिल्म,उसके ऐंकर और कलाकारों को ही श्रेय मिलता है। सत्यमेव जयते भारतीय टीवी परिदृश्य का ऐसा पहला शो है, जिसने दर्शकों समेत ब्यूरोक्रेसी, सरकार और राजनीतिज्ञों को झकझोरा। सामाजिक मुद्दों और विषयों पर पहले भी शो आते रहे हैं, लेकिन सत्यमेव जयते की तरह सारगर्भित और प्रभावकारी शो और कोई नहीं आ पाया। शो में ...

क्या GOW ‘सत्या’ का झारखंडी-बिहारी देहातीकरण है?

♦ उदय प्रकाश रा त पौने ग्यारह का शो था। डेढ़ के आस-पास छूटा। पूरा हाल ठसा-ठस भरा हुआ था। हर डायलाग पर तालियां और सीटियां। हर डायलाग एक पंचलाइन। शोले के सलीम-जावेद, यहूदी के सोहराब मोदी और अभी हाल वाले कादिरखान के संवादों को बाहर का गेट दिखाती एक डरावनी, हारर, हास्य-फिल्म। एक वायोलेंट कामेडी। फनी … फन-फिल्म। घर पहुंचते-पहुंचते  ढाई बज गये थे। पिटरौल पंप के पास  तड़ातड़ गोलियां। कार के दोनों साइड के कांच तोड़ के, कट्टा और आटोमेटिक तमंचे की नली नीचे करके। गियर बक्सा की साइड पर, सीट की आड़ में भी छुपा हो साला तो छेद डाल। दाहिनी कनपटी में  छेद हो गया है। खून से बायें हाथ का पंजा भीग गया है। दाहिने में पिस्तौल। बनारस में चिरकुट आर्मडीलर यादव को गोली मार कर उड़ाया गया आटोमेटिक पिस्तौल। कमीज पैंट  सब में खून। खूनम खून। सरदार खान  सूरज की चकमक रोशनी के खिलाफ चौंधियाया हुआ, मुंह खोल कर सांस भरता, किसी कदर डगमगाता हुआ ‘जयसवाल बिल्डिंग मेटीरियल’ के छकड़े पर गिर कर ढेर हो जाता है। पंजे से पिस्तौल छूट कर जमीन में गिरती है। छकड़े का पहिया पिस्तौल पर चढ़ता है औ...