प्रसून जोशी, प्रसिद्ध गीतकार हर शख्स की जिंदगी का विस्तार ही उसका देश है। कोई एक विचार नहीं है। हर व्यक्ति देश को अपने तरीके से परिभाषित करता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जो देश था, उसमें विभाजन बिलकुल साफ था। लेकिन आज आजादी के ६३ सालों के बाद भी बहुत से लोगों के लिए देश की परिभाषा बहुत नहीं बदली है। हजारों सालों में हमने जो सभ्यता ईजाद की है, बेशक उसमें बहुत सारे रंग हैं, इतनी विविधता है कि किसी एक रंग से आज के हिंदुस्तान के नक्शे को भरा नहीं जा सकता। इस विविधता को देखने की भी कई नजर हो सकती है। एक नजर इतने रंगों में इंद्रधनुष का सौंदर्य देख सकती है, लेकिन एक नजर यह भी हो सकती है, जो देख पाए कि ये सारे रंग आपस में उस तरह घुले-मिले नहीं हैं, जैसा किताबों में लिखा जाता है। आज के भारत में जो साथ होकर भी साथ नहीं हैं, वे सब अपने ही हैं और अपनों के बीच विभाजन की लंबी खाई है। ग्लोबलाइजेशन और पूंजीवाद का समर्थन करने वालों का तर्क है कि पूंजीवाद एक तालाब की तरह है, जिसमें फेंके गए हर पत्थर का प्रभाव तालाब के आखिरी सिरे तक होता है। बेशक जहां पत्थर फेंका गया है, वहां लहरें ज्य...