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भोपाल गैस त्रासदी

...तो अब मुंह खोलेंगे अर्जुन सिंह विजय कुमार झा न्यूज़ एडिटर, भास्कर डॉट कॉम भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों के पक्ष में हर ओर से उठ रही आवाज के मद्देनजर अब प्रधानमंत्री को भी बोलना पड़ा है । उन्‍होंने मंत्रियों के समूह से दस दिन में रिपोर्ट देने के लिए कहा है। वह इस रिपोर्ट को जल्‍द ही कैबिनेट में भी विचार के लिए रखे जाने की बात कह रहे हैं। मंत्रियों के समूह को यह पता भी लगाना है कि भोपाल गैस कांड का मुख्‍य अभियुक्‍त वारेन एंडरसन कैसे देश से भागने में कामयाब रहा। इसका जवाब अर्जुन सिंह को पता है। पर वह कह रहे हैं कि सही समय पर मुंह खोलेंगे। तो क्‍या दस दिन में वह समय आने वाला है? या अर्जुन के मुंह खोले बिना मंत्रियों का समूह 'सच' सामने लाने वाला है। भोपाल गैस कांड का मुद्दा फिलहाल अदालती फैसला आने के बाद गरम हुआ है। हर ओर से दो बातों के विरोध में ही सुर उठ रहे हैं। एक तो, हजारों मौतों के जिम्‍मेदार लोगों को महज दो साल की सजा और उसमें भी तुरंत जमानत मिल जाने के विरोध में है। और, दूसरा यह कि मुख्‍य अभियुक्‍त वारेन एंडरसन को कांड के तुरंत बाद सरकार ने भगा दिया और फिर उसे भारत न...

लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-6

आईये शुरुआत करते हैं व्यंग्य से , क्योंकि व्यंग्य ही वह माध्यम है जिससे सामने वाला आहत नहीं होता और कहने वाला अपना काम कर जाता है । ऐसा ही एक ब्लॉग पोस्ट है जिसपर सबसे पहले मेरी नज़र जाकर ठहरती है .... १५ अप्रैल को सुदर्शन पर प्रकाशित इस ब्लॉग पोस्ट का शीर्षक है - आम चुनाव का पितृपक्ष ......व्यंग्यकार का कहना है कि -" साधो , इस साल दो पितृ पक्ष पड़ रहे हैं । दूसरा पितृ पक्ष पण्डितों के पत्रा में नहीं है लेकिन वह चुनाव आयोग के कलेण्डर में दर्ज है । इस आम चुनाव में तुम्हारे स्वर्गवासी माता पिता धरती पर आयेंगे , वे मतदान केन्द्रों पर अपना वोट देंग और स्वर्ग लौट जायेंगे । " इस व्यंग्य में नरेश मिश्र ने चुटकी लेते हुए कहा है कि -" अब मृत कलेक्ट्रेट कर्मी श्रीमती किशोरी त्रिपाठी को अगर मतदाता पहचान पत्र हासिल हो जाता है और उसमें महिला की जगह पुरूष की फोटो चस्पा है तो इस पर भी आला हाकिमों और चुनाव आयोग को अचरज नहीं होना चा...

लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-5

आईये आज की चर्चा की शुरुआत करते हैं सामाजिक , सांस्कृतिक और एतिहासिक महत्व से संवंधित विविध विषयों पर केंद्रित कुछ महत्वपूर्ण पोस्ट से । " ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति का माध्यम है। पर सार्वजनिक रूप से अपने को अभिव्यक्त करना आप पर जिम्मेदारी भी डालता है। लिहाजा, अगर आप वह लिखते हैं जो अप्रिय हो, तो धीरे धीरे अपने पाठक खो बैठते हैं।" यह कहना है श्री ज्ञान दत्त पांडे जी का मानसिक हलचल के २६ जनवरी के पोस्ट अपनी तीव्र भावनायें कैसे व्यक्त करें? पर व्यक्त की गई टिपण्णी में । वहीं उड़न तश्तरी .... के १३ फरवरी (प्रेम दिवस ) के पोस्ट मस्त रहें सब मस्ती में... में श्री समीर भाई ने बहुत ही मार्मिक बोध कथा का जिक्र किया है कि" एक साधु गंगा स्नान को गया तो उसने देखा कि एक बिच्छू जल में बहा जा रहा है। साधु ने उसे बचाना चाहा। साधु उसे पानी से निकालता तो बिच्छू उसे डंक मार देता और छूटकर पानी में गिर जाता। साधु ने कई बार प्रयास किया मगर बिच्छू बार-बार डंक मार कर छूटता जाता था। साधु ने सोचा कि जब यह बिच्छू अपने तारणहार के प्रति भी अपनी डंक मारने की पाशविक प्रवृत्ति को नही...

अभियान को कामयाब बनाने में अपना योगदान प्रदान करें

भोपाल त्रासदी में हमने जो खोया उसे सारी दुनिया जानती है ,हिन्दुस्तान का दर्द  पीड़ितों के पक्ष और सत्ताधीशों की गलत बातों के विपरीत अभियान चला रहा  है । आज इस अभियान में सांसदों को, सरकार को, सुप्रीम कोर्ट को यदि हम एक पोस्टकार्ड लिखकर, याचिका लगाकर केस पुन: खुलवाने की आवाज उठाएंगे तो मानवता के बड़े अभियान में सहभागी होंगे। पीड़ितों को सफलता निश्चित मिलेगी। क्योंकि सारा देश उनके साथ है।तो हिन्दुस्तान के सभी पाठकों एवं लेखकों से मेरा आग्रह है की इस अभियान को कामयाब बनाने में अपना योगदान प्रदान करें,जिससे उन लाखों पीड़ितों को इन्साफ मिल सके एवं जनता की आवाज़ हमेशा की तरह एक बार  फिर बुलंद हो सके...  संजय सेन सागर   जय हिन्दुस्तान-जय यंगिस्तान     

नरक के दरवाजे में पहुंची कार, बचा ड्राइवर

चीन में एक ड्राइवर उस समय बाल-बाल बच गया जब एक व्यस्त सड़क में अचानक हुए गढ्ढे में उसकी कार चली गई। चीन के नामचेंग शहर में व्यस्त सड़क पर बने इस सिंकहोल में यह कार कुछ इस तरह धंस गई की ड्राइवर का निकलना मुश्किल हो गया। बाद में क्रेन की मदद से ड्राइवर को निकाला गया। चीन में इस तरह के गढ्ढें होने के मामले में बढ़ोत्तरी हुई है। पिछले दो हफ्तों में यह इस तरह का 8वां गढ्ढा है। अप्रैल से अब तक ही ऐसे 35 गढ्ढें देखे जा चुके हैं। हाल ही में ग्वाटेमाला सिटी में सड़क पर हुए एक ऐसे ही विशाल गढ्ढे को नरक के दरवाजे की संज्ञा दी गई थी। जमीन के नीचे की परते खिसक जाने के कारण ही सतह पर अचानक ऐसे गढ्ढे हो जाते हैं। तस्वीरों में देखिए फंसी कार ग्वाटेमाला सिटी में हुआ गढ्ढा, इसमें एक फैक्ट्री समा गई थी

लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-4

वहीं मँहगाई के सन्दर्भ में हवा पानी पर प्रकाशित एक कविता पर निगाहें जाकर टिक जाती हैं जिसमें कहा गया है कि हमनें इस जग में बहुतों से जीतने का दावा किया पर बहुत कोशिशों के बाद भी हम मँहगाई से जीत नहीं पाए। वहीं कानपुर के सर्वेश दुबे अपने ब्लॉग ‘ मन की बातें ’ पर फरमाते हैं - कुछ समय बाद किलो में , वस्तुएँ खरीदना स्वप्न हो जाएगा , 10 ग्राम घी खरीदने के लिए भी बैंक सस्ते दर पर कर्ज उपलब्ध कराएगा। नमस्कार में प्रो . सी . बी . श्रीवास्तव की कविता छपी है जिसमें कहा गया है कि - मुश्किल में हर एक साँस है , हर चेहरा चिंतित उदास है। वे ही क्या निर्धन निर्बल जो , वे भी धन जिनका कि दास है। फैले दावानल से जैसे , झुलस रही सारी अमराई। घटती जातीं सुख सुविधाएँ , बढ़ती जाती है मँहगाई। आमजन से मेरा अभिप्राय उन मजदूरों से है जो रोज कुआँ खोदता है और रोज पानी पीता है। मजदूरों की चिंता और कोई करे या न करे मगर हमारे बीच एक ब्लॉग है जो मजदूरों के हक ...

लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-3

वर्ष -2008 में 26/11 की घटना को लेकर हिन्दी ब्लॉग जगत काफी गंभीर रहा। आतंकवादी घटना की घोर भत्र्सना हुई और यह उस वर्ष का सबसे बड़ा मुद्दा बना , मगर इस वर्ष यानी 2009 में जिस घटना को लेकर सबसे ज्यादा बवाल हुआ वह है समलैंगिकता के पक्ष में दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला। पहली बार हिन्दुस्तान ने समलैंगिकता के मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बहस किया है। हिन्दी ब्लॉग जगत ने भी इसके पक्ष विपक्ष में बयान दिए और देश में समलैंगिकता पर बहस एकबारगी सतह पर आ गई । किसी ने कहा कि लैंगिक आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव का स्थान आधुनिक नागरिक समाज में नहीं है, पर लैंगिक मर्यादाओं के भी अपने तकाजे रहे हैं और इसका निर्वाह भी हर देश काल में होता रहा है, तो किसी ने कहा कि भारतीय दंड विधान की धारा 377 जैसे दकियानूसी कानून की आड़ में भारत के सम लैंगिक और ट्रांसजेंडर लोगों को अकारण अपराधी माना जाता रहा है, लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने किसी भी प्रकार के यौन और जेंडर रुझानों से ऊपर उठकर सभी नागरिकों के अधिकार को मान्यता देने का ऐति...