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मर कर जीना सीख लिया

अब दुःख दर्द में भी मैने मुस्कुराना सीख लिया जब से अज़ाब को छिपाने के सलीका सीख लिया। बेवफाओं से इतना पड़ा पाला कि अब इल्तिफ़ात से भी किनारा लेना सीख़ लिया। झूठे कसमें वादों से अब मैं कभी ना टूटूंगा ग़ार को पहचानने का हुनर जो सीख लिया। वो कत्लेआम के शौक़ीन हैं तो क्या हुआ मैंने भी तो अब मर के जीने का तरीका सीख़ लिया। सुनसान रास्तों पर चलने से अब डर नहीं लगता मैंने अब इन पर आना-जाना सीख लिया।  शब्दार्थ ::: इल्तिफ़ात- मित्रता ग़ार- विश्वासघात अज़ाब - पीड़ा

वीर जवानों को नमन

कपकपाती ठण्ड में जो कभी ठहरा नहीं चिलचिलाती धूप में जो कभी थमा नहीं गोलियों की बौछार में जो कभी डरा नहीं बारूदी धमाकों से जो कभी दहला नहीं अनगिनत लाशों में जो कभी सहमा नहीं फर्ज के सामने जो कभी डिगा नहीं आंसुओं के सैलाब से जो कभी पिघला नहीं देश के आन ,मान ,शान में मिटने से जो कभी पीछे हटा नहीं ऐसे वीर जवानों को शत -शत नमन ।।

महिला दिवस पर महिला केंद्रित दो फिल्में

जयप्रकाश चौकसे | आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है और शुक्रवार को प्रदर्शित तीन फिल्मों में से दो फिल्मों में केंद्रीय पात्र महिलाएं हैं। ‘क्वीन’ की नायिका मध्यम वर्ग की मामूली तौर पर थोड़ी सी पढ़ी-लिखी है और एक लंबी विदेश यात्रा में स्वयं को खोजने का प्रयास कर रही है। गुलाब गैंग की नायिका रज्जू बचपन से ही पढ़ने की इच्छा जाहिर करने पर अपनी सौतेली मां से पिटती रही है। उसने जीवन को पाठशाला में आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ा है और इत्तेफाक से यही पाठ ‘क्वीन’ की नायिका भी पढ़ती है। रज्जू इस नतीजे पर पहुंची है कि अन्याय आधारित असमानता से पीड़ित बीमार समाज में अधिकार छीनना पड़ता है और घुंघरू, पायल के बदले तलवार उठानी पड़ती है। वह हिंसा को न्यायसंगत नहीं मानती परंतु लाख प्रार्थना करने पर भी बात नहीं बनती तो हथियार उठाती है। वह अपने समान दमित स्त्रियों का दल संगठित करती है। उसका बचपन से चला आ रहा सपना कस्बे में स्कूल की स्थापना करना है।   इसी फिल्म में शहर की पढ़ी लिखी श्रेष्ठि वर्ग के राजनैतिक परिवार की महत्वाकांक्षी और निर्भय महिला के हृदय में इस कदर लोहा समाया है क...

रेलवे करता है बॉलीवुड से भी वसूली, 1 ट्रेन से कमाता है ढाई लाख रुपए रोज

Next मुंबई।   गुंडे, चेन्नई एक्सप्रेस, जब वी मेट और दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी फिल्मों में ट्रेन एक सेंट्रल रोल में थी। हर महीने वह एक न एक फिल्म में अहम भूमिका निभा रही है। मेहनताना सवा लाख रुपए रोज। मुंबई के सीएसटी स्टेशन पर सिर्फ इंजन और एक डिब्बे के लिए। चार डिब्बों वाली ट्रेन का ढाई लाख रुपए प्रतिदिन। अच्छे-अच्छे अभिनेताओं से भी ज्यादा। रेलवे को हर साल दो करोड़ से ज्यादा कमाई सिर्फ शूटिंग से हो रही है।  गुंडे, चेन्नई एक्सप्रेस, जब वी मेट और दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी फिल्मों में ट्रेन एक सेंट्रल रोल में थी। हर महीने वह एक न एक फिल्म में अहम भूमिका निभा रही है। मेहनताना सवा लाख रुपए रोज। मुंबई के सीएसटी स्टेशन पर सिर्फ इंजन और एक डिब्बे के लिए। चार डिब्बों वाली ट्रेन का ढाई लाख रुपए प्रतिदिन। अच्छे-अच्छे अभिनेताओं से भी ज्यादा। रेलवे को हर साल दो करोड़ से ज्यादा कमाई सिर्फ शूटिंग से हो रही...

स्क्रिप्टरायटर्स लैब देता है मौका

-अजय ब्रह्मात्मज  देश भर के लेखकों के लिए फिल्म लिखने और निर्देशक बनने की आकांक्षा पूरी करने का एक नया मंच पिछले कुछ सालों से सक्रिय है। इसके बारे में देश के छोटे-मझोले शहरों के लेखक कम जानते हैं। मुंबई और दिल्ली के अलावा देश के अन्य निर्माण केंद्रों से तो इच्छुक लेखक इसमें शामिल होने लगे हैं। उनकी स्क्रिप्ट स्वीकृत और पुरस्कृत हुई हैं। कई स्क्रिप्ट फिल्मों में परिणत होकर देश-विदेश में चर्चित भी रहीं। पिछले साल की सर्वाधिक चर्चित फिल्म ‘द लंचबॉक्स’ भी इसी मंच से आई थी। एनएफडसी हर साल स्क्रिनरायटर्स लैब के नाम से असका आयोजन करता है। चुनी गई स्क्रिप्ट को मार्गदर्शन दिया जाता है। कोशिश रहती है कि देश-विदेश के निर्माता और संस्थाएं इन स्क्रिप्ट पर विचार करें और निवेश के लिए तैयार हों। स्थापित और प्रसिद्ध निर्देशकों को अपेक्षाकृत आसानी से निर्माता मिल जाते हैं। दिक्कत पहनी फिल्म के निर्देशकों की रहती है। अव्यावसायिक फिल्मकारों को भी साधन और धन की कमी रहती है। उनके लिए यह मंच और निर्माण में एनएफडीसी का सहयोग बहुत मानी रखता है। याद करें तो जवाहर लाल नेहरू की पहलकदमी पर कलात्मक और सार्...

आमिर खान पहुंचे बिहर के 'माउंटेन मैन' के गांव, नहीं खाया उनके घर का खाना

गहलौर/बिहार:  अभिनेता आमिर खान मंगलवार को 'माउंटेन मैन' के नाम से मशहूर दशरथ मांझी के गांव गहलौर पहुंचे. उन्होंने कहा कि माउंटेन मैन के नाम से मशहूर दशरथ मांझी उनकी प्रेरणा और आदर्श हैं. उनके गांव में आकर उन्हें काफी खुशी मिली है.   दशरथ मांझी वही शख्स थे, जिन्होंने अपने गांव में अकेले ही एक पहाड़ को काटकर रास्ता बनाया था. अपने कार्यक्रम 'सत्यमेव जयते-2' के लिए गया जिले के गहलौर गांव पहुंचे आमिर को देखने के लिए बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक मौजूद थे. सभी लोग आमिर की एक झलक देखना चाहते थे. आमिर ने कहा कि एक अकेला इंसान क्या कुछ नहीं कर सकता है, इसका सबसे अच्छा उदाहरण दशरथ मांझी हैं. उन्होंने कहा, "मैं यहां आकर, यहां की मिट्टी को छूकर कर वाकई खुश हूं, जहां एक अकेले इंसान ने अपनी नि:स्वार्थ दृढ़ता का इतना बड़ा उदाहरण पेश किया." अभिनेता एवं फिल्म निर्माता आमिर ने कहा कि दशरथ मांझी का गांव देखने की उनके ख्वाहिश पूरी हुई. पहाड़ी पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसके पहले भी वे बिहार आए हैं लेकिन इस गांव में आकर उन्हें बेहद खुशी हो र...

हिंदी के लिए बेस्ट सेलर होना इतना आसान क्यूँ ?

विश्व पुस्तक मेला का समापन तो हो गया लेकिन कई सवाल बेजवाब ही रह गए। हिंदी के वर्त्तमान और भविष्य के बारे में कई बातें भी हुई लेकिन बस उम्मीदों के आलावा हिंदी के पास शायद अब कुछ भी नहीं है।हिंदी को लेकर मेरी फ़िक्र बयां करता यह लेख- मैं ऐसे दर्ज़नों लोगों को जानता हूँ जो इंग्लिश की किताबें खरीदते है लेकिन उसे पढ़ते  नहीं है,वो दुर्जोय दत्ता के ''होल्ड माय हैण्ड'' या ''अफकोस आई लव यू'' जैसे रंगीन कवर पेज देखकर,लाइफ स्टाइल के लिए वो किताबें खरीद लेते है।हिंदी में अच्छा कंटेंट उपलब्ध नहीं है ऐसा बिलकुल नहीं है हिंदी में अच्छा लेखन हो रहा है लेकिन पाठकों की विचारधारा ही हिंदी को लेकर बदल चुकी है वो लेखक की किताबों को फ्री पाने की जोड़तोड़ सीख चुके है। नए लेखक होने का यह मतलब बिलकुल नहीं होता की उसकी किताबें महज गिफ्ट में देने के लिए छापी गयी है। जो हिंदी और इंग्लिश दोनों पढ़ते है वो बताएं की उन्होंने ऑफ़कोर्स आई लव यू में ऐसा क्या पढ़ लिया जो उनकी 5 लाख कॉपी बिक गयी,यह बड़ा ही औसत लेखन है। मेट्रो सिटीज में इंग्लिश बहुत बिक रही है,लेकिन हमारे यहाँ कम से क...