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अफसोस कि हमारे यहां बच्‍चे भी बड़ों की फिल्‍में देखते हैं!

सत्यजीत भटकल पेशेवर वकील थे। आमिर खान ने बचपन के अपने इस मित्र को लगान फिल्म की निर्माण टीम में शामिल किया और सत्यजीत की सिनेमा से घनिष्ठता बढ़ती गयी। सत्यजीत ने लगान फिल्म की मेकिंग पर द स्पिरिट ऑफ लगान पुस्तक लिखी, जो बहुत सराही गयी। दर्शील सफारी अभिनीत जोकोमोन सत्यजीत भटकल की निर्देशक के तौर पर पहली कामर्शियल फिल्म है, जिसमें कहानी है चाइल्ड सुपरहीरो की :  चवन्‍नी चैप ♦ ‘जोकोमोन’ फिल्म का बीज कैसे पड़ा? इसका मुख्य किरदार कुणाल नाम का लड़का है, जिसे दर्शील सफारी प्ले कर रहे हैं। कुणाल अनाथ है। वह चाचा के पास रहता है। अपने स्वार्थ के लिए चाचा उसे बड़े शहर ले जाकर छोड़ देते हैं। वह अकेला महसूस करता है। उसकी केयर करने वाला कोई नहीं है। उस परिस्थिति में वह अपनी स्ट्रेंथ को डिस्कवर करता है। किसी भी इंसान की कमजोरी उसकी लाइफ की सबसे बड़ी स्ट्रेंथ बन सकती है। इस विचार से बीज पड़ा कि क्या होगा, अगर वह लड़का अपनी कमजोरी को ताकत बना ले। ♦ क्या हम इसे पूरी तरह से बाल फिल्म कह सकते हैं? जी नहीं। पूरी तरह से भी नहीं और आधी तरह से भी नहीं। मुझे आपत्ति है बाल फिल्म कहने से। कुछ पुराने फिल्मम...

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आंदोलन के बाद उठे सवाल

महेश रंगराजन भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे के आंदोलन ने जनता के मन में जगह बना ली और सरकार को लोकपाल विधेयक के संबंध में चुस्ती-फुर्ती दिखानी पड़ी। सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार और उसे नियंत्रित करने के श्रेष्ठ तरीकों के बारे में सक्रिय बहस जारी है। अन्ना के अहिंसक आंदोलन ने युवाओं और आमतौर पर गैरराजनीतिक रुझान रखने वाले मध्यवर्ग को भी प्रभावित किया। यह भी उल्लेखनीय है कि नए विधेयक की प्रक्रियाएं अब तेज हो गई हैं। इसके बावजूद कुछ विश्लेषकों द्वारा अन्ना हजारे की तुलना महात्मा गांधी से करना भ्रमपूर्ण हो सकता है। महात्मा गांधी के विपरीत अन्ना हजारे ने मुश्किल के दौर से गुजर रहे हिंदुत्ववादी समूहों को भी एक मंच मुहैया करा दिया। संघ परिवार सत्ता और संरक्षण से अब उतना दूर नहीं है, जितना वह हुआ करता था। कोई भी नहीं जानता कि अयोध्या में मंदिर निर्माण के नाम पर बड़े पैमाने पर जुटाई गई धनराशि कहां गई। झारखंड और कर्नाटक के मामले में भाजपा ने संसदीय बोर्ड के फैसले को खारिज कर दिया। इससे एक तरफ बीएस येदियुरप्पा को फायदा हुआ, जिनकी सरकार खनन लॉबी से संबंधों के कारण जानी जाती है। वहीं दूसरी...

हमारी अन्‍जुमन

विश्व का प्रथम इस्लाम-धर्म का सामुदायिक चिट्ठा, हिन्‍दी में. हमारी अन्‍जुमन संस्थापक की कलम से इसे ईमेल करें इसे ब्लॉग करें! Twitter पर साझा करें Facebook पर साझा करें Google Buzz पर शेयर करें हमारीअन्जुमन.कॉम (www.hamarianjuman.com), लखनऊ, भारत की एक ग़ैर-मुनाफ़ा वेबसाइट है. इसकी स्थापना 07.07.2009 को की गयी थी. यह दुनियाँ की सबसे पहली हिन्दी भाषा में सामूहिक इस्लामिक वेबसाइट/ब्लॉग है जो भारत में दीन-ए-इस्लाम के अनुयायियों में इल्म को बढ़ावा देने और इस्लाम के पैग़ाम के ज़रिये आपस में मित्रता क़ायम करने व इस्लाम के खिलाफ़ फैलाए जा रहे झूठे प्रॉपगेंडों को समाप्त करने के उद्देश्य हेतु प्रयासरत है. दावते-इस्लाम और इस्लाम के वास्तविक स्वरुप और सोच को समाज के जन-जन तक पहुँचाने के लिए हमारीअन्जुमन.कॉम (www.hamarianjuman.com) जिसके तहत शीघ्र ही एक मासिक पत्रिका 'हमारी अन्जुमन' नाम से प्रकाशित की जायेगी. वहीँ इस्लाम के बारे में ग़ैर मुस्लिम में फैली ग़लतफ़हमियों और मुस्लिम में इस्लाम की कम जानकारी को बढ़ाने के नज़रिए से भी हमारीअन्जुमन.कॉम प्रयासरत है. अगर आप भी इसमें शामिल होना ...

लोकतंत्र में शॉर्टकट नहीं होता

हर्ष मंदर  वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण था, जब देशभर के मध्यवर्गीय युवा भ्रष्ट प्रशासन के प्रति आक्रोश व्यक्त करने के लिए एकजुट हुए। हमारा देश कई विरोध प्रदर्शनों का साक्षी रहा है। कुछ हिंसक तो कुछ शांतिपूर्ण। कुछ वेतन व भूमि के लिए तो कुछ आत्मसम्मान व मानवाधिकारों के लिए। लेकिन यह आंदोलन कुछ अलग था। दशकों बाद हमने शिक्षित और संपन्न युवाओं को इतने बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन करते, नारे लगाते और मोमबत्तियां जलाकर रैली निकालते देखा। ये युवा एक बेहतर भारत के लिए उम्मीदों की तलाश कर रहे थे। प्रारंभ में तो राजनीतिक वर्ग ने इस आंदोलन के प्रति द्वेषपूर्ण रवैया रखा, लेकिन जैसे-जैसे लोग जुटते गए, सरकार की मनोदशा बदलने लगी। जल्द ही आंदोलनकारियों की सभी मांगें स्वीकार कर ली गईं और उनके लिए जनसमर्थन बढ़ता गया। आंदोलन को जिस तरह का समर्थन मिला, वह सतही नहीं था। इस विरोध के पीछे गहरी बेचैनी और आक्रोश था। लोग अब किसी तरह के भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे। ऐसे आंदोलनों की अनदेखी करना किसी भी राजनीतिक नेतृत्व के लिए संभव नहीं है। मेरा मान...

एक है भिलाई के स्टील पुरुष जिन्होंने ब्लोगिंग को प्यार करना सिखाया है

एक है भिलाई के स्टील पुरुष जिन्होंने ब्लोगिंग को प्यार करना सिखाया है     भिलाई स्टील फेक्ट्री का एक नोजवान जिसकी बोडी फोलाद की और दिल मोम का बना हे, चेहरे पर मुस्कुराहट है ,और दिल दिमाग में ब्लोगिंग को प्यार के सूत्र में बाँधने का जूनून सवार है जी हाँ  इसी नोजवान का नाम बी एस पाबला है.  लोहे और स्टील में रहकर खुद को मोम बनाकर रखना और किसी के भी प्यार की हल्की सी भी गर्मी से खुद को पिघला डालना कोई मामूली फितरत नहीं इसके लियें इंसान को अपने सभी निजी जज्बात ,निजी झगड़े फसादों को ताक में रखना पढ़ता है और पाबला जी इसीलियें  धेर्य ,संयम से खुद को काबू में रखकर एक कामयाब ब्लोगर बमे  हैं . जी हाँ दोस्तों पाबला जी रायपुर की रविशंकर यूनिवर्सिटी से निकले और भिलाई स्पात संयत्र में टेलीक्म्युनेशन का कामकाज जा सम्भाला ,पाबला  जी ने अपने टेलीकम्युनिकेशन के हुनर का सदुपयोग किया और ब्लोगिंग की दुनिया में ज़ोर आज़माइश शुरू की ,खुद पाबला जी को भी पता नहीं होगा के वोह उनके इस हुनर और प्यार बांटते चलो के नारे के कारण विश्व की हिंदी ब्लोगिंग दुनिया के ...

लो क सं घ र्ष !: उत्तर प्रदेश एस.टी.एफ की पोल खुली: फर्जी फंसाए गए कश्मीरी नवजवान सज्जादुर रहमान आरोप मुक्त

उत्तर प्रदेश में कचेहरी बम ब्लास्ट केस में उत्तर प्रदेश पुलिस व एस . टी . ऍफ़ ने पांच नवजवानों को फर्जी तरीके से पकड़ कर्र बंद कर दिया था । जिसमें तारिक काशमी आजमगढ़ , खालिद मुजाहिद जौनपुर २२ दिसम्बर 2007, सज्जादुर रहमान व मोहम्मद अख्तर को 27 दिसम्बर 2007 से जम्मू एंड कश्मीर से आफताब आलम अंसारी को 28 दिसम्बर 2007 को कलकत्ता से पकड़ कर कचेहरी बम विस्फोट कांड को हल करने का दावा किया था । 16 जनवरी 2007 को आफ़ताब आलम अंसारी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण अंतर्गत धारा 169 सी . आर . पी . सी के तहत दोषमुक्त कर दिया गया था । इस वाद का विचारण माननीय विशेष न्यायधीश श्री शशांक शेखर ( एस . सी / एस . टी ) के नयायालय में हो रहा था । बचाव पक्ष के अधिवक्ता श्री मोहम्मद शुऐब ने आरोप पर कई बार बहस की जिस पर न्यायालय श्रीमान ने श्री चिरंजीव नाथ सिन्हा एस . टी . एफ तथा राजेश श्रीवास्तव ए . टी . एस को तलब कर कई सवाल पूछे जिसका संतोष जनक उत्तर उक्त ...