Skip to main content

Posts

पहले आवाज फिर पत्थर

क. यतीश राजावत सरकार केवल जबानी जमा-खर्च करती है। वह कहती भर है कि हमें समाज के हर तबके को साथ लेकर चलना है, लेकिन लगता नहीं कि देश के आम लोगों के लिए काम करने में उसकी कोई दिलचस्पी है। छोटे-बड़े हर मोर्चे पर केंद्र सरकार देशवासियों से दूर होती जा रही है। अगर यही रुख रहा तो केवल श्रीनगर में ही पत्थर नहीं फेंके जाएंगे, पूरे देश में यह हालत हो जाएगी। उदाहरण के तौर पर केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय रिटेल (खुदरा) कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की योजना बना रहा है। मंत्रालय ने एक मसौदा प्रस्ताव तैयार किया है कि खुदरा उद्योग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होना चाहिए या नहीं? प्रस्ताव अंग्रेजी में है। अगर आपके पास इंटरनेट कनेक्शन है और आप इसे मंत्रालय की साइट पर जाकर देख सकते हैं तो आप इस पर ‘कमेंट’ दे सकते हैं। मंत्रालय भलीभांति जानता है कि इस नीति से समाज के जिस तबके के ऊपर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, वह अंग्रेजी नहीं जानता। चाहे वह खिलौने बेचने वाला लुधियाना का कोई छोटा कारोबारी हो या दिल्ली की खारी बावली का कोई किराना व्यापारी या लखनऊ के हबीबगंज बाजार का कोई कुर्ता विक्रेता। इन सब लोगों क...

ये है 'पीपली लाइव' बनने की कहानी

’ नई दिल्ली. आमिर खान की फिल्म ‘पीपली लाइव’ कैसी है, यह तो आप देखने के बाद बताएंगे। पर हम आपको बता रहे हैं, इसके कॉन्‍सेप्‍ट से लेकर पर्दे पर आने तक की कहानी। फिल्म का आइडिया फिल्म की डायरेक्टर अनुषा रिज़वी को करीब छह साल पहले किसानों की हालत पर एक फिल्म बनाने का आइडिया तब आया जब 2004 में सरकार ने कुछ किसानों को फसल बर्बाद होने पर मुआवजा दिया था। अनुषा के दिमाग में ‘पीपली लाइव’ की धुंधली तस्वीरें तभी बनने लगी थीं। किसानों के गरीबी से तंग आकर आत्महत्या की खबरें अनुषा की कहानी का आधार बनीं। फिल्म की सिनॉप्सिस और आइडिया तैयार करने के बाद अनुषा ने फिल्म पर पैसा लगाने के लिए प्रोड्यूसरों की तलाश शुरू की। यह तलाश इतनी आसान नहीं थी। लेकिन अनुषा ने आमिर खान का ईमेल तलाशकर उन्हें फिल्म का शुरुआती आइडिया ईमेल किया। सब्जेक्ट लाइन में उन्होंने लिखा ‘द फॉलिंग’  दरअसल, अनुषा ने तब फिल्म का नाम यही सोचा था। शुरू में पीपली लाइव लगी थी मजाक! आमिर खान को यह ईमेल द राइजिंग मंगल पांडे की शूटिंग के दौरान मिला। बकौल आमिर उन्हें ईमेल का सब्जेक्ट ‘द फॉलिंग’ थोड़ा दिलचस्प लगा। लेकिन ईमेल पढ़ने पर उन्...

संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या - नवमो अभ्‍यास:

प्रिय बन्‍धु संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या का नौवां अध्‍याय प्रस्तुत कर रहा हूँ । संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या - नवमो अभ्‍यास:   आप सब के सहयोग के लिये बहुत आभार एवं धन्‍यवाद ।।

अभी दो-तीन साल और सड़ेगा अनाज

.   कृषि मंत्नी शरद पवार ने कहा है कि देश में अनाज भंडारण की समस्या से निपटने के लिए अगले दो तीन वर्षो में व्यापक कदम उठाए जायेंगे और गोदामों में सड़ रहे खाद्यान्न के संबंध में उच्चतम न्यायालय को सरकार एक दो दिन में अपने रुख से अवगत करा देगी श्री पवार ने गोदामों की कमी के कारण अनाज सड़ने के मसले पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर आज हुई चर्चा का उत्तर देते हुए स्वीकार किया कि देश में अनाज रखने के लिए पर्याप्त भंडारण व्यवस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि इस समस्या से निपटने के लिए अगले दो तीन साल में व्यापक स्तर पर कदम उठायें जायेंगे। इसके लिए केन्द्र सरकार. निजी क्षेत्न और राज्य सरकारों सभी का सहयोग लिया जायेगा।   उन्होंने कहा कि अनाज सड़ना कतई स्वीकार नहीं है किंतु भंडारण की कमी के कारण यह हुआ है। उन्होंने उच्चतम न्यायालय की अनाज सड़ने की बजाय इसे गरीबों में बांट देने की सलाह पर कहा कि न्यायालय की सब बातों का स्वीकार करनें में समस्या है।   उन्होंने कहा कि न्यायालय की सलाह के संबंध में सरकार अगले एक-दो दिन के भीतर अपने रुख से उसे अवगत करा देगी। उन्होंने कहा कि चार साल पह...

मुक्तिका ......... बात करें संजीव 'सलिल'

मुक्तिका ......... बात करें संजीव 'सलिल' * * बात न मरने की अब होगी, जीने की हम बात करें. हम जी ही लेंगे जी भरकर, अरि मरने की बात करें. जो कहने की हो वह करने की भी परंपरा डालें. बात भले बेबात करें पर मौन न हों कुछ बात करें.. नहीं सियासत हमको करनी, हमें न कोई चिंता है. फर्क न कुछ, सुनिए मत सुनिए, केवल सच्ची बात करें.. मन से मन पहुँच सके जो, बस ऐसा ही गीत रचें. कहें मुक्तिका मुक्त हृदय से, कुछ करने की बात करें.. बात निकलती हैं बातों से, बात बात तक जाती है. बात-बात में बात बनायें, बात न करके बात करें.. मात-घात की बात न हो अब, जात-पांत की बात न हो. रात मौन की बीत गयी है, तात प्रात की बात करें.. पतियाते तो डर जाते हैं, बतियाते जी जाते हैं. 'सलिल' बात से बात निकालें, मत मतलब की बात करें.. *************** Acharya Sanjiv Salil http://divyanarmada.blogspot.com

मेरे बचपन का दोस्त ..मुझे याद आने लगा॥

मेरे बचपन का दोस्त ..मुझे याद आने लगा॥ देख के उसकी सूरत दिल मचलाने लगा॥ पप्पू को पुकारा वह हाथ बचाने लगा॥ घर वालो ने एक भूत को बुलाया था॥ मेरा दुल्हा बनने के लिए मेरे घर आया था॥ देख के उसकी सूरत को अन्धेरा यूं छाने लगा॥ मेरे बचपन का दोस्त ॥मुझे याद आने लगा॥ पप्पू और उसमे आठ आने का फर्क था॥ पप्पू गरीब वह अमीर घर का मर्द था॥ माँ दिखाया उसे हमें आंसू आने लगा॥ मेरे बचपन का दोस्त ॥मुझे याद आने लगा॥ पप्पू का रूप देख सहेलिया डिग जाती थी॥ बिना बात के उसे अपने पास बुलाती थी॥ हमें बुरा लगा था बुखार आने लगा॥ मेरे बचपन का दोस्त ॥मुझे याद आने लगा॥ माँ ने समझाया पडोसी पति नहीं होते॥ पड़ोस वाले ही व्यंग के बीज बोते॥ अपनी किस्मत पे मुझे रोना आने लगा॥ मेरे बचपन का दोस्त ॥मुझे याद आने लगा॥ मै हठ कर बैठी ब्याह पप्पू से राचऊगी॥॥ या बिना मांग भरे कुवारी ही मर जाऊगी॥ पप्पू का चेहरा हमें इशारों में बुलाने लगा॥ मेरे बचपन का दोस्त ..मुझे याद आने लगा॥ तब माँ ने पप्पू के बाप को बुलाया था॥ साड़ी हकीकत मेरे ससुर जी को सुनाया था॥ बात हुयी पक्की मौसम गीत गाने लगा॥

हिंदी दिवस

हिंदी दिवस पर एक नेता जी बतिया रहे थे, ‘मेरी पब्लिक से ये  रिक्वेस्ट  है कि वे हिन्दी अपनाएं इसे  नेशनवाइड पापुलर लेंगुएज  बनाएं और हिन्दी को  नेशनल लेंगुएज  बनाने की अपनी  डयूटी  निभाएं।’ 'थैंक्यू'  करके नेताजी ने विराम लिया। जनता ने  क्लैपिंग  लगाई कुछ 'लेडिज नुमा' महिलाएं ‘ वेल डन! वेल डन !!’ चिल्लाईं। ‘सब अंग्रेजी बोल रहे है..’ ‘हिन्दी-दिवस? ’ ...मैं बुदबदाया। ‘हिन्दी दिवस नहीं, बे!  हिन्दी डे !’ साथ वाले ने मुझ अल्पज्ञानी को समझाया।                                                            - रोहित कुमार ‘हैप्पी’                   ...