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क्या अमृत रस फिर बरसेगा॥ क्या फिर से खुशिया आयेगी॥ क्या मेरे आँगन में फिर से॥ सोन चिरैया गायेगी॥ पहले अब में फर्क बड़ा है॥ अब के सब झूठे है लोग// अपनी झोली भरने से मतलब॥ लगा रहता आशा का लोभ॥ क्या अत्याचार की बढ़ती नदिया॥ एक दम से रुक जायेगी॥ क्या अमृत रस फिर बरसेगा॥ क्या फिर से खुशिया आयेगी॥ क्या मेरे आँगन में फिर से॥ सोन चिरैया गायेगी॥ पहले के संस्कारी होते॥ अब के सब लेते है घूस॥ चाहे महलों वाला हो वह॥ चाहे छाया हो छप्पर फूस॥ ये बेईमानी की लंगड़ी आंधी॥ कब अपना रूप दिखायेगी॥ क्या अमृत रस फिर बरसेगा॥ क्या फिर से खुशिया आयेगी॥ क्या मेरे आँगन में फिर से॥ सोन चिरैया गायेगी॥ बढ़ जाती है अभिलाषाए॥ भर चुका है गागर॥ अब भी पेट न इनका भरता॥ सुखा डाले गे सागर॥ क्या इनके कर्मो की करनी॥ एक दिन इन्हे रुलाएगी॥ क्या अमृत रस फिर बरसेगा॥ क्या फिर से खुशिया आयेगी॥ क्या मेरे आँगन में फिर से॥ सोन चिरैया गायेगी॥

सलाम मुहब्बत...

सलामे मुहब्बत कहते है... बड़े मौज से रहते है॥ ध्यान लगा के पढ़ते है॥ बुरे कर्म से डरते है... लड़की बाज़ी से दूर है रहते॥ गम की छाया नज़दीक न आती॥ न आती है किसी की याद ॥ न बीती बाते हमें रुलाती॥ दिखती उसकी सूरत तब॥ छुप के हम हम निकलते है॥ सलामे मुहब्बत कहते है... बड़े मौज से रहते है॥ न तो किसी का चेहरा ,,आँखों पर मुस्काता है... न तो किसी को दिल दिया ,,न प्रलयकाल रिसियाता है... अपने ही आन मान पे , अपने आप उछलते है॥ सलामे मुहब्बत कहते है... बड़े मौज से रहते है॥ कभी कभी सुन्दरियों की टोली..मुझपे ताना कसती है॥ पता नहीं क्या कह जाती है..बादल जैसे बरसती है॥ मेरे लबो के फूल तो कभी कभी फिसलते है॥ सलामे मुहब्बत कहते है... बड़े मौज से रहते है॥

लेखिकाओं को‍ “छिनाल” कहने पर हंगामा, इस्‍तीफे की मांग

बड़ा पेज खोलने के लिए दोनों इमेज पर क्लिक करें ♦ आशुतोष भारद्वाज नयी दिल्ली, 31 जुलाई। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति और भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी वीएन राय ने हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका को दिये साक्षात्कार में कहा है कि हिंदी लेखिकाओं में एक वर्ग ऐसा है, जो अपने आप को बड़ा ‘छिनाल’ साबित करने में लगा हुआ है। उनके इस बयान की हिंदी की कई प्रमुख लेखिकाओं ने आलोचना करते हुए उनके इस्तीफे की मांग की है। भारतीय ज्ञानपीठ की  साहित्यिक पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ को दिये साक्षात्कार में वीएन राय ने कहा है, ‘नारीवाद का विमर्श अब बेवफाई के बड़े महोत्सव में बदल गया है।’ भारतीय पुलिस सेवा, 1975 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी वीएन राय को 2008 में हिंदी विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया था। इस केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना केंद्र सरकार ने हिंदी भाषा और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए की थी। इमेज को क्लिक करके बड़ा करें हिंदी की कुछ प्रमुख  लेखिकाओं ने वीएन राय को सत्ता के मद में चूर बताते हुए उन्हें बर्खास्त करने की मांग की है। मशहूर लेखक कृष्...

संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या -सप्‍तम: अभ्‍यास:

प्रिय बन्‍धु संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या का सप्‍तम अभ्‍यास प्रस्‍तुत कर रहा हूँ । संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍या -सप्‍तम: अभ्‍यास: आपके संस्‍कृतविषयक प्रेम के लिये धन्‍यवाद ।

फेसबुक की कामयाबी की कहानी

Source: पीयूष पांडे  यह सचमुच अकल्पनीय है। साइट की उम्र सिर्फ छह साल और सदस्यों की संख्या पचास करोड़ से अधिक। छोटे से वक्त में वैश्विक परिघटना बन गया है फेसबुक। आखिर फेसबुक में ऐसा क्या है कि सदस्यों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है? क्या साइट एक अरब का आंकड़ा जल्द पार कर जाएगी? क्या एक नए ‘देश’ में तब्दील होते फेसबुक की सत्ता भी गूगल की तरह कई देशों की राजसत्ता के लिए खतरा पैदा करेगी? फेसबुक अब महज सोशल नेटवर्किग साइट नहीं रह गई है। करोड़ों लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा है। इसके जरिए लोग सिर्फ नेटवर्किग नहीं कर रहे। किसी के लिए जिंदगी की भागदौड़ के बीच यह अकेलेपन से छुटकारा पाने का जरिया है, तो किसी के लिए कारोबारी संपर्क तलाशने का। यह न्यूज, गेम्स, फोटो शेयरिंग, नेटवर्किग और न जाने कितने एप्लीकेशंस के इर्द-गिर्द बुनी एक ऐसी दुनिया है, जहां हर उम्र का शख्स अपना ठिकाना ढूंढ लेता है।   पिछले एक साल में भारत में फेसबुक के ग्राहकों की संख्या में 400 फीसदी की दर से इजाफा हुआ। इंडोनेशिया में रफ्तार की दर 793 फीसदी, ब्राजील में 810 फीसदी, थाईलैंड में 918 फीसदी और ताईवा...

वैदराज...

औषधिया की पचान इन्हें है॥ वैदराज कहलाते है॥ पर्वत और शिलाओं पर॥ चक्कर बहुत लगाते है॥ जड़ी बूटियों को ढूढ़ के॥ करते उसका उपयोग॥ सामाजिक कार्यो में जुटकर॥ साधा बड़ा है योग॥ हर बिमारी की दवा है रखते॥ रोगों को दूर भगाते है... औषधिया की पचान इन्हें है॥ वैदराज कहलाते है॥ इनके मस्तक पर छाया रहती॥ धन्वन्तरी घर को आते है... महाकाल के महामात्र का॥ करना उपयोग सिखाते है॥ कब इसका उपयोग है करना॥ योग विद्द्य सिखलाते है... औषधिया की पचान इन्हें है॥ वैदराज कहलाते है॥

मुझको भी घर जाना है...

अब छोडो ओढनिया देर भयी॥ हमको भी घर को जाना है... पूछेगी घर में मम्मी जब॥ बोलूगी क्या बहाना है॥ बहुत देर बहुत भयी बाते करते॥ मन चंचल हो कुछ पूछ रहा॥ तुम मेरे प्राण अधरे हो॥ ये दिल तुमको बतलाय रहा॥ तेरे ही घर की बतिया अब॥ सातो जनम सजाना है॥ चर्चा गलियों में फ़ैल चुकी ॥ किस किसने नहीं जाना है॥ मैंने भी उस अन्धकार में॥ तुमको ही पहचाना है॥ तुम ही मेरी सुख सम्पाती हो॥ ये दिल ही बड़ा खजाना है...