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आदरणीय जैन ब्लोगर मित्रो ! सादर जय जिनेन्द्र ! मैंने लेखन का वह दोर भी देखा है तब कलम को स्याही के दवात में डुबोकर लेखक लिखता था, और उस दोर के पाठक  साहित्य को सफ़ेद या मटिया रंग से उस पर कवर चढाकर संजो के रखते थे और पढ़ते  थे. युग बदला... यंत्र बदले. लिखने और पढनेका का तरीका बदला. जैसे -जैसे नई-नई तकनीके, प्रोधोगिकी का विकास हो रहा है यंत्रो का विकास हो रहा है. कम्प्यूटर युग में हमारी लेखकी भी और पाठक भी यांत्रिक हो गए है. इसमे कोई विवाद नही है. बल्कि विकास के नये दरवाजे खुले है सहज शुलभता बढ़ी है. आजकल ई लेखन  की बड़ी धूम है. ना किताबे  खरीदने की चिंता ना उसके रखरखाव का बडन! इस कम्प्यूटर युग की क्रान्ति ने तो लेखन एवं लेखको का चेहरा ही बदल दिया है. मुझे लेखन का जो रूप सबसे अधिक पसंद आया वो है ब्लोगिग. ब्लोगिग एक उत्तम माध्यम बन पड़ा  है विचारों के सम्प्रेष्ण के लिए. बिना खर्चे के ही आप अपने विचारों को पाठको तक पहुचाने में सक्षम है. वो भी सचित्र! अति उत्तम ! ब्लोगिग का दुसरा स्वरूप भी मुझे व्यवहारिक जीवन के लिए उत्तम लगा. ब...

लो क सं घ र्ष !: उ0प्र0 सरकार का गुप्त हिन्दुत्व एजेन्डा

मुजफ्फरनगर जिले की खतोली तहसील में स्थित थाना मंसूरपुर के ग्राम पोर बालियान में एक मस्जिद को गिरा कर उस पर पुलिस चौकी स्थापित करने का मामला चर्चा में आया है। समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार को संज्ञान में लेते हुए उ0प्र0 अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष एस0एम0ए0 काजमी ने मुजफ्फरनगर के जिलाधिकारी से रिपोर्ट भी तलब कर ली है। पुलिस का कहना है कि उसने ग्राम पंचायत की भूमि पर नाजायज तौर पर बनी इमारत से उसे रिक्त कराया है। जबकि मुस्लिम पक्ष के अनुसार ग्राम पंचायत की भूमि का पट्टा एक मुसलमान शरीफ को हुआ था जिसके मरणोपरांत उसके लड़के ने इस पर मस्जिद दारूल उलूम देवबन्द से फतवा लेने के बाद बनवाई थी। यह बात बिल्कुल दुरूस्त है कि किसी विवादित भूमि पर मस्जिद नहीं बनवाई जा सकती है मस्जिद के लिए शरई हुक्म है कि वह भूमि हर विवाद से पाक-साफ हो और उसे ईश्वर के नाम पर वक्फ किया गया हो। मुजफ्फर नगर की मस्जिद यदि ग्राम समाज की भूमि पर धोखाधड़ी से बनवाई गई थी तो वह मस्जिद की ईमारत तो हो सकती है अल्लाह का इबादतगाह नहीं। मुजफ्फरनगर की तहसील खतोली के ग्राम पोर बालियान की यह मस्जिद जो उस क्षेत्र के ...

संगीत पर सिनेमा, चार साल और चार दिन की रिलीज

इंडियन ओशन पर डाकुमेंट्री फिल्‍म की निर्माण कथा जयदीप वर्मा हिंदुस्तान के कितने बैंड हैं, जो ‘भोर’ का सही मतलब भी जानते होंगे? कितने हैं जो पीयूष मिश्रा के गुस्से से भरे (अरे रुक जा रे बंदे) शब्दों को ‘एंथम ऑफ आवर टाइम्स’ बना सकते हैं? क्या किसी को पता भी होगा ‘रेवा’ कहां बहती है? और मज़े की बात – इंडियन ओशन सिर्फ़ इन्हीं वजहों से महान नहीं है। उनका संगीत बहुतों के लिए रॉक होते हुए भी सबसे असली ‘हिंदुस्तानी संगीत’ है। गिटार के साथ (बंगाल की) गाबगुबी, ड्रम-सेट के साथ क्लासिकल आलाप, और एलेक्ट्रिक गिटार पर कबीर, सिर्फ़ फ़्यूज़न नहीं है। ये उन्‍हीं सीमाओं को ध्वस्त करना है, जो कबीर और रेवा ने कभी नहीं मानीं। जो संगीत ने कभी नहीं मानीं। सुस्मित सेन, राहुल राम, अशीम चक्रवर्ती और अमित किलम से मिलकर बना ये बैंड अब अपने जीवन और संगीत पर बनी एक डाक्युमेंट्री फिल्म ‘लीविंग होम’ के ज़रिये सिर्फ एक हफ्ते के लिए ‘बिग सिनेमाज़’ के थिएटरों में आ रहा है (2 अप्रैल 2010 को)। फिल्म के निर्देशक जयदीप वर्मा का ये लेख (3 भागों में, यहां पहला भाग है) इस लंबे, अक्सर थका देने वाले सफर को शब्दों में फिर से ...

लो क सं घ र्ष !: भारत सरकार का विज्ञापन है या निम्नकोटि के शोहदों का उवाच

पहले माओवादियों ने खुशहाल जीवन का वादा किया फिर , वे मेरे पति को अगवा कर ले गए फिर , उन्होंने गाँव के स्कूल को उड़ा डाला अब , वे मेरी 14 साल की लड़की को ले जाना चाहते हैं रोको , रोको , भगवान के लिए इस अत्याचार को रोको यह विज्ञापन भारत सरकार के गृहमंत्रालय द्वारा जनहित में जारी किया गया है अब , वे मेरी 14 साल की लड़की को ले जाना चाहते हैं यह बात संभावनाओं पर है और इस तरह के आरोप प्रत्यारोप मोहल्ले के तुच्छ किस्म के शोहदे किया करते हैं। भारत सरकार के विज्ञापनों में इस तरह के अनर्गल आरोप लगाने की परंपरा नहीं रही है । गृह मंत्रालय माओवाद के कार्य क्रियाशील क्षेत्रों में भ्रष्टाचार को समाप्त करता है। विधि सम्मत व्यवस्था जब समाप्त होती है तब हिंसा का दौर शुरू होता है । आज देश की राजधानी दिल्ली से लेकर लखनऊ तक प्रत्येक विधि सम्मत कार्य को करवाने के लिए घूश की दरें तय हैं . घुश अदा न करने पर इतनी आपत्तियां लग जाएँगी की इस जनम में कार्य नहीं होगा। एक सादाहरण सा ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में अच्छे-अच्छे लोगों को दलाल का सहारा लेना पड़ता है...

बिन बादल बरसात की !!

बिन बादल बरसात की !! मेरी नजरो ने तुझ पर कुछ शबनमो की बरसात की ,,, तेरी तमनाओ ने मचल कर बिन बादल बरसात की !! मेरी शबनमी पलकों ने धीरे से तेरी पलकों पर दस्तक दी ,,, तेरी चाहतो ने मचल कर बिन बादल बरसात की !! रात्रि के तीसरे पहर बंद होती पलकों पर ,,, तेरी यादो ने मचल कर बिन बादल बरसात की !

लो क सं घ र्ष !: दीन पर भारी पड़ता मुसलमान का दुनियावी प्रेम

नवाबों के शहर लखनऊ में अमरीकी राजदूत रिमोथी जे0 रोमर ने गत सप्ताह मुस्लिम शैक्षिक संस्थानों व सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक इमारत इमाम बाड़े का दौरा कर कहा कि वह राष्ट्रपति बराक ओबामा के मुहब्बत व अमन के पैगाम को लेकर यहां आए हैं। यह दौरा ठीक उस समय क्यों हुआ जब आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का राष्ट्रीय अधिवेशन यहां आयोजित हो रहा था, यह एक विचारणीय प्रश्न है? मुसलमानों के शरई अधिकारों को सुरक्षित रखने, उनके शैक्षिक, सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान की तदबीरे ढूढ़ने तथा मुस्लिम एकता को कायम रखने के दृष्टिकोण से आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के 21वें राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नदवा यूनीवर्सिटी में हुआ तदोपरान्त एक जलसे आम ऐशबाग ईदगाह में हुआ जहां एक लाख से ऊपर मुसलमानों के ढारे मारते समुद्र ने उलमाए ए दीन के उपदेश व वसीहते सुनी। इससे तीन दिन पूर्व अमरीकी राजदूत रिमोथी जे0 रोमर ने लखनऊ में अपने दौरे के दौरान मुस्लिम शैक्षिक संस्थान शिया कालेज, करामत हुसैन गल्र्स डिग्री कालेज व ऐतिहासिक इमामबाड़ों का भ्रमण किया और शहर लखनऊ की गंगा जमुनी तहजीब की जमकर तारीफ की। य...

नवगीत : घाव कितने?...... --संजीव 'सलिल'

गीत संजीव 'सलिल' * वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * हम समझ ही नहीं पाए कौन क्या है? और तुमने यह न समझा मौन क्या है? साथ रहकर भी रहे क्यों दूर हरदम? कौन जाने हैं अजाने भाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * चाहकर भी तुम न हमको चाह पाए. दाहकर भी हम न तुमको दाह पाए. बाँह में थी बाँह लेकिन राह भूले- छिपे तन-मन में रहे अलगाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * अ-सुर-बेसुर से नहीं, किंचित शिकायत. स-सुर सुर की भुलाई है क्यों रवायत? नफासत से जहालत क्यों जीतती है? बगावत क्यों सह रही अभाव इतने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * खड़े हैं विषधर, चुनें तो क्यों चुनें हम? नींद गायब तो सपन कैसे बुनें हम? बेबसी में शीश निज अपना धुनें हम- भाव नभ पर, धरा पर बेभाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... * साँझ सूरज-चंद्रमा सँग खेलती है. उषा रुसवाई, न कुछ कह झेलती है. हजारों तारे निशा के दिवाने है- 'सलिल' निर्मल पर पड़े प्रभाव कितने? वक़्त ने दिल को दिए हैं घाव कितने?... *************** Acharya...