एक शे'र: आचार्य संजीव 'सलिल' By Divya Narmada April 18, 2009 इन्तिज़ार दिल से करोगे जो पता होता.छोड़कर शर्मोहया मैं ही मिल गयी होती. Share Get link Facebook X Pinterest Email Other Apps Labels इन्तिज़ार दिल शर्मोहया शेर संजीव सलिल Share Get link Facebook X Pinterest Email Other Apps Comments Himanshu PandeyApril 18, 2009 at 6:14 AMवाह ! आचार्य जी की रचनायें पढ़ने का एक अपना सुकून है । और यह शेर तो लाजवाब है ।ReplyDeleteRepliesReplyAdd commentLoad more... Post a Comment आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!! --- संजय सेन सागर
वाह ! आचार्य जी की रचनायें पढ़ने का एक अपना सुकून है ।
ReplyDeleteऔर यह शेर तो लाजवाब है ।