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क्यों यूँही---ग़ज़ल

लोग कहते हैं क्यों यूँही सिर खपाता हूँ ।
गीत गाता व्यर्थ ही क्यों गुनगुनाता हूँ ।

गीत ही है ज़िंदगी ,मेरे लिए ऐ दोस्त,
ज़िंदगी जीता हूँ में तो गुनगुनाता हूँ।

जाने कितने गम ज़माना लिए फिरता है,
गीत गाकर में वही तुमको सुनाता हूँ।

त्रस्त जीवन है यहाँ हर खासो -आम का ,
इसलिए जन-जन की बातें कहता जाता हूँ।

यदि न गायें गुनगुनाएं क्या करें फ़िर हम,
या तो तुम मुझको कहो ,या में बताता हूँ।

हो रहीं क्यों जहाँ में ये ख्वारियाँ ,रुस्वाइयां ,
डरते हो तुम किंतु में तो कह सुनाता हूँ।

कौन ढाए है कहर हर खासो-आम पर,
श्याम ,तुम कहते नहीं पर मैं तो गाता हूँ।।

Comments

  1. मै इसे एसे कह्ता हूं,
    ’लिखता नहीं हूं शेर अब मैं इस ख्याल से,
    किसको है वास्ता यहां अब मेरे हाल से।’

    पूरी बात को पढने के लिये, नीचे दिये लिन्क पर जाने का कष्ट करें।


    http://sachmein.blogspot.com/2009/03/blog-post_31.html

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--- संजय सेन सागर