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बुश पर फेंका गया जैदी का जूता “बाटा” का नहीं था!


♦ विनीत कुमार
विनीत ने यह आलेख द लास्‍ट सैल्‍यूट के उस विज्ञापन के प्रति‍कार में लिखा है, जिसमें लीड स्‍पॉन्‍सर के रूप में बाटा के लोगो को प्रमुखता से जगह मिली है। पाठकों को पर्याप्‍त सहूलियत हो, इसलिए हम उस विज्ञापन की तस्‍वीर भी छाप रहे हैं। इस पूरे आलेख में थिएटर से एक बड़ी वैचारिक क्रांति की मांग के तहत कहा गया है कि चूंकि नाटक में जूता एक विचारधारा का प्रतीक है, बाटा से स्‍पॉन्‍सरशिप नहीं लेनी चाहिए। लेनी भी चाहिए, तो लीड स्‍पॉन्‍सरशिप तो कतई नहीं लेनी चाहिए। अपने पिछले कई आलेखों में बाजार के दौर में पिछड़ रही हिंदी को अपडेट करने की बात करने वाले विनीत का यह आलेख इस बात की मांग करता है कि नाटक को मुफ्त में ही देखने की चीज होना चाहिए और यह भी कि उसे बाजारू हरकतों से बाज आना चाहिए। खैर, असहमति के साथ ही सही, हम उनके इस आलेख को अतिशय सम्‍मान के साथ प्रकाशित कर रहे हैं : मॉडरेटर

नाटक का विज्ञापन बड़ी साइज में देखने के लिए इमेज पर चटका लगाएं।
बाटा के जूते का इससे मजबूत और भावनात्मक स्तर पर विज्ञापन शायद ही पहले कभी हुआ हो। देश के गिने-चुने सरोकारी और समाज के हक के लिए लड़नेवालों में से एक रंगकर्मी अरविंद गौड़ ने बाटा कंपनी के जूते को ऐतिहासिक जूता करार दे दिया है। एक रंगकर्मी के दिमाग में मार्केटिंग और विज्ञापन की इतनी बारीक समझ हो सकती है, सोचकर हैरानी भी हो रही है और अंदर से भय भी कि आनेवाले समय में रंगकर्म बाकी चीजों की तरह ही कॉरपोरेट की जूती बनकर रह जाएगा। इस साल कोटेक महिंद्रा के नाटक फेस्टिवल में जब मैंने पहला नाटक देखा, वहां नाटक देखनेवाले लोगों के तबके को देखा, तब भी यही बात महसूस कर रहा था कि नाटक जो कभी कम से कम खर्चे या लगभग मुफ्त देखा जानेवाला माध्यम रहा है, अब वो सामान्य लोगों की पहुंच से बाहर हो जाएगा। लेकिन अरविंद गौड़ के निर्देशन में कल से जिस नाटक “द लास्ट सैल्यूट” का मंचन शुरू हुआ है, वो इससे भी कहीं खतरनाक कहानी की ओर इशारा करते हैं।
मोहल्ला लाइव परसों से ही इस नाटक को इतिहास रच देने के तौर पर रेखांकित करता आ रहा है। अंडरटोन ये है कि विश्व पटल पर इतनी बड़ी घटना हो गयी लेकिन उसे सर्जनात्मक रूप से लोगों के सामने लाने का काम भारत की पवित्रभूमि में हो रहा है। ऐसे में भारत, यहां के रंगकर्मी और खासकर अरविंद गौड़ इतिहास रचने का काम कर रहे हैं। चूंकि इतने बड़े रिस्‍क के साथ महेश भट्ट ने पैसा लगाया है, प्रोडक्शन किया है, तो उन्हें कम बड़ा योद्धा साबित नहीं किया जा सकता? बहरहाल, मोहल्‍ला लाइव पर इसकी प्रशस्ति में छपी पोस्ट को पढ़ने के बाद ऐसा संयोग बना कि हम परसों ही शाम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तरफ से गुजरे और तब हमने देखा कि वहां द लास्ट सैल्यूट का पोस्‍टर लगा है।
उस पोस्टर में जो सबसे आकर्षक बात थी वो ये कि ठीक कोने में, बहुत ही बड़ी साइज में एक जूता बना है जो कि शान से सिर ताने खड़ा है और नीचे डार्कब्रैकग्राउंड होने की स्थिति में सफेद रंग से लिखा है – बाटा। इस नाटक के औऱ भी कई स्पांसर हैं, लेकिन सबों के लोगो और नाम बहुत छोटे हैं। बाटा के इस जूते और पोस्टर में खास बात ये है कि जूते की साइज उतनी ही बड़ी है, जितनी बड़ी कि बाटा कंपनी अपने शोरूम पर बोर्ड लगाने के लिए छपवाते हैं और पोस्टर की खास बात ये कि उसने जूते को उसी डार्क ब्राउन रंग और बैकग्राउंड के साथ एकाकार किया है, जिस रंग का पोस्टर है। ऐसा करने से जूता अलग से दिखने के बजाय उस नाटक का ही हिस्सा बल्कि एक चरित्र के तौर पर दिखाई देता है। जिन लोगों को भी ये घटना याद है कि 14 दिसंबर 2008 को बगदादिया टीवी के पत्रकार मुंतजिर अल जैदी ने जार्ज बुश पर जूता फेंका था और तब हंगामा मच गया था, उनके मन में पहला सवाल यही उठेगा कि क्या वो जूता बाटा का था?
दरअसल पोस्टर ने बाटा के जूते को इस रूप में शामिल किया है कि वो नाटक की घटना का हिस्सा जान पड़ता है। मुझे नहीं पता कि नाटक के इस पोस्टर को डिजाइन करने में अरविंद गौड़ जैसे सरोकारी रंगकर्मी की क्या भूमिका रही होगी लेकिन जन-मजदूर, हक, संघर्ष, पूंजीवाद के खिलाफ सालों से बात करते रहनेवाले अरविंद गौड़ की आंखों में ये पोस्टर अभी तक कैसे नहीं चुभा, इस बात को लेकर हैरानी जरूर होती है।
मुझे पता है कि मेरी ये पोस्ट पढ़ने के बाद कुछ लोग हमें मिट्टी का लोंदा जानकर ये दलील देने की कोशिश करेंगे कि आज अगर दूसरी बाकी विधाओं और कला की तरह नाटक को जिंदा रहना है, तो उसे बाजार से हाथ मिलाने ही होंगे, समझौते करने ही पड़ेंगे। ऐसे में अरविंद गौड़ निर्देशित नाटक “द लास्ट सैल्यूट” का स्पांसर बाटा है तो क्या दिक्कत है? एक हद तक सचमुच इस बात में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन क्या इस नाटक का स्पांसर बाटा को सिर्फ इसलिए हो जाना चाहिए, क्योंकि इसमें जूता फेंकना ही सबसे बड़ी घटना है और वो भी बुश पर। फेसबुक पर हमने सटायर करते हुए जब लिखा कि बुश पर जूते मारने की दास्तान पर मंचित होनेवाले नाटक द लास्ट सैल्यूट, जिसके निर्देशक अरविंद गौड़ हैं, का प्रायोजक बाटा है। एनएसडी में जो पोस्टर लगा है, उसमें बाटा का जूता उसी तरह शान से और बड़े साइज में है, जैसे बाटा के साइन बोर्ड में होते हैं। इंडिया में भी पी चिदंबरम पर जरनैल सिंह ने जूते फेंके थे, उस पर नाटक बनने पर कौन सी जूता कंपनी स्पांसर होगी, एनी गेस? तो कई लोगों ने उसी व्यंग्य के अंदाज में जूते कंपनियों के नाम गिनाने लगे?
अरविंद गौड़ से हमारा सवाल सिर्फ इतना भर है कि क्या उन्हें एक ऐतिहासिक घटना को अपने हित में एक जूते कंपनी के लिए प्लेटफार्म बनाने देने का अधिकार है? क्या अरविंद गौड़ को इस बात का अधिकार है कि मुंतजिर अली जैदी ने बुश की नीतियों और रवैये के खिलाफ जो प्रतिकार किया, अपना विरोध दर्ज किया, उसे बाटा की झोली में डाल दें। माफ कीजिएगा, मैं यहां पर आकर अरविंद गौड़ से कहीं बेहतर रिबॉक कंपनी को मानता हूं, जिसने अपने विज्ञापन में ये कहीं नहीं शामिल किया कि जरनैल सिंह ने जो जूते पी चिंदमबरम पर फेंके थे, वो उसकी कंपनी के बनाये जूते थे। मतलब जो जूता देश के गृहमंत्री से टक्कर ले सकता है, वो धूप-बरसात, सड़क के पत्थरों और धूल से क्यों नहीं? मुझे यकीन है कि कल को रिबॉक अगर इस चूके हुए क्रेडिट को भुनाने की कोशिश करे, तो अरविंद गौड़ जैसे ही सरोकारी रंगकर्मी इसके खिलाफ नाटक का मंचन करेंगे। ऐसे में ये सवाल जरूर बनता है कि बाटा के जूते को द लास्ट सैल्यूट के पोस्टर में बतौर एक चरित्र क्यों शामिल किया गया?
अरविंद गौड़ जैसे देश के किसी भी रंगकर्मी, कलाकार, समाजसेवी या लेखक से ये सवाल इसलिए भी पूछा जाना चाहिए क्योंकि इन्होंने अपनी जमीन, पहचान (बाजार की भाषा में कहें तो ब्रांडिंग) इन्हीं सारी बातों का विरोध करते हुए बनायी है। देश के लोगों ने अगर इन्हें एक पहचान दी है, तो उसमें कहीं न कहीं उनकी भी हिस्सेदारी शामिल है। इसलिए ये बाकी लोगों की तरह बाजार से, कॉर्पोरेट से, पूंजीपति घरानों और कंपनियों से उसी तरह हाथ नहीं मिला सकते, जिस तरह कोटेक महिंद्रा के साथ हाथ मिलाकर फ्रेमवर्क नाट्योत्सव और जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित कराता है। अगर वो ऐसा करते हैं, तो फिर उन्हें वो जमीन छोड़नी होगी, जहां से वो सरोकार का दावा करते हैं, समाज के बुनियादी ढांचे को बदलने की बात करते हैं। आखिर हम ये बात कैसे बर्दाश्त कर लें कि जो शख्स समाज की दुनियाभर की सड़ांध, कॉरपोरेट की अंधी नीतियों और बाजार के खिलाफ बात करता आया हो और देखते ही देखते हमारा प्रवक्ता बन गया हो, आज वही उसके पक्ष में जाकर, उसके साथ गलबहियां करने लग जाए।
अरविंद गौड़ की अगर यही इच्छा है कि उनके नाटक को बाटा (आज नाटक में अगर जूता है तो), किर्लोस्कर (नाटक में जहर का सीन होने पर) जैसी कंपनियां स्‍पॉन्‍सर करे, तो उन्हें अपने सारे दावों के साथ ये भी घोषित करना होगा कि उनका नाटक दरअसल एक ब्रांड प्रोमोशन का हिस्सा है, इसे आप खांटी सरोकार से जोड़कर देखने की भूल न करें। विज्ञापन कंपनियां हमारी तमाम अनुभूतियों को जब एक कंपनी की पंचलाइन या सिग्नेचर ट्यून तक जकड़ कर रख देना चाहती है, ऐसे में अरविंद गौड़ भी वही काम कर रहे हैं, तो उन्हें फिर सरोकारी होने पर मिलनेवाली सुविधा और शोहरत को एनजॉय करने का क्या हक है? बेहतर हो कि वो बाजार से ही अपने लहलहाने के खाद-पानी लेते रहें और सरोकार की जमीन छोड़ दें।
हम ये बात कैसे मान लें कि अरविंद गौड़ के इस नाटक के पोस्टर में जो चेहरा खुलकर सामने आया है, वो कॉरपोरेट की स्ट्रैटजी से अलग है। मीडिया की उस रणनीति से अलग है, जो कि सरोकार के नाम पर सरकार और कार्पोरेट की करोड़ों की दलाली का काम कर रहा है। इन दिनों एनडीटीवी और कोका कोला का स्कूल बनाने औऱ बच्चों को पढ़ाने का संयुक्त अभियान चल रहा है। एनडीटीवी पर धुंआधार विज्ञापन आ रहे हैं। इससे पहले चैनल ने टोएडा के साथ मिलकर पर्यावरण बचाने को लेकर अभियान चलाया था। क्या ये बात एनडीटीवी को पता नहीं है कि इस देश में पर्यावरण को कौन दूषित कर रहा है और कौन पानी के संकट को भयानक तरीके से बढ़ा रहा है। लेकिन वो उन्हीं कपंनियों के साथ मिलाकर अभियान चला रहा है, जो कि इसके लिए जिम्मेवार है। कई बार तो लगता है कि इस देश को कानून नहीं, लोगों के इमोशन्स चलाते हैं। आखिर तभी तो ऐसे जिम्मेवार और अपराधियों का विरोध करने के बजाय लोग इनके फेंके जानेवाले टुकड़ों के पक्षधर हो जाते हैं। अरविंद गौड़ नाटक के बहाने एनडीटीवी और कोका कोला से क्या अलग कर रहे हैं?
माफ कीजिएगा, मुझे न तो नाटक की बारीकियों की गहरी समझ है और न ही कला की… इसलिए इसे बचाने के लिए मैं बाकी जानकार लोगों की तरह विह्वल नहीं हो सकता।
…लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि अरविंद गौड़ अपने नाटकों में जिन चीजों को बचाने की बात करते हैं, वो अगर सिर्फ पटकथा लेखन और संवाद में खूबसूरती पैदा करने के लिए नहीं है, तो अरविंद गौड़ के नाटक को बचाने से कहीं ज्यादा जरूरी है कि वो बचाये जाएं जिसको बचाने की बात वो लगातार सालों से करते आये हैं। ऐसे में, आज अरविंद गौड़ अगर अपने नाटकों में झांककर देखें तो खुद ही उसके विरोध में नजर आएंगे।
(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्‍ण मीडिया विश्‍लेषक। ओजस्‍वी वक्‍ता। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्‍लॉग राइटर। कई राष्‍ट्रीय सेमिनारों में हिस्‍सेदारी, राष्‍ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। हुंकार और टीवी प्‍लस नाम के दो ब्‍लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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