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आप आए --ग़ज़ल

आप आए दिल के आशियाने में
क्या कहें क्या ना हुआ ज़माने में

बात जो थी बस लवों तक आपके
होगई है बयाँ हर फ़साने में ।

हम चलें उस आसमान के छोर तक,
छोड़ना पङता है कुछ ,कुछ पाने में।

प्रीति का यह चलन कब भाया किसे,
कब कसर छोडेंगे ,ज़ुल्म ढाने में ।

इश्क फूलों का चमन ही तो नहीं,
राह काँटों की है हर ज़माने में।

ज़िंदगी हो गुले-गुलशन कब मज़ा,
जो मज़ा काँटों में गुनगुनाने में।

बात अपनी बने या ना बने श्याम,
ना कसर रह जाय आज़माने में॥

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--- संजय सेन सागर