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एक शे'र: आचार्य संजीव 'सलिल'

इन्तिज़ार दिल से करोगे जो पता होता.
छोड़कर शर्मोहया मैं ही मिल गयी होती.

Comments

  1. वाह ! आचार्य जी की रचनायें पढ़ने का एक अपना सुकून है ।
    और यह शेर तो लाजवाब है ।

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--- संजय सेन सागर