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बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय.

   हमेशा की तरह आज का अखबार भी अपनी पिछली सुर्ख़ियों से आगे निकलने की होड़ करता मिला, जैसे ध्रितराष्ट्र को हर बीते कल से ज्यादा भयावह खबरें देने को शापित संजय. देश के हर कोने से आती सोच और कल्पना से परे अपराधों के ख़बरें. बहुत बेबस महसूस करता हूँ अपने-आप को, क्यूंकि जहाँ से मैं देख रहा हूँ, वहां से यह स्थिति सुधरने वाली नहीं दिखती, पिछले साल भर में नौकरी के दौरान मैंने यह निष्कर्ष निकाला है (यहाँ मुझे वर्त्तमान और आने वाली पीढ़ी को देखने और समझने का मौका मिला ). नेता, नौकरशाह, पुलिस, माफिया, गुंन्डे, मवाली, मुहल्लेवाला, नुक्कड़ वाला, पडोसी, हम-तुम, ये -वो वगैरह-वगैरह ये सब सिर्फ उदहारण मात्र है, हमने पूरे तालाब में ही भंग घोल दी है, ये सब इंसान ही हैं और समाज के किसी न किसी संभ्रांत परिवार से संबध रखते हैं, आज के दौर में सामाजिक ताने-बाने को बुनने वाली ये परिवार नाम वाली इकाई ही भ्रस्ट हो चुकी हैं, इसकी शुरुआत पिछली पीढ़ी ने कई दशक पहले की थी जिसका परिणाम आज के पतित नागरिकों के रूप में सामने आ रहा है. हमने अपने बच्चों को स्वस्थ और अच्छे संस्कार देने के बजाय किसी भी तरह ...

युवाओं में लोकप्रिय 'मस्तराम' पर बनेगी फिल्म, लेकिन नहीं होगी अश्लील

अखिलेश जायसवाल ‘मस्तराम’ नामक फिल्म बनाने जा रहे हैं। विगत सदी के मध्यकाल में ‘मस्तराम’ नामक काल्पनिक नाम से कोई व्यक्ति अश्लील किताबें लिखता था, जिन्हें उस दौर के अधिकांश कमसिन उम्र के लोग चोरी-छुपे पढ़ते थे।   मध्यप्रदेश और राजस्थान तथा ग्रामीण महाराष्ट्र क्षेत्र में ‘भांग की पकौड़ी’ नामक अश्लील उपन्यास युवा लोगों में अत्यंत लोकप्रिय था। अध्यात्मवादी भारत में सेक्स विषय को प्रतिबंधित किया गया, इसलिए मस्तराम और भांग की पकौड़ी जैसी गैर वैज्ञानिक एवं नितांत घातक किताबें चोरी छुपे खूब पढ़ी गई हैं और 21वीं सदी में भी इस विषय को प्रतिबंधित ही रखा गया है तथा पाठ्यक्रम में कभी शामिल नहीं किया गया है, जिस कारण मनोवैज्ञानिक गुत्थियां कमसिन उम्र के अपने भूत रचती रही हैं।   अखिलेश दावा कर रहे हैं कि वे मस्तराम की काल्पनिक आत्मकथा पर फिल्म रच रहे हैं और अश्लीलता से अपनी फिल्म को बचाए रखेंगे।   कमसिन उम्र एक अलसभोर है, जिसमें अंधेरा ज्यादा और रोशनी कम होती है। आज इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील फिल्में कम वय के लोगों को जीवन के सत्य का एक अत्यंत काल्पनिक और फूहड़ स्वरूप उपल...

पलाश से संवाद !

श्रीमति रानी विशाल जी के ब्लाग   काव्यतरंग  से साभार                      पलाश तुम भी अज़ीब हो कोई तुम्हैं  वीतरागी समझता है तो कोई अनुरागी. और तुम हो कि बस सिर पर अनोखा रंग लगाए अपने नीचे की ज़मीन तक  को संवारते दिखते हो. लोग हैरान हैं... सबके सब अचंभित से तकते हैं तुमको गोया कह पूछ रहे हों.. हमारी तरह चेहरे संवारों ज़मीन को क्यों संवारते हो पागल हो पलाश तुम .. ?                          जिसके लिये जो भी हो तुम मेरे लिये एक सवाल हो पलाश,   जो खुद तो सुंदर दिखना चाहता है पर बिना इस बात पर विचार किये ज़मीन का श्रृंगार खुद के लिये ज़रूरी साधन से करता है.. ये तो वीतराग है. परंतु प्रियतमा ने कहा था – आओ प्रिय तुमबिन लौहित अधर अधीर हुए अरु पलाश भी  डाल-डाल  शमशीर हुए. रमणी हूं रमण करो फ़िर चाहे भ्रमण करो.. फ़ागुन में मिलने के वादे प्रियतम अब तो  तीर हुए ...!! ...

छोटे शहरों से आये लेखक-निर्देशक सिनेमा बदल रहे हैं.

पटकथा-संवाद लेखक संजय चौहान से पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज की बातचीत संजय चौहान भोपाल से दिल्ली होते हुए मुंबई आये। दिल्ली में जेएनयू की पढ़ाई के दिनों में उनका संपर्क जन नाट्य मंच से हुआ। कैंपस थिएटर के नाम से उन्होंने जेएनयू में थिएटर गतिविधियां आरंभ कीं। पढ़ाई पूरी करने के बाद आजीविका के लिए कुछ दिनों अध्यापन भी किया। मन नहीं लगा तो पत्रकारिता में लौट आये। लंबे समय तक पत्रकारिता करने के बाद टीवी लेखन से जुड़े। फिर बेहतर मौके की उम्मीद में मुंबई आ गये। सफर इतना आसान नहीं रहा। छोटी-मोटी शुरुआत हुई। एक समय आया कि फिल्मों और टीवी के लिए हर तरह का लेखन किया। कुछ समय के बाद तंग आकर उन्होंने अपनी ही पसंद और प्राथमिकताओं को तिलांजलि दे दी। सोच-समझ कर ढंग का लेखन करने के क्रम में पहले ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ आयी। उसके बाद ‘आई एम कलाम’ से एक पहचान मिली। पिछले साल ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ और ‘पान सिंह तोमर’ से ख्याति मिली। इन फिल्मों के लिए उन्हें विभिन्न पुरस्कार भी मिले। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रतिष्ठा बढ़ी। फिल्‍मकार तिग्‍मांशु धूलिया के साथ संजय चौहान कुछ सालों पहले आपने फै...

book review: novel: mujhe jeena hai critic acharya sanjiv verma 'salil'

कृति चर्चा: मानवीय जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज ''मुझे जीना है'' आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' * (कृति विवरण: मुझे जीना है, उपन्यास, आलोक श्रीवास्तव, डिमाई आकार, बहुरंगी सजिल्द आवरण, पृष्ठ १८३, १३० रु., शिवांक प्रकाशन, नई दिल्ली) *                                     विश्व की सभी भाषाओँ में गद्य साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा उपन्यास है। उपन्यास शब्द अपने जिस अर्थ में आज हमारे सामने आता है उस अर्थ में वह प्राचीन साहित्य में उपलब्ध नहीं है। वास्तव में अंगरेजी साहित्य की 'नोवेल' विधा हिंदी में 'उपन्यास' विधा की जन्मदाता है। उपन्यास जीवन की प्रतिकृति होता है। उपन्यास की कथावस्तु का आधार मानवजीवन और उसके क्रिया-कलाप ही होते हैं। आलोचकों ने उपन्यास के ६ तत्व कथावस्तु, पात्र, संवाद, वातावरण, शैली और उद्देश्य माने हैं। एक अंगरेजी समालोचक के अनुसार- 'आर्ट लाइज इन कन्सीलमेंट' अर्थात 'कला दुराव में है'। विवेच्य औपन्यासिक कृति 'म...

विश्वरूपम: जया टीवी को हुआ नुकसान तो ‘सेकुलर’ बनीं जयललिता!

क मल हासन की फिल्म विश्वरूपम पर प्रतिबंध को लेकर कई स्तरों पर बहस चल रही है। न्यायिक से लेकर बौद्धिक और सामाजिक से लेकर सांप्रदायिक स्तर तक। जिस स्तर पर बात नहीं हो रही है वह है राजनीतिक और व्यावसायिक। जयललिता सरकार का प्रतिबंध सिर्फ मुस्लिमों के आहत होने का मामला है या फिर इसके पीछे राजनीति और धंधा भी है? तमिलनाडु  की राजनीति और जयललिता के राजनीतिक मिजाज को समझने वाले कह रहे हैं कि यह फिल्म विश्वरूपम का मामला नहीं फिल्मकार कमल हासन का मामला है। जिसमें न सिर्फ राजनीतिक चालें चली जा रही हैं बल्कि इसमें व्यवसाय के प्यादे भी वार कर रहे हैं। जानकार  जो कह रहे हैं उसके अनुसार ये तीन वजहें हैं जिसने विश्वरूपम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सैटेलाइट राइट्स का मामला कमल  हासन के करीबी एक पत्रकार का कहना है कि इस फिल्म की मुसीबत उस दिन शुरु हो गई थी जिस दिन कमल हासन ने इसे डीटीएच पर रिलीज करने का ऐलान किया था। इस ऐलान से पहले कमल हासन की फिल्म के सैटेलाइट राइट्स का समझौता जया टीवी से हो चुका था। नाम से जाहिर है कि इस टीवी चैनल का संबंध जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके से ह...

सेक्‍स का लती हुआ इंडिया? 37 साल के शख्‍स ने 922 लोगों से बनाया रिश्‍ता।

सेक्स भारत  जैसे देश में कई लोगों के लिए बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है। लेकिन अब भारत जैसे देश में सेक्स एडिक्शन यानी लत की शक्ल लेता जा रहा है। 37 साल के सोहन दिल्ली की एक कंपनी में काम करते हैं। शादीशुदा मोहन एक बच्चे के पिता हैं और सामान्य जिंदगी जीते हैं। लेकिन उनके बारे में एक बात बेहद चौंकाने वाली है। वे अब तक 922 पुरुष-महिला के साथ सेक्स कर चुके हैं।  सोहन के मुताबिक, 'जब मैं स्कूल में था, तब से मैं सेक्स कर रहा हूं। तब मेरा झुकाव पोर्न की तरफ हो गया। तब एक दिन मेरे दोस्तों ने मेरे लिए एक लड़की का इंतजाम किया। जब तक मैं  35 साल का हुआ, मैं 6,500 महिलाओं के साथ चैट कर चुका था। मैं अपना मोबाइल नंबर ऑनलाइन छोड़ देता था। लेकिन जब मैं पुरुषों के साथ सेक्स करने लगा तो मानसिक तौर पर प्रताड़ित महसूस करने लगा और तब मैं यह सब छोड़ना चाहता था।'  धीरे-धीरे आधुनिकता का लबादा ओढ़ते जा रहे भारत जैसे मुक्त, मोबाइल और अच्छी तरह से कनेक्टेड देश में तमाम युवा सेक्स एडिक्शन के शिकार हैं। नौकरशाह, नेता, फिल्म स्टार, डॉक्टर और छात्र-छात्राएं सेक्स एडिक्शन की चपेट में हैं। ...