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मुस्कान में दबी चीखों और सिसकियों को समझे,उन्‍हें यातना से निकालें ।

♦ आमिर खान … ब च्चों के यौन शोषण की घटनाओं पर शोध के दौरान मुझे एक बड़ी सीख तब मिली, जब मैंने अपनी विशेषज्ञ डॉ अनुजा गुप्ता से पूछा कि यौन शोषण का शिकार होने के बाद भी बच्चे अपने मां-बाप से उसके बारे में बताने में कठिनाई महसूस क्यों करते हैं? उनका जवाब था, ‘क्या हम बच्चों की सुनते हैं? क्या हम उनकी बात सुनने के लायक हैं?’ और यह वास्तव में एक बड़ा सवाल है। मेरा अपने बच्चों के साथ क्या संबंध है? क्या मैं अपने बच्चों से उनकी परेशानियां पूछता हूं? क्या वास्तव में बच्चों की बात सुनता हूं? क्या मैं जानता हूं कि मेरे बच्चे के दिमाग में क्या चल रहा है? क्या मैं उसके भय, सपनों, उम्मीदों के बारे में जानता हूं? क्या वास्तव में मैं यह सब जानना भी चाहता हूं। क्या मैं अपने बच्चों का दोस्त हूं? हालांकि पहली पीढ़ी  की तुलना में हमारी पीढ़ी बच्चों के साथ अधिक बातचीत करती है। या कम से कम हम ऐसा मानना पसंद करते हैं… फिर भी हममें से कितने हैं जो अपने बच्चों के साथ मजबूती से जुड़े हैं? हममें से कितनों के पास एक स्वस्थ संबंध के लिए जरूरी समय और सोच है? सच्चाई यह है कि अगर आपका अपने बच्चों के...

ज्ञानपीठ अपमान !

हिंदी के युवा लेखक गौरव सोलंकी को साहित्‍यिक संस्‍था भारतीठ ज्ञानपीठ ने पिछले साल 'नवलेखन पुरस्कार' देने की घोषणा की थी. हाल ही में गौरव ने यह पुरस्कार ठुकरा दिया है और अपनी दो किताबों का प्रकाशन अधिकार भी वापस ले लिया है. भारतीय ज्ञानपीठ को लिखा गौरव का वह बेबाक पत्र जिसमें उन्होंने पुरस्कार को सम्मान की बजाय अपमान बताते हुए इसे वापस करने की वजहें बताई हैं अपने पत्र में गौरव ने ज्ञानपीठ से यह आग्रह भी किया है कि वह खुद को कुछ लोगों की संकीर्ण राजनीति का गढ़ न बनने दे और अपनी प्रतिष्ठा बचाए. आदरणीय ...... , भारतीय ज्ञानपीठ खाली स्थान इसलिए कि मैं नहीं जानता कि भारतीय ज्ञानपीठ में इतना ज़िम्मेदार कौन है जिसे पत्र में सम्बोधित किया जा सके और जो जवाब देने की ज़हमत उठाए. पिछले तीन महीनों में मैंने इस खाली स्थान में कई बार निदेशक श्री रवीन्द्र कालिया का नाम भी लिखा और ट्रस्टी श्री आलोक जैन का भी, लेकिन नतीजा वही. ढाक का एक भी पात नहीं. मेरे यहां सन्नाटा और शायद आपके यहां अट्टहास.  खैर, कहानी यह जो आपसे बेहतर कौन जानता होगा लेकिन फिर भी दोहरा रहा हूं ताकि ...

हिंदी सिनेमा- 100 साल :इतिहास रचती यह 13 फ़िल्में।

जरा याद कीजिए ‘पड़ोसन’फिल्म का वह सीन जिसमें गुरू उर्फ किशोर कुमार, सुनील दत्त को गाना सिखाने की कोशिश करते हैं। या, ‘प्यार किए जा’ का वह क्लासिकल सीन जिसमें महमूद, ओमप्रकाश को अपनी फिल्म की कहानी सुनाते हैं। ‘जाने भी दो यारों’ के ओमपुरी हों या गोलमाल के रामप्रसाद-लक्ष्मण प्रसाद। इन बातों को पढ़ते-पढ़ते ही आपके चेहरे पर हंसी खिल आई होंगी। कॉमेडी फिल्मों की तासीर ही कुछ ऐसी होती है। भारतीय सिनेमा के सौ साल के इतिहास में एक से बढ़कर एक फिल्में बनीं। एक्शन, रोमांस, हॉरर या कॉमेडी। लोग कभी सेल्युलॉयड के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाए। पीढ़ी दर पीढ़ी इसका नशा चढ़ता गया। हम हिंदी सिनेमा के इन्हीं विषयों पर एक खास सीरिज़ लेकर आए हैं, जिसकी शुरूआत कर रहे हैं हम कॉमेडी फिल्मों से। हमने एक्सपर्ट्स की राय और सर्वे के आधार पर 13 सबसे बेहतरीन कॉमेडी फिल्में चुनी हैं। इनकी खासियत यह है कि सभी फिल्म अपने जमाने में ट्रेंडसेटर रहीं। हम बिल्कुल यह दावा नहीं करते कि यह सूची अंतिम है। आप अपनी मर्जी से इसमें फिल्में जोड़-घटा सकते हैं। इस बारे में अपनी राय कमेंट बॉक्स में लिखकर हमें बताएं।  इन...

भाग बोस डी के आमिर खान !

मुझे अब भी बचपन में पढ़े गए अखबारों के बीच के पन्नों पर छपे मेरी स्टोवस  क्लिनिक के वो विज्ञापन याद है जिनमे सुरक्षित गर्भपात के दावे किये जाते थे |मैंने आमिर खान का “सत्यमेव जयते भी देखा है और उनकी “देल्ही बेली भी देखी है |जिसमे हीरो बेशर्मी से “इसने मेरा चूसा है और मैंने इसकी ली है  “जैसे जुमले इस्तेमाल करता नजर आता है |आमिर खान इसी फिल्म में हमारे यहाँ बनारस में दी जाने वाली एक गाली  को  सीधे न कहकर उसे बोस डी के कहकर जनता का मनोरंजन करते हैं ,मनोरंजन उनके इस नए धारावहिक में भी हैं |दरअसल टेलीविजन ने हिन्दुस्तान में आंसुओं  को भी बाजार की चीज बना दिया है |किसी रियल्टी शो में डांस बाहर हो जाने के बाद रो रहे प्रतियोगी के आंसू हो ,चाहे जिंदगी लाइव की एंकर ऋचा अनिरुद्ध के आंसू हो या फिर आमिर खान के आंसू मैं इनमे कोई अंतर नहीं मानता |जितने आंसू ,उतनी टीआरपी ,उतनी बिकवाली |ये वो बाजार है जिसमे थका हार आदमी समय ,समाज और सरोकारों से जुडी बातों के लिए भी नायकों की तलाश करता हैं |भ्रूण हत्या रोकने के लिए आमिर खान ,की |कंडोम पहनने के लिए सनी लियोन की , साबुन के इस्...

सत्‍यमेव जयते : बड़ा विजेता कौन, आमिर या स्‍टार?

आमिर को मध्‍य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बेटी बचाओ अभियान से जुड़ने का न्‍यौता दिया है। कन्‍या भ्रूण हत्‍या को लेकर आमिर आज राजस्‍थान के मुख्‍यमंत्री से भी मिले हैं। यह सब  उनके पहले टीवी शो 'सत्‍यमेव जयते' का असर है। इस शो पर स्‍टार इंडिया और  आमिर खान  का बड़ा दांव लगा है। अब तक मिल रहे संकेतों से दांव सफल लगता है। चुनौती है, यह सफलता बनाए रखने की।   आमिर खान:    आमिर खान  का टेलिविजन पर यह पहला शो है। इसलिए बतौर होस्‍ट उनकी छवि दांव पर थी। वह यह छवि पुख्‍ता करने में सबसे आगे निकल गए हैं और उनकी ब्रांड वैल्‍यू काफी मजबूत हुई है।    वह इस शो के प्रत्येक एपीसोड के लिए तीन करोड़ रुपए फीस ले रहे हैं। किसी शो की एंकरिंग के लिए अभी तक बॉलीवुड में किसी भी स्टार को इतनी रकम न कभी मिली है और न ही कभी ऑफर की गई है।  अमिताभ बच्चन  (कौन बनेगा करोड़पति), शाहरुख खान (कौन बनेगा करोड़पति, क्या आप पांचवी पास से तेज हैं), सलमान खान (बिग बॉस, दस का दम),  अक्षय कुमार  (खतरों के खिलाड़ी, मास्टर शे...

दिल को लगी,बात बनी,मार्केटिंग ने रचा इतिहास।

शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने कर्नाटक सरकार से कहा है कि वो  आमिर खान  के शो ‘सत्‍यमेव जयते’  के प्रसारण को अनुमति दे। ठाकरे ने एक ओर जहां राज्‍य की सत्‍तारूढ़ बीजेपी सरकार पर निशाना साधा तो दूसरी ओर आमिर खान  के इस शो की बेहद तारीफ की। ठाकरे ने मंगलवार को पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में प्रकाशित संपादकीय में कहा है कि कर्नाटक सरकार द्वारा इस आधार पर शो पर पाबंदी लगाने से साफ है कि वहां देशभक्ति पर प्रांतवाद हावी है। आमिर की तारीफ करते हुए संपादकीय में कहा गया है, 'आमिर शाहरुख की तरह अड़ियल टट्टू नहीं हैं।'    'सत्यमेव जयते पर प्रतिबंध क्यों'  शीर्षक से छपे संपादकीय में बाल ठाकरे ने लिखा है, वह (आमिर)'पाकिस्तान के क्रिकेटर हिंदुस्तान में खेलेंगे तो क्या बिगड़ जाएगा' जैसी बयानबाजी नहीं करता, इसलिए वह खानों की पंगत में नहीं बैठता।   इस शो की पहली कड़ी रेटिंग का रिकॉर्ड तोड़ रही है। 8.7 की टीआरपी के साथ ही यह शो आज भी सोशल साइट्स पर बहस का गरम मुद्दा है। ज्‍यादातर कमेंट्स तारीफ में ही आ रहे हैं, पर कई लोग आलोचना के जरिए भी जायज मुद्दे उठा र...

“गैंग्‍स ऑफ वासेपुर” के ‘पोस्‍टर’ और ‘प्रोमो’ से पर्दा हटा

थोड़े और बड़े साइज में देखने के लिए पोस्‍टर पर चटका लगाएं। ♦ अविनाश अ गले महीने की 22 तारीख को रीलीज होने वाली अनुराग कश्‍यप की फिल्‍म  गैंग्‍स ऑफ वासेपुर  का पोस्‍टर और ट्रेलर लोकार्पित कर दिया गया है। दो भागों में बनी इस फिल्‍म का शुरुआती बड़ा वर्जन मैंने तब देखा था, जब ढेर सारे तकनीकी और रचनात्‍मक करेक्‍शन बाकी थे। यह लगभग छह-सात महीने पुरानी बात हो चली है। अदहन से निकाल कर चावल का एक दाना देख कर उसके सीझने का अंदाजा लगाने की तरह मुझे लग गया था कि पुराने जालिम कस्‍बों से निकाल कर अनुराग ने एक अच्‍छी कहानी पेश की है। हिंसा और प्रेम  हमारे हिंदी सिनेमा का सबसे सामान्‍य विषय है। दुनिया भर की कहानियां भी इन्‍हीं दो गलियों में तरह-तरह से घूमती रहती हैं। आदमी के भीतर भी यही दो चीज सबसे ज्‍यादा उमड़ती-घुमड़ती है। और यही दो चीज है, जिसकी कहानी कभी खत्‍म नहीं हो सकती। अनुराग की खास बात ये है कि वह हिंसा को एक आम व्‍यवहार की तरह अपनी फिल्‍मों में स्‍केच करते हैं और एक हद तक प्रेम को भी। जैसा कि मेरा इंप्रेशन बना, ‘गैंग्‍स ऑफ वासेपुर’ उनकी इसी विशेषता के बड़े उदाहरण के ...