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हम कौन थे?क्या हो गए?और क्या होंगे अभी?...............

हम कौन थे?क्या हो गए?और क्या होंगे अभी?............... आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी.                  आज कुछ ब्लोग्स पर ''शिखा कौशिक जी''द्वारा प्रस्तुत आलेख ''ब्लोगर सम्मान परंपरा का ढकोसला बंद कीजिए''चर्चा में है और विभिन्न ब्लोगर में से कोई इससे सहमत है तो कोई असहमत.चलिए वो तो कोई बात नहीं क्योंकि ये तो कहा ही गया है कि जहाँ बुद्धिजीवी वर्ग होगा वहां तीन राय बनेंगी सहमति ,असहमति और अनिर्णय की किन्तु सबसे ज्यादा उल्लेखनीय टिप्पणियां ''दीपक मशाल जी ''की और ''डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री जी ''की रही .एक और दीपक जी पुरुस्कृत सभी ब्लोगर्स का पक्ष लेते हैं जबकि शिखा जी द्वारा किसी भी ब्लोगर पर कोई आक्षेप किया ही नहीं गया है उनका आक्षेप केवल चयन प्रक्रिया पर है तो दूसरी और डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री जी ''खट्टा मीठा तीखा पचाने की सलाह देते हैं भूल जातेहै कि ''जो डर गया वो मर गया'' की उक्ति आजकल के नए ब्लोगर्स के सर चढ़कर बोल रही है.दोनों में से कोई भी आलेख के मर्म तक नहीं पहुँचता जिसका साफ साफ कहना है कि पह...

ब्लोगर सम्मान परम्परा का ढकोसला बंद कीजिये !''

' इस आलेख का जन्म वर्तमान में ब्लोगिंग जगत में चल रही ''ब्लोगर सम्मान समारोह परम्परा 'के प्रति मेरे मस्तिष्क में चल रही उधेड़-बुन से हुआ .सम्मान पाना सभी चाहते हैं और इसमें कोई बुराई भी नहीं है किन्तु ब्लॉग-जगत में जो भी सम्मान प्रदान किये गए उनका आधार क्या है ?इसकी कोई ठोस जानकारी तथाकथित सम्मान सम्मलेन आयोजित करने वालों ने अंतर्जाल पर नहीं डाली.आखिर क्या हैं ये आधार - १-क्या किसी ब्लॉग के समर्थकों के आधार पर उसे सर्वश्रेठ ब्लोगर चुना जाता है ? २-क्या ब्लॉग पर आने वाली टिप्पन्नियों की संख्या के आधार पर सर्वश्रेठ ब्लोगर का चुनाव होता है ? ३-आप किन ब्लोग्स को किस आधार पर सम्मान प्रदान करने हेतु विश्लेषण के लिए चुनते हैं? ४-नन्हे ब्लोगर का चयन किस आधार पर करते हैं जबकि सभी जानते हैं की नन्हे ब्लोगर स्वयं ब्लोग्स पर पोस्ट नहीं डालते उनके माता-पिता ही ये काम करते हैं ? ५-किसी बलोगर की टिपण्णी और ब्लोगर्स से श्रेठ है इसका क्या आधार है ? ६-ऐसा क्या खास है सम्मान पाने वाले ब्लोगर में जो उसे अन्य ब्लोगर से श्रेष्ठ  बनता है ?क्या उसकी लेखन क्षमता अन्य ब्लोगर्स से श...

दिल के जज्बातों को मुश्किल है दबाये जाना

हमने चाहा था कि न कहें उनसे,     पर बिन कहे ये मन न माना.          हमने लाख छुपाना चाहा दिल के जज्बातों को,                 हो गया मुश्किल उन्हें दिल में दबाये जाना. वो आये सामने मेरे कहा मन में जो भी आया, न कुछ मेरा ख्याल किया न ही दुनिया से छिपाया.           उनकी बातों के असर को मैंने अब है जाना,             दिल के जज्बातों को मुश्किल है दबाये जाना. उनकी चाहत थी हमें मन के ख्यालात बताएं,  हमारी समझ के घेरे में कुछ देर से आये.             अब तो आगे बढ़ने में लगेगा एक ज़माना,             दिल के जज्बातों को मुश्किल है दबाये जाना.                                            शालिनी कौशिक  http://shalinikaushik2.blogspot.com

आप सपने देखते ही होंगे! उसका पीछा भी करते हैं?

इन तस्‍वीरों पर चटका लगा कर इन्‍हें बड़ी साइज में देख सकते हैं। मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त एसवाई कुरैशी बोल रहे हैं। करन दलाल बोल रहे हैं। एसबी मिश्रा बोल रहे हैं। निर्मला जी वक्‍ताओं को सुन रही हैं। मंच पर मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त एसवाई कुरैशी साहब। ♦ अविनाश ज ब नीलेश हिंदुस्‍तान टाइम्‍स की गरिमा और प्रतिष्‍ठा से भरी नौकरी के बीच अचानक गायब हो गये और पता चला कि उन्‍होंने पत्रकारिता की रोज़मर्रेदार कार्रवाइयों से छुट्टी ले ली है – तो मुझे जिज्ञासा हुई कि वे दरअसल क्‍या करेंगे। यह तो पता था कि वे और राहुल पंडिता मिल कर देश भर में चल रहे माओवादी या एंटी स्‍टेट आंदोलनों पर  एक किताब  लिखने में जुटे हैं – लेकिन वह लिखना तो कुछ सालों से चल रहा था और किताब लगभग पूरी होने को थी। सो इतना तो यकीन था कि इसके लिए उन्‍होंने छुट्टी नहीं ली होगी। हालांकि बेचैन आत्‍माओं के बारे में ये सारे यकीन अक्‍सर आपको ठगते भी हैं। खैर, एक दिन रवीश ने बताया कि नीलेश का इरादा अब गांव के स्‍कूल में बच्‍चों को पढ़ाने का है। नीलेश के  इस इरादे की सूचना से मुझे थोड़ी थकान महसूस हुई, क्‍योंकि अक्‍सर ऐसे रूमानी खय...