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प्यारा सा संवाद

हर दम तो साथ - साथ रहता है ! जेसे हमसे  ही वो कुच्छ कहता है ! माँ भी तो हर दम जान जाती है ! इशारों - इशारों मै सब कुछ  बताती है ! जब वो थोडा और बड़ा होता है ! घुटनों के बल इधर - उधर डोलता है ! माँ का दम ही निकल जाता है , जब वो थोडा सा भी रोता है ! जब वो स्कूल को निकलता है ! माँ के पल्लू  से हरदम लिपटता है ! लगता है जेसे माँ से बिछड़ने का ........ हरदम उसे खोफ सा ही रहता है ! जब जवानी मै पांव वो रखता है ! यारों दोस्तों से जब वो मिलता है ! तब माँ के उस एहसास को...............  थोडा - थोडा सा अब वो खोने  लगता है ! अब माँ का आशीर्वाद फिर वो पाता है ! घर मै प्यारी दुल्हन ले के आता है ! उसके साथ रंग - बिरंगे सपने देख कर  फिर वो एक नया संसार बसाता  है !
क्या आज का सच यही है? एक शेर जो हम बहुत जोर-शोर से गाते हैं- "खुश रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते हैं." क्या जानते हैं कि यूं तो ये मात्र एक शेर है किन्तु चंद शब्दों में ये शेर उन शहीदों के मन की भावना को हमारे  सामने खोल का रख देता है .वे जो हमें आजादी की जिंदगी देने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर गए यदि आज हमारे सामने अपने उसी स्वरुप में उपस्थित हो जाएँ तो शायद हम उन्हें एक ओर कर या यूं कहें की ठोकर मार कर आगे निकल  जायेंगे,कम  से कम मुझे आज की भारतीय  जनता को देख ऐसा ही लगता है.आप सोच रहे होंगे कि  ऐसा क्या हो गया जो मुझे इतना कड़वा सच आपके सामने लाना पड़ गया.कल का हिंदी का हिंदुस्तान इसके लिए जिम्मेदार है जिसने अपने अख़बार की बिक्री बढ़ाने के लिए एक ऐसे शीर्षक युक्त समाचार को प्रकाशित किया कि मन विक्षोभ से भर गया.समाचार था "ब्रांड सचिन तेंदुलकर ने महात्मा गाँधी को भी पीछे छोड़ा"ट्रस्ट रिसर्च एड्वयिजरी   [टी.आर.ऐ.]द्वारा किये गए सर्वे में भरोसे के मामले में सचिन को ५९ वें स्थान पर रखा गया है और महात्मा गाँधी जी क...

jeevan karm

हर  सुबह नई आशा  के साथ जागो;  दिल में विश्वास रखो ऊपर वाले के प्रति; गिरो अगर तो गिरकर संभालो खुद को; जिन्दगी में जीत फिर तुम्हारी होगी! ये मत सोचो क्या खो दिया; रखो आशा कुछ पाने की; मत रो अपनी विफलता पर ; लिखो नयी इबारत कामयाबी की! संघर्षो की राह पर चलकर  ; मंजिल पालो सपनो की; गम की गर्मी में तपकर ही मिलेंगी सांसे राहत की! जीवन कर्म का स्थल है; आराम  यहाँ  कहाँ  करना  है; निज  प्रयास की क्यारी  को खुशियों  के फूलो   से  भरना  है !

बदहाल हंगल की मदद को आगे आए बिग बी

श्री ए. के. हंगल को आपने विभिन्न किरदारों को जीवंत करते देखा होगा,लेकिन जिंदगी की रफ़्तार में आज यह कलाकार खुद एक किरदार बनकर रह गया है, श्री ए. के. हंगल की आर्थिक स्तिथि ठीक नहीं है और काफी तंगहाली के बीच गुजर बसर कर रहे है बह भी ऐसे समय जब उम्र का तकाजा है, सच उनकी यह हालत देखकर मन को पीड़ा पहुँचती है की एक कलाकार का यह हश्र भी हो सकता है,आज संपूर्ण बॉलीवुड को श्री ए. के. हंगल की सहायता के लिए आगे आना चाहिए,अब तक कुछ महारथी इस कार्य में सहयोग कर रहे है     बॉलीवुड के बीते दौर के जानेमाने अभिनेता ए. के. हंगल के साथ फिल्म 'शोले' और 'शराबी' में काम कर चुके बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन ने उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया है। इससे पहले आमिर खान भी हंगल की मदद करने की घोषणा कर चुके हैं । अमिताभ ने अपने ब्लॉग 'बिगबी डॉट बिगअड्डा डॉट काम' पर लिखा है, "यह काफी पीड़ादायक है कि बॉलीवुड के बहुत निष्ठावान एवं समर्पित कलाकारों में से एक श्री ए. के. हंगल की हालत काफी खराब चल रही है। वह इस समय बहुत ही बदहाली और आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं । मुझे वेबसाइट्स के जरिये इसकी जानका...

मेरी मौत खुशी का वायस होगी ----------मिथिलेश

जिन्दगी जिन्दादिली को जान ए रोशन यहॉं वरना कितने मरते हैं और पैदा होते जाते हैं। क्रान्तिकारी रोशन सिंह का जन्म शाहजहॉंपुर जिले के नबादा ग्राम में हुआ था । यह गांव खुदागंज कस्बे से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर है। इनके पिता का नाम ठाकुर जंगी सिंह था। इस परिवार पर आर्य समाज का बहुत प्रभाव था। उन दिनों आर्य समाज द्वारा चलाए जा रहे देशहित के कार्यों से ठाकुर साहब का परिवार अछूता ना रहा। श्री जंगी सिंह के चार पुत्र ठाकुर रोशन सिंह, जाखन सिंह, सुखराम सिंह, पीताम्बर तथा दो लड़कियॉं थी । आपका जन्म 22 जनवरी को सन् 1892 को हुआ था। ठाकुर साहब काकोरी काण्ड के क्रान्तिकारियों में आयु में सबस बड़े तथा सबसे अधिक बलवान तथा अचूक निशानेबाज थे । असहयोग आन्दोलन में शाहजहॉंपुर तथा बरेली जिले के ग्रामिण क्षेत्र में उन्होने बड़े उत्साह कार्य किया। उन दिनों बरेली में एक गोली कांड हुआ था जिसमें उन्हें दो वर्ष की बड़ी सजा दी गई । वे उन सच्चे देशभक्तों में थे जिन्होने अपने खून की अन्तिम बूद भी भारत मॉं की भेंट चढ़ा दी । रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाक उल्ला खॉं, राजेन्द्र लाहिड़ी की तरह वे भी बहुत साहसी और सच्चे देशभ...

उलझन: इन्हें परिवार में सभी की चिंता है, पर मेरी नहीं

इस बार उलझन में हम बात कर रहे है विनीता जी की,यह एक संयुक्त परिवार से है जहा एक लम्बा अरसा गुजार देने के बाद भी वो समस्यों से दो चार हो रही है उन्होंने अपनी समस्या को रखा है जहा कुछ दोस्तों ने अपने सुझाबों के माध्यम से निराकरण करने की कोशिश की है,हमें आपके भी जवाबों की प्रतीक्षा है और अगर आप भी कशमकश या उलझन में है तो हमें कहें :- माडरेटर   उलझन विनीता सिंह कोटा, राजस्थान मैं कार्यरत महिला हूं। हमारा संयुक्त परिवार है। पति लेखाकर हैं व शादी को पंद्रह साल पूरे हो चुके हैं। सालभर से मैं मानसिक तनाव झेल रही हूं। पति जरा-जरा सी बात पर चिल्लाना शुरू कर देते हैं। साथ ही इनकी मां भी शुरू हो जाती हैं। ये अपनी बातें बहन, मां, मामी और भाइयों से बांटते हैं, लेकिन मुझसे कभी नहीं। बड़ों की देखा-सीखी बेटी भी मुझे कुछ नहीं समझती। कई बार सोचती हूं आत्महत्या कर लूं या अलग हो जाऊं, पर परिवार की प्रतिष्ठा का ख्याल आते ही रुक जाती हूं। हमारे बन रहे नए मकान की केवल नींव भरकर छोड़ दी है। पति मुझे कहते हैं ‘तेरी वजह से काम बंद किया है, तू हमेशा घर में लड़ाई-झगड़े करती रहती है न इसलिए..।’ इन्हें ...
जनकवि रघुनाथ मिश्र की दिल्‍ली-मेरठ-झाँसी की सांस्‍‍‍कृतिक व साहित्यिक यात्रा कोटा। प्रख्‍यात जनकवि-रंगकर्मी वरिष्‍ठ साहित्यकार श्री रघुनाथ मिश्र ने अपने दिल्ली-मेरठ के दस दिवसीय निजी, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रवास से लौट कर जलेस के सदस्यों को अपनी सामान्य बैठक में मेरठ में स्थापित एवं कार्यरत यूनाइटेड प्रोग्रेसिव थियेटर एसोसिएशन (अप्टा) के संगीतकार, साहित्यकार और रंगकर्मी एवं सेना के वरिष्ठ पदाधिकारियों श्री अनिल कुमार शर्मा आईएडीएस, सहायक नियंत्रक रक्षा लेखा (पेंशन वितरण) और श्री एस एन वत्सल साहित्यकार एवं प्रख्यात एंकर के साथ अपनी महत्वपूर्ण मुलाकात की विस्तार से चर्चा की। मिश्र ने उक्त प्रवास में साहित्यिक, सांस्कृतिक और रंगकर्म से सम्बंधित उक्‍त प्रख्यात हस्ताक्षरों से मुलाकात को अविस्मरणीय बताया। उनके साथ हुई सार्थक-यादगार चर्चा से मिले अमूल्य अनुभवों को बताया। राष्ट्रीय स्‍तर पर साहित्यिक-सांस्कृतिक संदर्भों में अपेक्षित प्रयासों के अभाव में संभाव्य रिक्तता और क्षरण पर चिंता व्यक्त करते हुए श्री शर्मा और श्री वत्सल के मूल्य आधारित संगीत, साहित्य और रंगकर्म क...